Monday, January 25, 2016

विजय, विराट और 26 जनवरी से जुड़ा दिलचस्प आंकड़ा

    भारत का गणतंत्र दिवस यानि 26 जनवरी। भारत के दो बल्लेबाजों ने 26 जनवरी के दिन टेस्ट मैचों में शतक लगाये थे। दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों आंकड़ों में बहुत अधिक समानता है। आपको बता दूं कि 26 जनवरी को टेस्ट मैचों में शतक पूरे करने वाले इन दोनों क्रिकेटरों के नाम अंग्रेजी के अक्षर 'वी' से शुरू होते हैं। इन दोनों ने एक देश आस्ट्रेलिया के खिलाफ यह शतक लगाया। मैदान भी एक ही था एडिलेड ओवल। दोनों ने टेस्ट मैच के तीसरे दिन शतक पूरा किया। यह इन दोनों का टेस्ट मैचों में पहला शतक था। और इससे भी बढ़कर दोनों ने एक समान 116 रन बनाये। दोनों ने भारत की पहली पारी में यह स्कोर बनाया। एडिलेड ओवल में दोनों बार श्रृंखला का चौथा टेस्ट मैच खेला गया था। भारत 64 साल के अंतराल में खेले गये इन दोनों मैचों में बड़े अंतर से हार गया था।
  दिलचस्पी बढ़ गयी तो अब आपको उन दोनों क्रिकेटरों के बारे में भी बता देता हूं। ये क्रिकेटर हैं अपने जमाने के बेहतरीन बल्लेबाज विजय हजारे और वर्तमान समय में भारतीय क्रिकेट की धड़कन विराट कोहली। संयोग से हजारे 26 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतक पूरा करने वाले दुनिया के पहले बल्लेबाज थे। उन्होंने भारत के गणतंत्र बनने से दो साल पहले यानि 1948 को अपने टेस्ट करियर का पहला शतक पूरा किया था। आस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी करते हुए अपनी पारी सात विकेट पर 674 रन बनाकर समाप्त घोषित की थी। महान डान ब्रैडमैन ने 201 रन की पारी खेली थी। भारत की पहली पारी 24 जनवरी को शुरू हो गयी थी, लेकिन 25 जनवरी विश्राम का दिन था और इस तरह से हजारे मैच के तीसरे दिन यानि 26 जनवरी को क्रीज पर उतरे और दिन के आखिर में 108 रन बनाकर नाबाद रहे। वह आखिर में 116 रन बनाकर पगबाधा आउट हुए। यह हजारे का टेस्ट मैचों में पहला शतक था। इससे पहले उनका उच्चतम स्कोर 44 रन था। दत्तू फडकर ने भी 123 रन बनाये लेकिन उन्होंने अपना शतक 27 जनवरी को पूरा किया था। भारतीय टीम इसके बावजूद 381 रन ही बना सकी और उसे फालोआन करना पड़ा। हजारे ने दूसरी पारी में भी 145 रन बनाये थे लेकिन वह भारत को पारी और 16 रन से हारने से नहीं बचा पाये थे।
   ब चर्चा करते हैं विराट कोहली के शतक। कोहली ने 26 जनवरी 2012 को अपने टेस्ट करियर का पहला शतक लगाया था। आस्ट्रेलिया ने 1948 वाले मैच की तरह टास जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए अपनी पहली पारी सात विकेट पर 604 रन बनाकर समाप्त घोषित की। रिकी पोंटिंग और माइकल क्लार्क दोनों ने दोहरे शतक लगाये। अब टेस्ट मैचों में विश्राम का दिन नहीं होता लेकिन मैच 24 जनवरी से शुरू हुआ था इसलिए कोहली को मैच के तीसरे दिन यानि 26 जनवरी को क्रीज पर उतरने का मौका मिला। कोहली आखिर में 116 रन बनाकर पगबाधा आउट हुए। इससे पहले कोहली का टेस्ट मैचों में उच्चतम स्कोर 75 रन था। भारत का कोई भी अन्य बल्लेबाज नहीं चला और पूरी टीम 272 रन पर लुढक गयी। आस्ट्रेलिया ने इस बार फालोआन नहीं दिया लेकिन आखिर में वह 298 रन के बड़े अंतर से जीत दर्ज करने में सफल रहा। ये था भारतीय बल्लेबाजों के 26 जनवरी को लगाये गये टेस्ट शतकों का किस्सा।
    हजारे के शतक से लेकर कोहली के शतक तक 26 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट (टेस्ट, वनडे और टी20) में कुल 21 शतक पूरे किये गये। इनमें महिला क्रिकेट में लगे दो शतक भी शामिल हैं। आस्ट्रेलिया के मैथ्यू हेडन अकेले ऐसे बल्लेबाज हैं जिन्होंने 26 जनवरी को दो बार शतक पूरे किये। हेडन ने 1997 में वेस्टइंडीज और 2008 में भारत के खिलाफ इस दिन टेस्ट शतक पूरे किये थे। संयोग से हेडन ने वेस्टइंडीज के खिलाफ शतक एडिलेड ओवल में ही लगाया था और उनका यह टेस्ट मैचों में पहला शतक भी था। एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों की बात करें तो जिम्बाब्वे के ग्रीम फ्लावर और आस्ट्रेलिया के एडम गिलक्रिस्ट ने अपने करियर का पहला वनडे शतक 26 जनवरी को ही लगाया था। आस्ट्रेलिया के मार्क वॉ ने 26 जनवरी 2000 को भारत के खिलाफ एडिलेड ओवल में 116 रन बनाये थे। महिला क्रिकेट में आस्ट्रेलिया की दिग्गज बल्लेबाज बेलिंडा क्लार्क ने 26 जनवरी को ही अपना पहला टेस्ट शतक लगाया था। भारत के खिलाफ नार्थ सिडनी ओवल में 1991 को खेला गया यह मैच क्लार्क का पदार्पण टेस्ट भी था। दक्षिण अफ्रीका की महिला क्रिकेटर जोमारी लोगटनबर्ग ने भी वनडे में अपना पहला शतक 26 जनवरी को लगाया था।
       अगर आपको यह जानकारी दिलचस्प लगी तो एक टिप्पणी बनती है नीचे के कालम में। आपका धर्मेन्द्र पंत 

Sunday, December 6, 2015

भारत के लिये टेस्ट की दोनों पारियों में शतक

    जिंक्य रहाणे एक टेस्ट की दोनों पारियों में शतक लगाने वाले विशिष्ट क्लब में शामिल हो गये हैं। यह कारनामा करने वाले वह भारत के पांचवें बल्लेबाज हैं। विजय हजारे पहले बल्लेबाज थे जिन्होंने आस्ट्रेलिया के खिलाफ 1998 में एडिलेड में 116 और 145 रन बनाये थे। इसके बाद सुनील गावस्कर ने तीन अवसरों पर यह कारनामा किया। उन्होंने वेस्टइंडीज के खिलाफ 1971 में अपनी पदार्पण सीरीज में पोर्ट आफ स्पेन में 124 और 220 रन, पाकिस्तान के खिलाफ 1978 में कराची में 111 ओर 137 रन तथा वेस्टइंडीज के खिलाफ 1978 में ही कोलकाता में 107 और नाबाद 182 रन बनाये।

अंजिक्य रहाणे: भारतीय टीम के नये श्रीमान भरोसेमंद 
 
       राहुल द्रविड़ ने भी दो बार यह उपलब्धि हासिल की। न्यूजीलैंड के खिलाफ 1999 में हैमिल्टन में 190 और नाबाद 103 तथा पाकिस्तान के खिलाफ 2005 में  कोलकाता में 110 और 135 रन। वर्तमान टेस्ट कप्तान विराट कोहली ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ 2014 में एडिलेड में 115 और 141 रन बनाकर इस सूची में अपना नाम लिखवाया था। अब रहाणे इस क्लब के नये सदस्य हैं। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ नयी दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में 2015 में 127 और नाबाद 100 रन बनाये।
       वैसे एक और जानकारी इसमें शामिल कर दूं कि रहाणे छह दिसंबर को टेस्ट मैचों में शतक पूरा करने वाले दूसरे भारतीय बल्लेबाज हैं। गावस्कर ने 1977 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ ब्रिस्बेन में दूसरी पारी में 113 रन बनाये थे। गावस्कर से भी पहले एक अन्य भारतीय इफ्तिखार अली खां पटौदी ने छह दिसंबर को टेस्ट क्रिकेट में शतक लगाया था। लेकिन उन्होंने यह शतक इंग्लैंड की तरफ से आस्ट्रेलिया के खिलाफ 1932 में सिडनी में लगाया था। पटौदी का यह पदार्पण टेस्ट था जिसकी पहली पारी में उन्होंने 102 रन बनाये थे। यह छह दिसंबर को टेस्ट मैचों में बना पहला शतक भी था। नवाब पटौदी ने इंग्लैंड के लिये तीन टेस्ट मैच खेले। उन्होंने बाद में भारत की तरफ से भी तीन टेस्ट मैच खेले थे। 

Wednesday, November 4, 2015

भारत . दक्षिण अफ्रीका टेस्ट श्रृंखला से जुड़े आंकड़े

     रिष्ठ पत्रकार सम्मानीय श्री पदमपति शर्मा जी का सवाल था कि आखिर मैंने आंकड़ों की दु​कान सजानी क्यों बंद कर दी। पदमपति सर हमेशा प्रेरित करते हैं। यह शायद उन्हीं की प्रेरणा है कि जिस खेलराज ब्लाग को लगभग बंद कर दिया था उसे अब नये नाम 'आंकड़ेबाज' से शुरू कर रहा हूं। आंकड़ों की इस दुकान में सबसे पहले भारत और दक्षिण अफ्रीका की टेस्ट श्रृंखला जो पांच नवंबर से मोहाली में शुरू हो रही है।

     भारत और दक्षिण अफ्रीका टेस्ट श्रृंखला से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े

1... भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच अब तक 29 टेस्ट मैच खेले जा चुके हैं। इनमें से भारत ने सात और दक्षिण अफ्रीका ने 13 में जीत दर्ज की। बाकी 9 मैच ड्रा रहे। भारतीय सरजमीं पर अब तक 12 टेस्ट मैच खेले गये हैं। इनमें दोनों टीमों ने पांच . पांच जीते हैं जबकि दो मैच अनिर्णीत समाप्त हुए हैं।
2... भारतीय धरती पर दोनों देशों के बीच पांच श्रृंखलाएं खेली गयी हैं। इनमें से भारत ने दो में जीत दर्ज की जबकि दक्षिण अफ्रीका ने एक श्रृंखला जीती। पिछली दोनों टेस्ट श्रृंखलाएं बराबरी पर छूटी थी। ओवरआल 12वीं बार ये दोनों देश किसी टेस्ट श्रृंखला में आमने सामने होंगे। पिछले 11 अवसरों में से दक्षिण अफ्रीका छह बार सीरीज जीतने में सफल रहा जबकि भारत ने दो बार श्रृंखला अपने नाम की। बाकी तीन श्रृंखलाएं बराबर रही।
3... वर्तमान श्रृंखला में माना जा रहा है कि एबी डिविलियर्स भारत को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं लेकिन वह हाशिम अमला ​हैं जिन्होंने अब तक भारतीय सरजमीं पर सबसे अधिक धमाल मचाया है। इन दोनों देशों के बीच टेस्ट मैचों में सर्वाधिक 1741 रन सचिन तेंदुलकर ने बनाये हैं और उनके बाद जाक कैलिस (1734 रन) का नंबर आता है लेकिन अमला 1207 रन बनाकर बहुत पीछे नहीं हैं।
4... अमला की निगाह इस श्रृंखला में कई रिकार्डों पर टिकी रहेगी। तेंदुलकर के दोनों देशों के बीच सर्वाधिक रन के रिकार्ड की बराबरी करने के लिये उन्हें 534 रन चाहिए। अमला ने अब तक भारत के खिलाफ पांच शतक लगाये हैं और वह दोनों देशों के बीच सर्वाधिक शतक के तेंदुलकर और कैलिस (सात सात शतक) के रिकार्ड को भी तोड़ना चाहेंगे।
5... अमला हालांकि सबसे पहले दोनों देशों के बीच श्रृंखलाओं में भारतीय सरजमीं पर सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज बनना चाहेंगे। अभी रिकार्ड वीरेंद्र सहवाग (924 रन) के नाम पर है। अमला को उनकी बराबरी के लिये केवल 101 रन चाहिए। अमला ने भारतीय सरजमीं पर अभी तक छह मैचों में चार शतकों की मदद से 823 रन बनाये हैं और उनका औसत 102 . 87 है। मतलब वर्तमान श्रृंखला में यदि वह 177 रन बना लेते हैं तो भारतीय सरजमीं पर 1000 या इससे अधिक रन बनाने वाले चौथे विदेशी बल्लेबाज बन जाएंगे। अभी तक क्लाइव लायड (1359), गोर्डन ग्रीनिज (1042) और मैथ्यू हेडन (1027) ही यह कारनामा कर पाये हैं। एक शतक लगाते ही अमला भारतीय धरती पर सर्वाधिक सैकड़े जड़ने वाले विदेशी बल्लेबाज भी बन जाएंगे। अभी लायड, एवर्टन वीक्स, एलिस्टेयर कुक और अमला चारों ने चार चार शतक लगाये हैं।
6... भारत के वर्तमान बल्लेबाजों में चेतेश्वर पुजारा ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ सर्वाधिक 311 रन बनाये हैं जिसमें एक शतक शामिल हैं। विराट कोहली ने भी एक शतक की मदद से 272 रन बनाये हैं।
7... दोनों देशों के बीच टेस्ट मैचों में अब तक केवल चार दोहरे शतक लगे हैं। ये हैं सहवाग (319), अमला (153 नाबाद), डिविलियर्स (217) और कैलिस (201 नाबाद)।
8... किसी एक श्रृंखला में सर्वाधिक रन बनाने का रिकार्ड जाक कैलिस के नाम पर है। उन्होंने 2010.11 में तीन मैचों में 498 रन बनाये थे। अमला ने इससे पहले फरवरी 2010 में दो मैचों में 490 रन ठोक दिये थे। उन्होंने तब तीनों पारियों में शतक जड़ा था। इस तरह से यदि वह मोहाली में पहली पारी में शतक लगाते हैं तो यह उनका भारतीय धरती पर लगातार चौथा शतक होगा।
9... भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच टेस्ट मैचों में अनिल कुंबले ने सर्वाधिक 84 विकेट लिये हैं। वर्तमान गेंदबाजों में डेल स्टेन 63 विकेट लेकर सबसे आगे हैं। कुंबले की बराबरी के लिये उन्हें 21 विकेट चाहिए।
10... दोनों देशों के बीच विकेटकीपर द्वारा सर्वाधिक शिकार का रिकार्ड मार्क बाउचर (60) के नाम पर है। सर्वाधिक कैच कैलिस (23) ने लिये हैं। वर्तमान खिलाड़ियों में डिविलियर्स (15), अमला (10), पुजारा (6) और मुरली विजय (5) का नंबर आता है।

Sunday, August 16, 2015

विराट के नाम खुला खत

प्रिय विराट,
    मुझे आपसे सहानुभूति है। इसलिए नहीं कि गाले टेस्ट मैच में टीम जीत की स्थिति में होने के बावजूद हार गयी। इसके कुछ और कारण हैं। पहली वजह आपसे ही जुड़ी हुई है। आपको अभी टेस्ट टीम का कप्तान बने हुए कुछ महीने हुए हैं लेकिन आपने स्पष्ट संकेत दे दिये कि आप टीम पर से 'धौनी प्रभाव' समाप्त करने के लिये आमादा हो। परि​वर्तन प्रकृति का नियम है लेकिन वह शनै: शनै: होता है। कोई भी कप्तान अपने मनपसंद की टीम गठित करके अपने हिसाब से उसका संचालन करना चाहता है। इसमें मुझे आपत्ति नहीं लेकिन दूध को भी दही बनने में थोड़ा समय लगता है भाई। जिस टीम को महेंद्र सिंह धोनी ने पिछले छह वर्षों से एक ढांचे में ढाल रखा था उसे आप एकदम से दूसरे ढांचे में फिट करना चाहते हो। इसके नकारात्मक परिणाम आपके सामने हैं। आप यह क्यों भूल गये कि टेस्ट मैच जीतने के लिये यदि 20 विकेट लेने होते हैं तो 20 विकेट बचाने भी होते हैं। धीरे . धीरे और परिस्थितियों का आकलन करके प्रयोग करते तो बेहतर होता भाई।  एक कप्तान अपने पहले चार टेस्ट मैचों में चार शतक लगाता है और उनमें से किसी में भी टीम को जीत नहीं मिलती है तो उस कप्तान से सहानुभूति होना स्वाभाविक है। मुझे आपसे सहानुभूति है विराट।
    मुझे आपसे इसलिए भी सहानुभूति है क्योंकि आपके साथ रवि शास्त्री जुड़े हुए हैं। धौनी की ​'विराट छत्रछाया' में उनकी कुछ खास नहीं चली लेकिन अब लगता है कि विराट के साये में उन्हें अपनी बात रखने का मौका मिल गया है। अगर अंतिम एकादश के चयन में उनकी दखलदांजी है, जैसा कि उनकी तल्ख टिप्पणियों से लगा, तो फिर यही आभास होता है भाई कि उन्हें टीम की नहीं मुंबई की चिंता है। वह मुंबई का कर्ज उतारना चाहते है। आपको शायद याद नहीं हो लेकिन एक समय भारतीय क्रिकेट पर मुंबई लॉबी हावी थी। टीम में मुंबई के खिलाड़ियों की भरमार हुआ करती थी। सुनील गावस्कर टीम लेकर न्यूजीलैंड गये हुए थे। सौराष्ट्र के दिलीप दोषी उन्हें पसंद नहीं थे। वह अनफिट हो गये और गावस्कर को मौका मिल गया। उन्होंने मुंबई के अपने एक साथी को एसओएस भेजकर बुलवा दिया। यह साथी कोई और नहीं शास्त्री थे जिन्होंने तब तक केवल सात प्रथमश्रेणी मैच खेले थे। अब इतिहास दोहराया जा रहा है। मुंबई के एक खिलाड़ी (रोहित शर्मा) के लिये सौराष्ट्र के एक खिलाड़ी (चेतेश्वर पुजारा) की बलि दी जा रही है। अफसोस कि इसमें आप खुलकर शास्त्री का साथ दे रहे हैं। यह भूल रहे हैं कि पुजारा वास्तव में टेस्ट विशेषज्ञ हैं और लंबी अवधि के प्रारूप में रोहित से बेहतर बल्लेबाज हैं। यहां पर यदि मैं यह साबित करने के लिये आंकड़ों की बिसात बिछांऊ तो अच्छा नहीं लगेगा। शास्त्री को समझाओ भाई कि अब मुंबई का पहले जैसा दबदबा नहीं रहा और अंजिक्य रहाणे खेल तो रहा है। कभी संजय बांगड़ और भरत अरूण को भी अलग में ले जाकर उनकी राय पूछ लिया करो।
    सहानुभूति का एक कारण यह भी है कि धौनी के संन्यास लेने के बाद आपकी कप्तानी की राह तो आसान हो गयी लेकिन टीम ने एक मंझा हुआ विकेटकीपर बल्लेबाज खो दिया। आपके पास रिद्धिमान साहा है जो इसलिए टीम में है क्योंकि बीसीसीआई में बंगाल लॉबी ऐसा चाहती है। कुछ और भी विकेटकीपर हैं जो बेहतर विकल्प हो सकते हैं। गाले में विकेट के पीछे साहा के प्रदर्शन से तो आप भी संतुष्ट नहीं होंगे लेकिन आपने उन पर छठे नंबर के बल्लेबाज के रूप में कैसे विश्वास कर लिया। एडम गिलक्रिस्ट के नाम और उनके बल्लेबाजी कौशल से तो आप परिचित होंगे। उनकी मौजूदगी के बावजूद आस्ट्रेलिया छह बल्लेबाजों के साथ उतरता था। आस्ट्रेलिया की उस टीम से सीख लेकर अपना गेंदबाजी आक्रमण मजबूत करो। साहा जैसे विकेटकीपरों के रहते आपकी पांच बल्लेबाजों की थ्योरी कारगर साबित होगी, मुझे संदेह है। 
     और हां कप्तानी में अभी नये हो, चाटुकारों से बचना। कोई भी जो आपको माराडोना या पेले बता रहा है उससे दूर ही रहना है। सफलता हासिल करनी हो तो हिन्दी के मुहावरे 'निंदक नियरे राखिये' पर भी गौर कर लेना। ​
     श्रीलंका के खिलाफ बाकी दो टेस्ट मैचों में सकारात्मक परिणाम के लिये शुभकामनाएं।
                                                           एक क्रिकेट प्रेमी
    

Monday, July 13, 2015

चिर युवा पेस, खिलंदड़ सानिया

   टेनिस भी उन कई खेलों में शुमार करता है जिसमें उम्र काफी मायने रखती है। यदि आप 30 बसंत देखने के बाद भी टेनिस खेल रहे हैं तो आपके दमखम की दाद दी जाती है। मसलन यदि रोजर फेडरर कल विंबलडन फाइनल में नोवाक जोकोविच को हरा देते तो वह ओपन युग में यह खिताब जीतने वाले सबसे उम्रदराज खिलाड़ी बन जाते है। लेकिन अपने लिएंडर पेस तो 42 साल के हो गये हैं और अब भी कोर्ट पर ऐसा धमाल मचा रहे हैं कि कई युवा खिलाड़ियों का पसीना छूटने लगता है। पेस विश्व टेनिस के चिर युवा हैं। भले ही वह युगल में खेलते हैं लेकिन दुनिया के शीर्ष युगल खिलाड़ियों ने भी 35 साल के बाद टेनिस खेलना छोड़ दिया था। पेस ने दिखा दिया है कि उम्र उनकी राह में रोड़ा नहीं बन सकती।
    पेस ने मार्टिना हिंगिस के साथ मिलकर मिश्रित युगल का खिताब जीता है। वही हिंगिस जो अपनी किशोरावस्था में ही टेनिस में बड़ा नाम बन गयी थी। उन्होंने कुछ दिन अज्ञातवास में बिताये और अब युगल खिलाड़ी के रूप में धमाकेदार वापसी की है। हिंगिस अब 34 साल की हो गयी हैं और यह कह सकते हैं कि उन्होंने और पेस ने दुनिया को दिखाया है कि यदि इच्छाशक्ति है तो फिर उम्र बहुत बड़ी बाधा नहीं बन सकती है। आपको याद होगा कि पेस ने कभी मार्टिना नवरातिलोवा के साथ जोड़ी बनायी थी और खिताब भी जीते थे। पेस के लिये नवरातिलोवा ही प्रेरणा बनी। पेस के साथ उन्होंने 2003 में जब आस्ट्रेलियन ओपन और विंबलडन के खिताब जीते थे तब उनकी उम्र 46 साल थी। इसके तीन साल बाद उन्होंने बाब ब्रायन के साथ यूएस ओपन का मिश्रित युगल का खिताब जीता था। कह सकते हैं कि वह लगभग 50 साल की उम्र तक प्रतिस्पर्धी टेनिस में बनी रही।
    अब जरा सानिया मिर्जा की भी बात कर लें। एक समय ऐसा था जबकि वह चोटों से जूझ रही थी और उन्हें चुका हुआ कहा जाने लगा था। लेकिन सानिया ने हार नहीं मानी और वास्तव में अब अपना चरम हासिल किया जबकि वह 28 साल की हो गयी हैं। उन्होंने हिंगिस के साथ मिलकर पहली बार ग्रैंडस्लैम में महिला युगल का खिताब जीता। वह दुनिया की नंबर एक युगल खिलाडी तो पहले ही बन गयी थी। अब लोगों को सानिया एक ग्लैमर गर्ल नहीं बल्कि ​खिलाड़ी के रूप में दिख रही है जो जबर्दस्त खेल से अपने से युवा खिलाड़ियों को चित कर रही है। यह कितना सुखद अहसास है कि पेस और सानिया जैसे भारतीय खिलाड़ियों के साथ मिलकर कभी दुनिया की नंबर एक महिला खिलाड़ी रही हिंगिस अपने पुराने दिनों की यादों को ताजा कर रही है। विंबलडन की बात करें तो भारत के लिये इस बार आल इंग्लैंड क्लब खास बन गया। पेस और सानिया के अलावा सुमित नागल ने भी लड़कों का युगल खिताब जीता। बधाई पेस, बधाई सानिया, बधाई सुमित।

Monday, May 4, 2015

सुखद अहसास है वेस्टइंडीज और बांग्लादेश का प्रदर्शन

     बांग्लादेश पहली पारी में 296 रन से पिछड़ने के बावजूद पाकिस्तान से टेस्ट मैच ड्रा करवा लेता है और वेस्टइंडीज बैकफुट पर होने के बावजूद इंग्लैंड से मैच जीत लेता है। पिछले सप्ताह के ये दोनों परिणाम विश्व क्रिकेट के लिये सुखद समाचार की तरह हैं। बांग्लादेश पिछले 15 वर्षों में अपने टेस्ट दर्जे को सही साबित करने के लिये जूझता रहा है तो वेस्टइंडीज ने नयी सदी में लगातार हार का सामना किया है। बांग्लादेश अभी टेस्ट क्रिकेट का सबसे नयी टीम है तो वेस्टइंडीज का संक्रमण काल अंदरूनी झगड़ों और कैरेबियाई देशों में बेसबाल और अन्य खेलों की धमक के कारण लंबा खिंचता जा रहा है। दोनों को टेस्ट ही नहीं एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की भी सबसे कमजोर टीमों में आंका जाता रहा है। विश्व क्रिकेट में भारत, आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, पाकिस्तान और न्यूजीलैंड के मुकाबलों में ही दम दिखायी देता था लेकिन लगता है कि अब परिदृश्य बदल रहा है। बांग्लादेश की पाकिस्तान के खिलाफ वनडे श्रृंखला में क्लीन स्वीप, फिर टी20 मैच में जीत और अब पहले टेस्ट मैच में हार की स्थिति में होने के बावजूद ड्रा कराने से जाहिर होता है कि इस देश की क्रिकेटिया प्रगति सही दिशा में आगे बढ़ रही है। 
         आप यह कह सकते हो कि पाकिस्तान क्रिकेट में भी सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के अभाव में उसके यहां यह खेल कमजोर पड़ता जा रहा है लेकिन उसने पिछले कुछ वर्षों में दुबई में खेलकर भी बहुत अच्छे परिणाम दिये हैं। बांग्लादेश के खिलाफ शुरू से उसका पलड़ा भारी माना जा रहा था। बांग्लादेश इससे पहले न्यूजीलैंड को भी अपनी सरजमीं पर कड़ा सबक सिखा चुका है और अब पाकिस्तान से पहली बार टेस्ट मैच ड्रा कराने के बाद उसके खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ा होगा। अब उसकी टीम शाकिब अल हसन जैसे खिलाड़ियों पर निर्भर नही हैं। उसके पास तमीम इकबाल, इमरूल कायेस, मुशफिकर रहीम, महमुदुल्लाह, मोनिमुल हक, सौम्या सरकार, ताइजुल इस्लाम और रूबेल हुसैन जैसे खिलाड़ी है जो ​बेहद कुशल और प्रतिभावान हैं। बस उन्हें निरंतर अच्छा प्रदर्शन करन की जरूरत है। उम्मीद है कि भारत, आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश अब बांग्लादेश को भी गंभीरता से लेंगे। 
    वेस्टइंडीज की बात करें तो उसने लगभग पिछले 15 साल में इंग्लैंड के खिलाफ केवल दूसरी जीत दर्ज की है। जुलाई 2000 के बाद इन दोनों टीमों के बीच 28 टेस्ट मैच खेले गये जिसमें वेस्टइंडीज केवल दो में जीत दर्ज कर पाया जबकि 17 मैचों में उसे हार का सामना करना पड़ा था। वेस्टइंडीज ने इससे पहले इंग्लैंड पर आखिरी जीत फरवरी 2009 में किंग्सटन में दर्ज की थी। पिछले चार . पांच वर्षों में वेस्टइंडीज ने लगभग प्रत्येक टीम का सामना किया लेकिन इस बीच वह बांग्लादेश, न्यूजीलैंड या जिम्बाब्वे पर ही जीत दर्ज कर पाया था। ऐसे में इंग्लैंड के खिलाफ जीत उसके लिये टानिक का काम करेगी। यह नहीं भूलना चाहिए पहले टेस्ट मैच में भी उसकी टीम हार के कगार पर थी लेकिन कप्तान दिनेश रामदीन और जैसन होल्डर की साहसिक पारियों से वह इसे ड्रा कराने में सफल रहा था। 
     वेस्टइंडीज की परेशानियां हालांकि अब भी समाप्त नहीं हुई हैं। यह उसकी अंदरूनी परेशानियां हैं जिनका असर टीम और उसके प्रदर्शन पर भी पड़ता रहा है। उसके पास प्रतिभा की कमी नहीं है लेकिन उसका सही तरह से इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। आईपीएल और बिग बैश जैसे टूर्नामेंटों में वेस्टइंडीज के खिलाड़ियों की मांग से पता चलता है कि कैरेबियाई देशों में अब भी क्रिकेट के लिये बहुत अधिक संभावनाएं हैं। वह अपनी खोयी प्रतिष्ठा हासिल करने का माद्दा रखता है। फिलहाल बांग्लादेश और वेस्टइंडीज के प्रदर्शन से मुझ जैसे क्रिकेट प्रेमी को वास्तव में खुशी मिली है। कोई भी खेल एकतरफा मुकाबलों के कारण जीवंत नहीं रह पाता। उसके लिये प्रतिस्पर्धा जरूरी होती है। इन मैचों में मुझे यह देखने को मिला। यह क्रिकेट के लिये अच्छा संकेत है।   

Friday, April 24, 2015

सचिन ने जन्मदिन पर जमाया शतक तो वार्न ने लिया आटोग्राफ

      ब मैंने 'सचिन के सौ शतक' लिखनी शुरू की थी तो फिर सचिन तेंदुलकर के सैकड़ों के बारे में कई रोचक तथ्य भी जानने को मिले। इन विवरण किताब में किया गया है। तेंदुलकर ने अपने इन 100 शतकों में से एक शतक अपने जन्मदिन पर भी बनाया है। शारजाह में 22 अप्रैल 1998 को तेंदुलकर ने एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक पारी खेली थी लेकिन इसके दो दिन बाद यानि 24 अप्रैल 1998 को भी उन्होंने उसी प्रतिद्वंद्वी आस्ट्रेलिया के खिलाफ शतक लगाया था। भारत ने उनके इस शतक के दम पर खिताब जीता था। तेंदुलकर का वह 25वां जन्मदिन था और आज वह अपना 42वां जन्मदिन मना रहे हैं। इसलिए सबसे पहले तो बल्लेबाजी के बादशाह को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं।

      तेंदुलकर ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ उस दिन 134 रन बनाये थे जिसके लिये उन्होंने 131 गेंदें खेली थी तथा 12 चौके और तीन छक्के लगाये थे। भारत ने शारजाह कप का यह फाइनल मैच छह विकेट से जीता था। उस दिन भी दो दिग्गजों के बीच जबर्दस्त मुका​बला देखने को मिला था। तेंदुलकर के सामने शेन वार्न थे जिनकी प्रतिद्वंद्विता को लेकर मीडिया कई तरह के किस्से गढ़ते रहा है। दर्शक भला कब चुप रहने वाले थे। तेंदुलकर को बल्लेबाजी करते हुए देखने और साथ में उन्हें जन्मदिन की बधाई देने के लिये उस दिन 24 हजार से अधिक दर्शक स्टेडियम में पहुंचे हुए थे। जब वार्न गेंदबाजी के लिये आये तो उनकी मांग यही थी कि तेंदुलकर उन पर छक्का जड़ें। भारतीय बल्लेबाज ने दर्शकों को निराश नहीं किया। ​तेंदुलकर ने वार्न की गेंद पर आगे बढ़कर लांग आन पर दर्शनीय छक्का लगाया था। शतक पूरा करने के बाद उन्होंने वार्न की दो गेंदों पर चौके जड़े थे। मैं यह सब जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि मैच समाप्त होने के बाद तेंदुलकर के पास आटोग्राफ लेने के लिये जो व्यक्ति सबसे पहले पहुंचा था वह कोई और नहीं बल्कि शेन वार्न था। उन्होंने अपनी जर्सी पर तेंदुलकर का आटोग्राफ ​लिया था। 
      उस मैच में टोनी ग्रेग कमेंट्री कर रहे थे तो तेंदुलकर के जबर्दस्त प्रशंसकों में शामिल थे। वह सचिन के हर शाट पर लगभग चीखती आवाज में दर्शकों का उत्साह बढ़ा रहे थे। तब पहली बार ग्रेग ने तेंदुलकर की तुलना सर डान ब्रैडमैन से की थी। उन्होंने कहा था, ''ब्रैडमैन के यदि कोई बेहद करीब है तो यह छोटे कद का इंसान है।''
    यह तो थी तेंदुलकर के अपने जन्मदिन पर बनाये गये शतक की कहानी। आपको रिकार्ड के लिये बता दूं कि 24 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पहला शतक तेंदुलकर ने ही बनाया था। हां जी यह पहला अवसर था जबकि 24 अप्रैल को किसी बल्लेबाज ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतक पूरा किया था। इसके बाद न्यूजीलैंड के क्रेग मै​कमिलन ने 24 अप्रैल 2002 को पाकिस्तान के खिलाफ वनडे मैच में रावलपिंडी में 105 रन बनाये थे। विश्व कप 2007 का सेमीफाइनल 24 अप्रैल को खेला गया था। सबीना पार्क किंग्सटन में खेले गये इस मैच में श्रीलंका के माहेला जयवर्धने ने न्यूजीलैंड के खिलाफ नाबाद 115 रन बनाये थे। टेस्ट क्रिकेट में आस्ट्रेलिया के मैथ्यू वेड ने 24 अप्रैल को सबसे पहले शतक पूरा किया था। इस विकेटकीपर बल्लेबाज ने वेस्टइंडीज के खिलाफ विंडसर पार्क रोसेउ में 24 अप्रैल 2012 की सुबह अपनी पारी 22 रन से आगे बढ़ाकर 106 रन तक पहुंचायी थी। यह वेड का टेस्ट क्रिकेट में पहला शतक था। 

Saturday, April 11, 2015

आज गुगली भी दुखी होगी बेनो

     रिची बेनो नहीं रहे और मुझे बर्नार्ड बोसेनक्वेट की याद आने लगी। बोसेनक्वेट वही शख्स जिन्होंने क्रिकेट को 'गुगली' से अवगत कराया। बोसेनक्वेट ने 'ट्विस्टी ट्वोस्टी' खेलते हुए लेग स्पिनरों को एक नया अस्त्र दे दिया था। बोसेनक्वेट इंग्लैंड के आलराउंडर थे, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उनके देश में कभी कोई ऐसा गेंदबाज नहीं हुआ जो गुगली में माहिर रहा हो। वह तो आस्ट्रेलिया था जिसके गेंदबाजों ने गुगली को पूरा मान सम्मान दिलाया। बोसेनक्वेट ने आस्ट्रेलिया में मार्च 1903 में सबसे पहली बार विक्टर ट्रम्पर को गुगली की थी। उसी दिन से आस्ट्रेलियाई गुगली के कायल हो गये और फिर उसके गेंदबाजों ने इसे अपना मारक हथियार बना दिया। आस्ट्रेलिया में बोसेनक्वेट के नाम पर गुगली को 'बोसी' भी कहा जाता है। वैसे वे लोग इसे 'रांग उन' के नाम से अधिक जानते हैं। आस्ट्रेलिया के गेंदबाजों की लंबी फेहरिश्त है जो गुगली में माहिर थे। 
गुगली का महारथी रिची बेनो
     हरबर्ट हारडर्न पहले आस्ट्रेलियाई गेंदबाज थे जिन्होंने गुगली को अपनाया। क्लेरी ग्रिमेट ने इसे विशेष पहचान दिलायी तो रिची बेनो ने गुगली को नयी ऊंचाईयों तक पहुंचाया। बेनो ने 63 टेस्ट मैचों में 248 विकेट लिये। उनके बाद शेन वार्न ने आस्ट्रेलिया में यह परंपरा आगे बढ़ायी लेकिन इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा जिस देश ने क्रिकेट जगत को गुगली के महारथी दिये वहीं आज यह विधा दम तोड़ती नजर आ रही है। वार्न और स्टुअर्ट मैकगिल के बाद कोई भी आस्ट्रेलियाई गेंदबाज ऐसा नहीं है जो गुगली पर अधिकार रखता हो। स्टीवन स्मिथ ने अपने करियर के शुरू में गुगली करने का अच्छा प्रयास किया था लेकिन अब वह विशुद्ध बल्लेबाज बन गये हैं। 
     बेनो, जब इस शख्स का नाम सुनाई देता है तो एक ऐसे कमेंटेटर की छवि जेहन में तैरने लगती है जिसकी आवाज ही उनकी पहचान बन गयी थी। क्रिकेटरों को मैदान छोड़ने के बाद कमेंट्री बाक्स तक पहुंचना बेनो ने ही सिखाया था। बेनो इससे बढ़कर एक बेहतरीन आलराउंडर, लाजवाब कप्तान और गुगली के महारथी थे। अपनी नयी किताब की तैयारियों के समय गुगली पर काफी कुछ जानने समझने की कोशिश की तो मुझे बेनो एक ऐसे लेग स्पिनर नजर आये जिन्हें लगता था कि गुगली करना सबसे आसान काम है। उन्होंने एक बार कहा था, ''गुगली करते समय हाथ पहले आसमान चूमता है और उसके तुरंत बाद जमीन को। '' वैसे बेनो यह भी सलाह देते रहे कि भाई जमकर अभ्यास करो तभी गुगली सीख पाओगे अन्यथा इस गेंद को भूल जाओ। बेनो ने भी घंटों तक अभ्यास करने के बाद गुगली में महारत हासिल की थी। 
     ब जबकि बेनो नहीं रहे तब 'गुगली', 'फ्लिपर' जैसी गेंदें भी मायूस होंगी। सचाई तो यह है कि एक समय जब लेग ब्रेक गेंदबाजी और गुगली पर संकट मंडरा रहा था तब वह बेनो थे जिन्होंने इनमें जान भरी और नयी पहचान दिलायी। उन्हें अब भी दुनिया का सर्वश्रेष्ठ लेगब्रेक गुगली गेंदबाज माना जाता है। क्लेरी ग्रिमेट और बेनो के बीच इंग्लैंड के लिये कुछ मैचों में एरिक होलीज खेले थे। यह वही होलीज थे जिन्होंने डान ब्रैडमैन को उनकी आखिरी टेस्ट पारी में शून्य पर आउट करके उन्हें अपना टेस्ट औसत 100 तक नहीं ले जाने दिया था। होलीज की वह गेंद गुगली थी। ब्रैडमैन बड़ा नाम था और इसलिए गुगली भी चर्चा में आ गयी। बेनो को शायद इस गेंद से प्रेरणा मिली। वह तब प्रथम श्रेणी क्रिकेट में कदम रखने की तैयारी कर चुके थे। बेनो ने गुगली पर मेहनत करनी शुरू कर दी और फिर लगभग डेढ़ दशक तक दुनिया भर के बल्लेबाजों को इस गेंद से चकमा देते रहे। भारत के सुभाष गुप्ते उनके समकालीन थे। भारत में बाद में भगवत चंद्रशेखर और अनिल कुंबले ने गुगली की परंपरा को आगे बढ़ाया। यहां तक कि सचिन तेंदुलकर भी अच्छी गुगली कर लेते थे। अब अमित मिश्रा हैं जो गुगली अच्छी तरह से कर लेते हैं। पाकिस्तान में अब्दुल कादिर थे जिन्हें एक समय गुगली का पर्याय समझा जाता था।
    गुगली इंग्लैंड के बाद सीधे आस्ट्रेलिया नहीं बल्कि दक्षिण अफ्रीका पहुंची थी। बोसेनक्वेट के बाद दक्षिण अफ्रीका के रेगी श्वार्ज ने गुगली की विधा को आगे बढ़ाया था। आज पाकिस्तान में जन्मा एक लेग स्पिनर इमरान ताहिर गुगली को वापस दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट का हिस्सा बना रहा है। असल में विश्व क्रिकेट में कभी एक साथ कई लेगब्रेक गुगली गेंदबाज देखने को नहीं मिले। कई बार लगा कि यह विधा दम तोड़ देगी तभी बेनो जैसा कोई स्पिनर पैदा हो जाता। अब एक बेनो चला गया इस उम्मीद में कि दुनिया में फिर कई और बेनो पैदा होंगे और गुगली तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जिंदा रहेगी। 

Tuesday, April 7, 2015

आईपीएल : कुछ दिलचस्प आंकड़े

.... चेन्नई सुपरकिंग्स ने रविंद्र जडेजा को आलराउंडर के तौर पर करोड़ों रूपये देकर खरीदा था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जडेजा को अब भी आईपीएल में पहले अर्धशतक का इंतजार है। उन्होंने आईपीएल में 94 मैचों में 1251 रन बनाये हैं और उनका उच्चतम स्कोर 48 रन है। दिलचस्प बात यह है कि जडेजा ने टी20 में ओवरआल 134 मैच खेले हैं लेकिन आज तक वह इस प्रारूप में अर्धशतक नहीं लगा पाये हैं।
.... गौतम गंभीर, विराट कोहली, रोबिन उथप्पा, महेंद्र सिंह धोनी, शिखर धवन, दिनेश कार्तिक उन बल्लेबाजों में शामिल हैं जिन्होंने आईपीएल में 2000 से अधिक रन बनाये हैं लेकिन उन्हें टी20 के इस टूर्नामेंट में अब भी पहले शतक का इंतजार है। आईपीएल में सर्वाधिक चार शतक क्रिस गेल ने लगाये हैं।
 .... आईपीएल में सर्वाधिक रन (3325) सुरेश रैना ने बनाये हैं लेकिन सर्वाधिक छक्कों का रिकार्ड क्रिस गेल के नाम पर हैं। गेल ने अब तक 192 छक्के लगाये हैं और आईपीएल में छक्कों का दोहरा शतक पूरा करने के लिये उन्हें केवल आठ छक्के चाहिए। लगता नहीं कि अगले सत्र में भी कोई दूसरा बल्लेबाज इस मुकाम पर पहुंच पाएगा क्योंकि गेल के बाद सर्वाधिक छक्के लगाने वाले बल्लेबाजों की सूची में दूसरे नंबर पर रैना (134 छक्के) हैं। गौतम गंभीर ने आईपीएल में सर्वाधिक 327 चौके लगाये हैं। दिल्ली रणजी टीम के उनके साथी वीरेंद्र सहवाग (322 चौके) उनसे थोड़े ही पीछे हैं।
.... सचिन तेंदुलकर ने आईपीएल तीन यानि 2010 में सर्वाधिक रन बनाने के लिये औरेंज कैप हासिल की थी लेकिन तब उन्होंने केवल तीन छक्के लगाये थे जो कि पिछले सात सत्र में ओरेंज कैप विजेता द्वारा लगाये गये सबसे कम छक्के हैं। तेंदुलकर ने हालांकि 86 चौके लगाये थे जो कि एक सत्र में सर्वाधिक चौकों का रिकार्ड है। दूसरी तरफ क्रिस गेल ने जब 2012 में ओरेंज कैप हासिल की थी तो उन्होंने 59 छक्के लगाये थे जो रिकार्ड है। गेल ने तब केवल 46 चौके लगाये थे यानि किसी ओरेंज कैप विजेता द्वारा लगाये गये सबसे कम चौके।
.... रैना एकमात्र ऐसे खिलाड़ी हैं जो आईपीएल में अब तक अपनी टीम की तरफ से सभी मैचों में खेले हैं। रैना शुरू से चेन्नई सुपरकिंग्स से जुड़े रहे हैं और उन्होंने इस टीम के लिये हर मैच में हिस्सा लिया है। रैना ने आईपीएल में सर्वाधिक 115 मैच खेल लिये हैं। धौनी 112 मैच के साथ दूसरे स्थान पर हैं। धौनी ने अपने सभी मैच कप्तान के रूप में खेले हैं जो कि रिकार्ड है। वह जिन तीन मैचों में नहीं खेल पाए उनमें रैना ने कप्तानी की थी जानकारी के लिये बतादें कि टी20 में धौनी ने रिकार्ड 185 मैचों में कप्तानी कर चुके हैं। गंभीर 106 मैच के साथ दूसरे स्थान पर हैं।
.... महेंद्र सिंह धौनी, सुरेश रैना (चेन्नई सुपरकिंग्स), विराट कोहली (रायल चैलेंजर्स बेंगलूर), हरभजन सिंह (मुंबई इंडियन्स), शेन वाटसन (राजस्थान रायल्स) और शान मार्श (किंग्स इलेवन पंजाब) ऐसे खिलाड़ी हैं जो पहले आईपीएल यानि 2008 से लेकर आज तक एक ही टीम से खेल रहे हैं। आठवें आईपीएल में भी ये खिलाड़ी इन्हीं टीमों से खेलते हुए नजर आएंगे।
.... पिछली बार जब सातवां आईपीएल शुरू हुआ था तो क्रिस गेल को टी20 में 6000 रन पूरा करने वाला पहला बल्लेबाज बनने के लिये छह रन की दरकार थी। इस बार वह इस प्रारूप में 7000 रन पूरे करने वाला पहला बल्लेबाज बन जाएंगे। इसके लिये उन्हें केवल 25 रन की दरकार है। गेल को टी20 में 500 छक्के लगाने वाला पहला बल्लेबाज बनने के लिये भी केवल 14 छक्कों की दरकार है। वेस्टइंडीज के उनके साथी कीरोन पोलार्ड (335 छक्के) दूसरे नंबर पर हैं लेकिन गेल से काफी पीछे हैं।
.... आईपीएल में सर्वाधिक 119 विकेट लेसिथ मालिंगा ने लिये हैं। अमित मिश्रा 102 विकेट के साथ दूसरे स्थान पर हैं। पीयूष चावला, हरभजन सिंह और आर विनयकुमार को आईपीएल में विकेटों का शतक पूरा करने के लिये दस से भी कम विकेट चाहिए।
.... टी20 क्रिकेट में सर्वाधिक 148 कैच लेने का रिकार्ड पोलार्ड के नाम पर है। अब तक कोई भी भारतीय क्षेत्ररक्षक कैच का सैकड़ा पूरा नहीं कर पाया है। रैना तीन कैच लपकते ही यह मुकाम हासिल कर लेंगे। पोलार्ड के अलावा डेविड हसी और ड्वेन ब्रावो ही टी20 में 100 से अधिक कैच लपक पाये हैं। रैना अभी चौथे स्थान पर हैं।


Monday, March 30, 2015

आस्ट्रेलिया, साइना और श्रीकांत : बेदर्द बनकर ​बने विजेता

                                        धर्मेन्द्र पंत 

  स्ट्रेलिया पांचवीं बार चैंपियन बन गया। नेपोलियन ने कहा था, ''इतिहास विजेता का होता है।'' इसलिए माफ करना न्यूजीलैंड। सब आपकी सराहना कर रहे हैं। वास्तव में आपने अच्छा खेल दिखाया लेकिन विजेता वही होता है जो अंतिम किला भी जीते। आस्ट्रेलिया विजेता  है और जब विश्व कप के विजेताओं का जिक्र किया जाएगा तो उसमें न्यूजीलैंड का नाम नहीं होगा। इसलिए कह सकते हो कि इतिहास बेदर्द होता है लेकिन उसका यही रवैया हमें जीतना सिखाता है। आस्ट्रेलिया ने यह सीख बहुत पहले हासिल कर ली थी, इसलिए वह पांचवी बार विजेता बना है। उसके सामने कोई भी टीम हो उसके लिये वह एक प्रतिद्वंद्वी है। उसके पास अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिये रहम जैसा कोई शब्द नहीं है। अगर आपने रहम दिखाना शुरू किया तो फिर विजेता नहीं बन सकते। विजेता बनने की राह में आप खुद को सजा देते हो और दूसरों को भी मजा चखाते हो। आस्ट्रेलिया ने ऐसा किया और वह चैंपियन बन गया।
      न्यूजीलैंड छह बार सेमीफाइनल में नाकाम रहने के बाद पहली बार फाइनल में पहुंचा था और उसके खिलाड़ियों में किसी हद तक संतुष्टि का पुट भर गया था। आस्ट्रेलिया की तो जैसे मुराद पूरी हो गयी थी। उसके खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंद्वियों पर चीते की तरह झपट पड़े थे। उसने भारतीयों की इसी कमजोरी का फायदा सेमीफाइनल में उठाया था। विश्व कप से पहले भारत का प्रदर्शन जैसा था उससे कोई नहीं मान रहा था कि वह अंतिम चार में पहुंचेगा। भारत सेमीफाइनल में पहुंचा और उसके युवा खिलाड़ियों को लगा कि उन्होंने बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। यह बल्लेबाजों और गेंदबाजों दोनों में दिखा और फिर क्या हुआ वह सभी जानते हैं। न्यूजीलैंड सेमीफाइनल के मिथक को तोड़ने के लिये बेताब था और उसकी यह दृढ़ इच्छा दक्षिण अफ्रीका को लील गयी जिसके खिलाड़ी पहली बार नाकआउट की बाधा करके चैंपियनों की तरह व्यवहार करने लग गये थे। इसलिए आस्ट्रेलिया से सीख लेने की जरूरत है। सिर्फ क्रिकेटरों ही नहीं बल्कि हर खेल से जुड़े खिलाड़ियों और हर क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति को भी। 

     भारत में इस तरह की सीख कुछ खिलाड़ियों ने हासिल कर ली है या यूं कहें कि उनमें जन्मजात इस तरह के गुण थे। इन खिलाड़ियों में साइना नेहवाल सबसे ऊपर है और इसलिए आज वह दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी है। मुझे साइना और एक अन्य भारतीय किदाम्बी श्रीकांत की इंडिया ओपन सुपर सीरीज बैडमिंटन टूर्नामेंट की जीत आस्ट्रेलिया की जीत से ज्यादा प्रभावित कर गयी। साइना को देखकर हो सकता है कि आपके मन में सवाल उठे कि वह दंभी है लेकिन असल में यह उनका आत्मविश्वास है जो उनकी सफलता का राज भी है। चीन ने अपने खिलाड़ियों में यह दृष्टिकोण भरा और आज देखिये कि ओलंपिक में उसका दबदबा है। चीन को बैडमिंटन का बादशाह कह सकते हो लेकिन उसकी महिला खिलाड़ी पिछले कुछ वर्षों से केवल साइना से खौफ खाती हैं। असल में साइना ने उनको उन्हीं की भाषा में जवाब दिया। साइना कभी संतुष्ट नहीं हो सकती और साइना कभी हार नहीं मानती है,  इसलिए वह विजेता है। श्रीकांत के साथ भी यह सकारात्मक पहलू जुड़ा है कि वह आत्मविश्वास से भरा है, कभी दबाव में नहीं आता और सहज होकर खेलता है। साइना की तरह वह भी प्रतिद्वंद्वी के नाम से नहीं डरता। इसलिए वह लिन डैन को भी हरा देता है। 
       यह भारत के लिये गौरव की बात है कि उसके पास साइना और श्रीकांत जैसे खिलाड़ी हैं जो जानते हैं कि जीत कैसे दर्ज की जाती है। यदि कभी इन दोनों ने संतोष शब्द अपना दोस्त बना दिया तो फिर उनका जीत का जज्बा भी ढीला पड़ जाएगा। खेल का नियम तो यही कहता है। अच्छा खिलाड़ी बनने या सफलता हासिल करने के लिये समर्पण, प्रतिबद्धता, कड़ी मेहनत और जुनून का होना जरूरी है लेकिन यदि ​आप खिलाड़ी है तो आपके पास जज्बा भी होना चाहिए। आपका बेदर्द होना भी जरूरी है। इसलिए मैं हमेशा सौरव गांगुली को भारत का सर्वश्रेष्ठ कप्तान मानता हूं। गांगुली ने भारतीयों को सिखाया था कि आस्ट्रेलिया को उसी की भाषा में कैसे जबाव देना है या इंग्लैंड को कैसे सबक सिखाना है। गांगुली ने यह सीख भारतीय क्रिकेटरों को दी थी लेकिन इससे भारत के अन्य खेलों को भी फायदा हुआ। भारत के दूसरे खेलों ने भी कुछ हद तक सबक लिया। आप देख सकते हो कि गांगुली के कप्तान बनने के बाद भारत ने क्रिकेट ही नहीं कई अन्य खेलों में भी सफलताएं हासिल की थी। साइना और श्रीकांत उसे आगे बढ़ा रहे हैं। भविष्य के खिलाड़ी साइना और श्रीकांत से सबक लेंगे। इसी तरह से देश आगे बढ़ते हैं। इसलिए विजेता बनना है तो विजेताओं का अनुसरण करो। आस्ट्रेलिया से सबक लो, साइना से सीखो और श्रीकांत को समझो। फायदे में रहोगे। 

Friday, March 27, 2015

क्रिकेट में हार पर दुख और खुशी

                                  धर्मेन्द्र पंत 

    भारतीय क्रिकेट टीम हार गयी। मुझे दुख नहीं हुआ। यह दुख बहुत पहले काफूर हो चुका था। मुझे याद है ​1987 के विश्व कप सेमीफाइनल की। भारत का सामना इंग्लैंड से था और लक्ष्य का पीछा करते हुए भारतीय विकेट धड़ाधड़ गिर रहे थे। मैं तब रेडियो पर कमेंट्री सुन रहा था। कमेंटेटर के मुंह से जैसे ही निकला, ''ये रवि शास्त्री का हवा में लहराता शाट और कैच आउट ...।'' रेडियो की सलामती के लिये उसे पिताजी को सौंप दिया था। शायद यह आखिरी क्षण था जबकि मुझे भारतीय टीम की हार पर दुख हुआ। इसके बाद एक पत्रकार के रूप में खेलों से जुड़ा और यह जीवन का हिस्सा बन गया। जल्द ही समझ में आ गया कि अगर दो टीमें आपस में खेलेंगी तो जीत एक को ही मिलेगी। एक टीम को हारना है तभी दूसरी जीतेगी। हारने वाली टीम भारत की भी हो सकती है। यही खेल है। यही जिंदगी है। भारत की जीत के साथ हार की रिपोर्ट भी कई बार तैयार की लेकिन दोनों के साथ पूरा न्याय किया। 
      भारत की हार पर मैंने लोगों की प्रतिक्रियाएं भी देखी। हार पर आक्रामक प्रतिक्रिया देने वालों को मैंने कभी क्रिकेट प्रेमी नहीं माना। किसी खेल का प्रेमी हुड़दंगी नहीं होता। वे निराश हो सकते हैं, वे दुखी हो सकते हैं, वे किसी खिलाड़ी को कोस सकते हैं लेकिन उसे गाली नहीं दे सकते। उसके पुतले नहीं जला सकते। उसके घर में पथराव नहीं कर सकते। ऐसे लोगों पर मुझे हमेशा दया आयी। मैंने उनमें एक अपरिपक्व इंसान देखा। सिडनी में आस्ट्रेलिया के हाथों भारत की हार के बाद विराट कोहली की महिला मित्र अनुष्का शर्मा को कोसने वाले व्यक्ति भी इसी श्रेणी में आते हैं। ये सभी लोग दया के पात्र हैं। वे उस भीड़ का हिस्सा हैं जिनका न तो क्रिकेट से लेना देना है और ना ही देश से। उन्हें तो बस बात का बतंगड़ बनाना है और मुझे अफसोस इस बात का है कि मीडिया से जुड़े कुछ लोग भी इसमें शामिल हैं। प्रिंट मीडिया फिर भी संयम दिखाता है लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया का व्यवहार कई अवसरों पर बेहद असंयमित हो जाता है। यह ठीक उसी तरह से है जैसे कि कोई अफसर चंद रूपयों की खातिर अपना ईमान बेचे दे। तथाकथित टीआरपी के लिये पत्रकारिता को मत बेचिये प्लीज। 
         यह तो रही दुख, निराशा और अतिरंजित प्रतिक्रिया करने वाले लोगों की बात। एक और वर्ग है। यह वह वर्ग है जो भारत की हार पर खुश होता है और इसमें वे लोग शामिल हैं जिनको लगता है कि क्रिकेट देश के अन्य खेलों को बर्बाद कर रहा है क्योंकि हाकी या फुटबाल में हार पर विस्फोटक प्रतिक्रियाएं देखने या सुनने को नहीं मिलती। क्या वास्तव में इस सबके लिये क्रिकेट दोषी है। मैं ऐसा नहीं मानता। इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका में तो क्रिकेट के साथ साथ फुटबाल, रग्बी, हाकी आदि टीम गेम भी समान रूप से आगे बढ़े हैं। विश्व कप की दूसरी फाइनलिस्ट न्यूजीलैंड में रग्बी हावी है। हालैंड हाकी का दीवाना है ​लेकिन फुटबाल में उसकी टीम अव्वल दर्जे की है और वह क्रिकेट में भी दखल देता है। जर्मनी के सामने फुटबाल हो या हाकी दुनिया की कोई टीम टिक नहीं सकती। ऐसे कई देश हैं जिन्होंने कई टीम खेलों में अपनी महारत दिखायी और वे समान रूप से आगे बढ़े। 
     फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं हो पाया। इसके कई कारण हैं। इनमें पहला कारण तो भारतीय खेल संघों की व्यवस्था और लालफीताशाही है। खिलाड़ियों के लिये सुविधाओं का अभाव है। लेकिन सबस अहम कारण टीमों का विश्व स्तर पर अच्छे परिणाम नहीं देना है। आखिर जब हाकी टीम ने एशियाड में स्वर्ण पदक जीता था तो फिर देश के हर खेल प्रेमी ने खिलाड़ियों को सर आंखों पर बिठाया था। अभिनव बिंद्रा का ओलंपिक स्वर्ण आज भी हर भारतीय की जुबान है और मेरीकाम या साइना नेहवाल से पूछिये कि ओलंपिक में पदक की कीमत क्या होती हैं। उन्होंने प​रिणाम दिये तो आज भारतीय खेलों में उनका दर्जा महारानी जैसा है। सानिया मिर्जा एक समय कमाई और लोकप्रियता दोनों में तब के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटरों को बराबर की टक्कर देती थी। कई नाम हैं लिएंडर पेस, महेश भूपति, सुशील कुमार, विजेंदर सिंह, दीपिका कुमारी, जीव मिल्खा सिंह, बाईचुंग भूटिया, सरदार सिंह जिनको मीडिया ने हमेशा तवज्जो दी। मुझे नहीं लगता कि इनमें से कोई भी ऐसा खिलाड़ी होगा जो देश में दूसरे खेलों की दुर्दशा के लिये क्रिकेट को दोषी देगा। आखिर क्रिकेट हमें ज्यादा मनोरंजन देता है तो फिर उसे क्यों कोसा जाए। मुझे तो लगता है कि यह खुश होने का कारण है कि चलो एक खेल तो ऐसा है जिसमें हम विश्व में जीवंत उपस्थिति दर्ज कराते हैं। 
    इसलिए क्रिकेट हो या हाकी हर खेल का मजा लीजिए। खेल मनोरंजन के लिये होते हैं। उनका आनंद उठाइये। गुस्सा और घृणा को थूक दीजिए। 

Saturday, March 21, 2015

वनडे में अब दोहरे नहीं तिहरे शतक का इंतजार

                                                                                 धर्मेन्द्र पंत 
   कदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पहला दोहरा शतक लगने में 39 साल से भी अधिक समय तक इंतजार करना पड़ा और अब आलम यह है कि एक महीने के अंदर दो दोहरे शतक लग गये। पिछले चार दशकों में 'पाजामा क्रिकेट' का रंग रूप, स्वरूप सब बदल गया है। इसमें विकेट गिरते हैं लेकिन रन ज्यादा बरसते हैं। आईसीसी खुश है और अब एसीबी (अब क्रिकेट आस्ट्रेलिया) भी इसे पाजामा क्रिकेट नहीं कहता है। बहरहाल यह अलग विषय है। हम तो वनडे में बड़ी व्यक्तिगत पारियों और शतकों की बात कर रहे थे। 
     पांच जनवरी 1971 को इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया के बीच पहला एकदिवसीय मैच खेला गया था। इस मैच में इंग्लैंड के बायें हाथ के बल्लेबाज जान एल्ड्रिच ने 82 रन बनाये और इस तरह से वनडे में पहला बड़ा स्कोर का रिकार्ड उनके नाम पर दर्ज हो गया। यह रिकार्ड पूरे डेढ़ साल बना रहा क्योंकि इसके बाद अगला वनडे 24 अगस्त 1972 को खेला गया था जिसमें इंग्लैंड के ही डेनिस एमिस ने इस प्रारूप का पहला शतक जड़ा था। उन्होंने 103 रन बनाये। एक साल बाद रिकार्ड बायें हाथ के एक अन्य बल्लेबाज राय फ्रेडरिक्स के नाम पर दर्ज हो गया। उन्होंने वेस्टइंडीज की तरफ से इंग्लैंड के खिलाफ ओवल में 105 रन बनाये। इंग्लैंड के डेविड लायड ने इसे अगले साल यानि अगस्त 1974 में नाबाद 116 रन बनाये जबकि 1975 में खेले गये पहले विश्व कप में न्यूजीलैंड के ग्लेन टर्नर ने नाबाद 171 रन तक पहुंचा दिया। 
        पहली बार किसी बल्लेबाज ने वनडे में 150 रन के स्कोर को पार किया था। तब यह माना जा रहा था कि इस रिकार्ड तक पहुंचना मुश्किल होगा, क्योंकि मैच भी कम खेले जाते थे और शतक भी कम लगते थे। एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के जन्म के बाद से लेकर पहले दशक यानि सत्तर के दशक में नौ साल में केवल 24 शतक लगे। इनमें से सर्वाधिक दस शतक इंग्लैंड के बल्लेबाजों ने लगाये। भारत का तो कोई बल्लेबाज तिहरे अंक में भी नहीं पहुंच पाया था लेकिन अगला विश्व रिकार्ड एक भारतीय ने ही बनाया था। वह 18 जून 1983 का दिन था जबकि कपिल देव ने टन ब्रिज वेल्स में जिम्बाब्वे के खिलाफ विश्व कप मैच में नाबाद 175 रन की ऐतिहासिक पारी खेली थी। 
    अब मैच ज्यादा खेले जाने लगे थे और शतक भी बनने लगे थे। अस्सी के दशक में वनडे में कुल 134 सैकड़े बनाये गये। वेस्टइंडीज ने सर्वाधिक 39 जबकि आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान ने 25.25 शतक लगाये थे। भारत की तरफ से भी 17 शतक लगे। सत्तर के दशक में जहां 150 से अधिक का केवल एक स्कोर बना वहीं अस्सी के दशक में ऐसे स्कोर की संख्या पांच पहुंच गयी। वेस्टइंडीज के विव रिचडर्स ने  एक साल में ही कपिल का रिकार्ड अपने नाम कर दिया था। उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ मैनचेस्टर में नाबाद 189 रन बनाये लेकिन दोहरे शतक तक नहीं पहुंच पाये। रिचर्ड्स ने इसके अलावा 181 रन की एक अन्य पारी खेली थी। उनके देश के डेसमंड हेन्स और इंग्लैंड के डेविड गावर भी 150 रन की संख्या को छूने में सफल रहे थे। 

बनने लगे बड़े स्कोर, टूटने लगे रिकार्ड 

       रिचर्ड्स ​के नाम पर 13 साल तक रिकार्ड बना रहा और आखिर में नब्बे के दशक में पाकिस्तान के सईद अनवर ने इसे तोड़ दिया। अनवर 21 मई 1997 को भारत के खिलाफ चेन्नई में जब दोहरे शतक से एक शाट दूर थे तब सचिन तेंदुलकर ने उन्हें आउट कर दिया। शायद भगवान ने भी पहला दोहरा शतक बनाने का रिकार्ड क्रिकेट के भगवान के नाम पर लिखा था। बहरहाल नब्बे के दशक में वनडे में कुल 315 शतक लगे जिनमें 15 स्कोर 150 रन या इससे अधिक के बने थे। दक्षिण अफ्रीका के गैरी कर्स्टन भी विश्व कप 1996 के एक मैच में नाबाद 188 रन तक पहुंचे थे। इस दशक में तेंदुलकर ने सर्वाधिक 24 जबकि अनवर ने 17 शतक लगाये थे। 
    अनवर का 194 रन के रिकार्ड तक पहुंचना बल्लेबाजों के लिये चुनौती बना रहा। नयी सदी के पहले दशक में यह रिकार्ड नहीं टूटा। इस दौरान 465 वनडे मैचों में 565 शतक लगे। 150 रन या इससे अधिक के 35 स्कोर बने। भारत ने 88, आस्ट्रेलिया ने 82, श्रीलंका ने 64, पाकिस्तान ने 62 और दक्षिण अफ्रीका की तरफ से 60 शतक लगे। रिकी पोंटिंग 23, सनथ जयसूर्या और तेंदुलकर 21.21 तथा क्रिस गेल और हर्शल गिब्स 19.19 शतक लगाने में सफल रहे लेकिन अनवर के रिकार्ड तक जिम्बाब्वे के चार्ल्स कावेंट्री ही पहुंच पाये। कावेंट्री ने असल में बांग्लादेश के खिलाफ बुलावायो में 16 अगस्त 2009 में नाबाद 194 रन बनाकर इसकी बराबरी की थी। अनवर ने राहत की सांस ली लेकिन नयी सदी के दूसरे दशक के शुरू में ही यानि 24 फरवरी 2010 को तेंदुलकर दोहरे शतक तक पहुंचने वाले बल्लेबाज बन गये। 
         तेंदुलकर ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ ग्वालियर में नाबाद 200 रन बनाये थे लेकिन यह तय था कि उनका यह रिकार्ड ज्यादा समय तक नहीं टिक पाएगा क्योंकि ​एकदिवसीय मैचों के नियम बल्लेबाजों के अनुकूल बना दिये गये। बाउंड्रीज अपेक्षाकृत छोटी बन गयी और बल्ले में भी इतना दमखम भर दिया गया कि छक्के जड़ना पहले की तरह मुश्किल नहीं रहा। तिस पर क्रिकेट का सबसे छोटा बेटा टी20 भी पैदा हो गया। वह अपने बड़ों को सिखाने लगा कि तेजी से रन कैसे बनाये जाते हैं। टेस्ट मैचों में परिणाम ज्यादा आने लगे तो वनडे को इससे सबसे ज्यादा फायदा हुआ। यहां रन बरसने लगे। अब आप ही देख लीजिए की पिछले लगभग पांच वर्षों में 289 मैचों में 385 शतक बन चुके हैं। इनमें 200 या इससे अधिक छह स्कोर शामिल हैं। मतलब पांच साल में छह दोहरे शतक। जिस 150 रन को कभी बल्लेबाज लक्ष्य लेकर चलते थे उस पांच वर्ष में 22 बल्लेबाजों ने 31 बार हासिल कर लिया है। भारत ने पिछले पांच साल में 60, दक्षिण अफ्रीका ने 58, श्रीलंका की तरफ से 55 शतक लग चुके हैं। विराट कोहली 21, हाशिम अमला 19, तिलकरत्ने दिलशान 17, एबी डिविलियर्स 16 और कुमार संगकारा ने 15 शतक लगाये हैं।
     इसलिए अब कहा जा रहा है कि वनडे में तिहरा शतक लगाना भी संभव है यह रोहित शर्मा भी जानते है कि उनका 264 रन का रिकार्ड किसी भी दिन टूट सकता है। रोहित से पहले वीरेंद्र सहवाग ने आठ दिसंबर 2011 को इंदौर में 219 रन बनाकर तेंदुलकर का रिकार्ड तोड़ा था। रोहित ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ दो नवंबर 2013 को बेंगलूर में 209 रन बनाये लेकिन आखिर में वह इसके एक साल बाद 13 नवंबर 2014 को कोलकाता में सहवाग का रिकार्ड तोड़ने में सफल रहे। मार्टिन गुप्टिल ने नाबाद 237 रन बना दिये हैं। यह तय है कि कल कोई उनसे आगे निकलकर रोहित को पीछे छोड़ने की कोशिश करेगा और फिर 300 के लक्ष्य तक पहुंचना चाहेगा। जिस तरह से रन बरस रहे हैं उससे लगता है कि वनडे में तिहरा शतक भी इसी दशक में बन सकता है। 

Saturday, March 14, 2015

अब विशाल नहीं कहलाता 300

                                                            धर्मेन्द्र पंत 
       ईसीसी ने विश्व कप से पहले कहा था कि वह बल्ले और गेंद के बीच संतुलन पैदा करना चाहती है। उसने सीमा रेखा बढ़ाने का तर्क दिया ताकि आम शाट छक्के में तब्दील नहीं हो पाये। फिर भी रन बन रहे हैं और छक्के लग रहे हैं। अब तक जिन 39 मैचों में खेल संभव हो पाया उनमें से 25 में 300 से अधिक स्कोर बन गया है। तीन बार तो स्कोर 400 रन के पार भी पहुंच गया। रन आगे भी बनते रहेंगे क्योंकि जब नियम बल्लेबाजों के पक्ष में रहेंगे तब तक संतुलन नहीं साधा जा सकता है। पांच क्षेत्ररक्षकों को हर समय 30 गज के घेरे के अंदर रखने से नियम के चलते गेंदबाजों के साथ न्याय करने की बात नहीं की जा सकती है। इसके अलावा बल्ले इस तरह से तैयार किये जा रहे हैं उनके 'स्वीट स्पाट' की शक्ति चार गुनी बढ़ गयी है। ट्वेंटी . 20 क्रिकेट के आगमन से बल्लेबाजों के रवैये में भी बदलाव हुआ। वे अधिक आक्रामक बन गये। तिस पर नियमों और बल्ले ने भी उन्हें पूरी मदद पहुंचायी।
       मैं पिछले 23 साल से खेल पत्रकारिता कर रहा हूं। एक जमाना था जब हम एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 200 के आसपास के स्कोर को चुनौतीपूर्ण लिखते थे। 250 या 260 रन का स्कोर बड़ा हो जाता था और 300 रन, उसके लिये तो 'रनों का एवरेस्ट' खड़ा कर दिया लिखने में भी हमें गुरेज नहीं थी। लेकिन अब 400 रन के स्कोर के लिये भी इस शब्द का उपयोग करने में हिचकिचाहट होती है। आखिर विरोधी टीम भी नियमों का सहारा लेकर यहां तक पहुंच सकती है। पिछले कुछ वर्षों में यह बदलाव आया है क्योंकि 2002 में नेटवेस्ट सीरीज में भारत ने जब 326 रन का लक्ष्य हासिल किया था तो हमने यही लिखा था कि 'भारत ने इंग्लैंड के रन एवरेस्ट को बौना कर दिया।'

कभी एवरेस्ट कहलाता था 300 का स्कोर 

      ब विश्व कप में ही देख लीजिए। पहले तीन विश्व कप में प्रत्येक पारी 60 ओवर की होती थी लेकिन तब भी 250 या 300 रन तक पहुंचना मुश्किल होता था। पहले तीनों विश्व कप इंग्लैंड में खेले गये। इनमें से पहले विश्व कप में चार बार 300 रन से अधिक का स्कोर बना। इंग्लैंड ने तब भारत के खिलाफ लार्ड्स में चार विकेट पर 334 रन बनाये थे और उसका यह रिकार्ड 1983 में पाकिस्तान ने श्रीलंका के खिलाफ स्वान्सी में पांच विकेट पर 338 रन बनाकर तोड़ा था। इससे पहले 1979 विश्व कप में तो कोई भी टीम 300 रन के स्कोर तक नहीं पहुंच पायी थी। उस टूर्नामेंट का उच्चतम स्कोर छह विकेट पर 293 रन था जो वेस्टइंडीज ने पाकिस्तान के खिलाफ ओवल में बनाया था। आलम यह था कि 250 या उससे अधिक रन के केवल चार स्कोर बने थे और 19 बार टीमों ने 200 से भी कम का स्कोर बनाया था। इसके चार साल बाद 1983 में हालांकि 15 बार टीमों ने 250 या इससे अधिक रन बनाये। चार बार 300 से अधिक का स्कोर बना।
     पहली बार विश्व कप 1987 में इंग्लैंड से बाहर निकला। अब ओवरों की संख्या घटकर 50 रह गयी थी लेकिन बल्लेबाज तेजी से रन बनाना सीख रहे थे। भारत और पाकिस्तान में खेले गये विश्व कप 1987 में केवल एक बार 300 से अधिक का स्कोर बना। वेस्टइंडीज ने श्रीलंका के खिलाफ कराची में चार विकेट पर 360 रन का विशाल स्कोर खड़ा कर दिया था। वैसे इस टूर्नामेंट में 250 रन से अधिक 16 स्कोर बने थे। 
        आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने इससे पहले 1992 में विश्व कप की मेजबानी की थी लेकिन तब भी रनों की बारिश नहीं हुई थी। केवल दस पारियों में 250 रन से अधिक का स्कोर बना था। सिर्फ दो टीमें 300 रन के 'पहाड़' को पार कर पायी थी और दिलचस्प तथ्य ये है कि ये दोनों स्कोर एक ही मैच में बने थे। जिम्बाब्वे ने न्यू प्लाईमाउथ में श्रीलंका के खिलाफ चार विकेट पर 312 रन बनाये। यह एंडी फ्लावर का पहला वनडे थे जिसमें उन्होंने 115 रन बनाये और एंडी वालेर ने 45 गेंदों पर 83 रन ठोके थे। श्रीलंका ने हालांकि सात विकेट पर 313 रन बनाकर जिम्बाब्वे के रनों के एवरेस्ट को छोटा कर दिया था। भारत की बात करें तो तब मोहम्मद अजहरूद्दीन की अगुवाई वाली टीम का सर्वोच्च स्कोर था 234 रन। उसने आस्ट्रेलिया के खिलाफ ब्रिस्बेन में 47 ओवरों में यह स्कोर बनाया था। 
        भारतीय उपमहाद्वीप में 1996 में जब दूसरी बार विश्व कप का आयोजन हुआ तो तब रिकार्ड पांच बार 300 से अधिक रन का स्कोर बना था। श्रीलंका ने केन्या के खिलाफ कैंडी में पांच विकेट पर 398 रन का रिकार्ड स्कोर खड़ा कर दिया था। कुल 18 पारियों में स्कोर 250 रन के पार पहुंचा। दक्षिण अफ्रीका ने दो बार 300 रन की संख्या को पार किया लेकिन भारत के लिये यह तब भी दूर की कौड़ी बनी रही। उसका उच्चतम स्कोर आठ विकेट पर 287 रन था जो उसने पाकिस्तान के खिलाफ बेंगलूर में क्वार्टर फाइनल में बनाया था। भारत 1999 में पहली बार विश्व कप में 300 रन की संख्या को पार करने में सफल रहा था। इंग्लैंड में खेले गये टूर्नामेंट में उसने श्रीलंका के खिलाफ टांटन में छह विकेट पर 373 रन बनाये और फिर केन्या के खिलाफ ब्रिस्टल में दो विकेट पर 329 रन ठोके। भारत के ​अलावा केवल आस्ट्रेलिया एक बार (303/4 बनाम जिम्बाब्वे बर्मिंघम) 300 रन की संख्या छू पाया था। वैसे इस टूर्नामेंट कुल 19 स्कोर 250 रन से अधिक के थे।

नयी सदी में छोटा बन गया 300

           स्ट्रेलिया ने 2003 में अफ्रीकी महाद्वीप में खेले गये विश्व कप में भारत के खिलाफ जोहानिसबर्ग में खेले गये फाइनल में दो विकेट पर 359 रन बना दिये थे। भारत ​लगातार आठ मैच जीतकर फाइनल में पहुंचा था लेकिन रनों के इस पहाड़ के सामने उसकी हार पहले से ही तय मानी जाने लगी थी। वैसे विश्व कप 2003 में 300 रन से अधिक स्कोर का नया रिकार्ड बना था। कुल नौ बार 300 या इससे अधिक के स्कोर बने। यही नहीं 26 बार टीमों ने 250 रन की संख्या को छुआ। भारत का उच्चतम स्कोर दो विकेट पर 311 रन था जो उसने नामीबिया के खिलाफ पीटरमैरित्जबर्ग में बनाया था। इसके चार साल बाद वेस्टइंडीज में खेले गये विश्व कप में बल्लेबाजों ने बाउंड्री छोटी होने का पूरा फायदा उठाया और 16 बार 300 रन का आंकड़ा स्पर्श किया गया। भारत भले ही तब पहले दौर में बाहर हो गया था लेकिन उसने बरमुडा को क्रिकेट का ककहरा सिखाकर पांच विकेट पर 413 रन बना दिये थे। चैंपियन आस्ट्रेलिया ने पांच बार 300 से अधिक का स्कोर बनाया। उप विजेता श्रीलंका तीन, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका दो . दो जबकि भारत, इंगलैंड, पाकिस्तान और वेस्टइंडीज एक एक बार 300 रन तक पहुंचे थे। नियम बल्लेबाजों के अनुकूल बनने लगे थे और सभी टीमों ने इसका फायदा उठाया। कुल 25 बार टीमें 250 रन या इससे अधिक का स्कोर खड़ा करने में सफल रही थी।  
           रनों का अंबार लगना शुरू हो गया था और 2011 विश्व कप में भारतीय उपमहाद्वीप की सपाट पिचों पर 17 बार 300 या इससे अधिक का स्कोर का नया रिकार्ड बन गया। अब समय आ गया था जबकि 250 और 300 के बीच के लक्ष्य को बड़ा कहना इस शब्द के प्रति अन्याय लगने लगा था। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि 37 बार टीमों ने 250 रन या इससे अधिक रन बनाये थे। भारत ने बांग्लादेश के खिलाफ ढाका में चार विकेट पर 370 रन बनाये। इस मैच में तो वह जीत गया था लेकिन इंग्लैंड के खिलाफ बेंगलूर में 338 रन का स्कोर भी बड़ा नहीं बन पाया। इंग्लैंड ने इसकी बराबरी करके मैच टाई करवा दिया था। 
    और अब विश्व कप 2015 में वेस्टइंडीज 300 रन से अधिक का स्कोर बनाकर अपनी जीत मानकर चलने लग जाता है लेकिन आयरलैंड लक्ष्य हासिल कर लेता है। यह सभी टीमों के लिये साफ संकेत था कि वे 300 रन के स्कोर को बड़ा नहीं माने। अब 300 रन को मैं विशाल स्कोर नहीं लिखता और अगर 39 मैचों में 40 बार टीमें 250 रन या इससे अधिक स्कोर बना लेती हैं तो 250 से अधिक और 300 रन से कम के स्कोर को चुनौतीपूर्ण लिखने में भी झिझक लगती है। 
                     (सभी आंकड़े 14 मार्च 2015 तक के हैं।)
                                                                                     


Wednesday, March 11, 2015

संगा भाई अभी अलविदा न कहना

     
    अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों के अपने आंकड़ों को सहेजने के लिये थोड़ा मशक्कत तो लाजिमी है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से इसका आनंद कुछ और बढ़ गया। आखिर जब आप क्रिकेट के किसी असली विद्यार्थी का अच्छे प्रदर्शन के लिये बराबर जिक्र करते हैं तो तब आनंद की अनुभूति होना स्वाभाविक है। कुमार संगकारा मुझे ही नहीं मेरे जैसे लाखों क्रिकेट प्रेमियों को बराबर यह अनुभूति करा रहे हैं और अब तो वह एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लगातार चार मैचों में शतक जड़ने वाले पहले बल्लेबाज भी बन गये हैं। किसी एक विश्व कप में भी पहली बार किसी बल्लेबाज ने चार शतक ठोके। आंकड़ों की बात आगे करेंगे। 
         कुमार संगकारा जब इस शख्स का नाम जेहन में आता है तो विकेटों के आगे और विकेटों के पीछे खड़े एक ऐसे शख्स की तस्वीर सामने आ जाती है जो सही मायनों में क्रिकेट के लिये बना है। जो पिछले डेढ़ दशक से विश्व क्रिकेट के चोटी के बल्लेबाजों में शामिल रहा है। जो हौले से मुस्काराता है लेकिन उससे अधिक अपने कवर ड्राइव और पुल से लोगों को दीवाना बनाता है। जो बिना किसी लाग लपेट के रन बनाता है, क्योंकि टीम उसके लिये सर्वोपरि है। एक ऐसा शख्स जिसके नाम पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 27 हजार से अधिक रन दर्ज हैं लेकिन उसे विश्व क्रिकेट में वह दर्जा नहीं मिला जिसका वास्तव में वह हकदार है। अंग्रेजी में ऐसे लोगों के लिये एक शब्द है, ''अनसंग हीरो''।  संगकारा विश्व क्रिकेट के ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्हें इस खेल की दो महत्वपूर्ण विधाओं बल्लेबाजी और विकेटकीपिंग में माहिर होने के बावजूद कभी सचिन तेंदुलकर, ब्रायन लारा या रिकी पोंटिंग जैसी प्रसिद्धि नहीं मिली। क्यों? इसका जवाब दुनिया के लाखों करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों को देना चाहिए।
          जब संगकारा के लिये 'अनसंग हीरो' की बात आती है तो जेहन में जाक कैलिस का नाम भी आ जाता है। अफसोस की दोनों आलराउंडर रहे हैं। एक विकेट के आगे और पीछे अपने कौशल का कमाल दिखाता है तो दूसरा बल्लेबाजी में टीम का भार उठाने के बाद गेंदबाजी में भी अपने साथियों की मदद करता है। जब दुनिया के चोटी के बल्लेबाजों के आंकड़ों पर नजर पड़ती है तो उनका नाम भी उनमें शामिल होता है। फिर भी इन दोनों महानायकों को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे वास्तविक हकदार थे। यह खेल की नियति है। इसे स्वीकार भी करना होगा। मेरे लिये तो हमेशा यह सवाल अनुत्तरित ही रहेगा कि विश्व क्रिकेट में लगभग एक साथ खेलने वाले सचिन तेंदुलकर, ब्रायन लारा, रिकी पोंटिंग, जाक कैलिस, राहुल द्रविड़, कुमार संगकारा में पहला, दूसरा या तीसरा नंबर किसे दिया जाए? असल में इस तरह के नंबर इनके लिये नहीं बने हैं। इनके लिये तो वे नंबर बने हैं जिन्हें हम क्रिकेट की भाषा में रन कहते हैं। 
       र जब रन के इन नंबरों यानि आंकड़ों की बात चल पड़ी है तो आपको बता दूं कि पिछले पांच साल यानि एक मार्च 2010 से लेकर अब तक क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में मिलकर जिस बल्लेबाज ने सर्वाधिक रन बनाये हैं उसका नाम कुमार संगकारा है। श्रीलंका के बायें हाथ के इस बल्लेबाज ने इन पांच वर्षों में तीनों प्रारूपों में 214 मैच खेले और उनमें 53.99 की औसत से 11501 रन बनाये हैं। इनमें 32 शतक भी शामिल हैं। उनके बाद दूसरे नंबर पर भारत के विराट कोहली हैं जिन्होंने संगकारा से लगभग ढाई हजार रन कम बनाये हैं। बात लंबी अवधि के मैचों की हो या सीमित ओवरों की सभी में संगकारा अव्वल हैं। आप खुद ही देख लीजिए। टेस्ट क्रिकेट में संगकारा ने 42 मैचों में 65.54 की औसत से 4654 रन बनाये। इस बीच उन्होंने 17 शतक भी लगाये। इंग्लैंड के एलिस्टेयर कुक (4627) उनसे ज्यादा दूर नहीं हैं लेकिन कुक ने संगकारा की तुलना में 22 पारियां अधिक खेली हैं। वनडे में संगकारा ने पिछले पांच वर्षों में 136 मैचों में 6037 रन बनाये हैं जिसमें 15 शतक शामिल हैं। उनका औसत 52.49 रहा है। कोहली 5648 रन के साथ दूसरे स्थान पर हैं लेकिन संगकारा ने इस भारतीय बल्लेबाज की तुलना में केवल दो पारियां अधिक खेली हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि संगकारा अब 37 साल के हो गये हैं और बायें हाथ के इस बल्लेबाज के अनुसार अब ''शरीर के जोड़ चरमराने लगे हैं।''
           क्या आपको वास्तव में ऐसा लगता है? जब संगकारा बड़ी कुशलता से ड्राइव या फ्लिक करते हैं या फिर डाइव लगाकर कैच लेते हैं या फिर तेजी से रन चुराते हैं तो कहीं ऐसा नहीं लगता है। बहरहाल वह अपने शरीर के बारे में बेहतर जानते हैं। लेकिन एक सच्चा क्रिकेट प्रेमी होने के कारण मुझे यह खबर बार बार कचोट रही है कि संगकारा विश्व कप के बाद वनडे क्रिकेट नहीं खेलेंगे और अगस्त के बाद टेस्ट ​क्रिकेट को भी अलविदा कह देंगे। अभी तो लग रहा है कि संगकारा दो साल और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल सकते हैं। संन्यास लेना किसी खिलाड़ी का एकाधिकार होता है लेकिन एक क्रिकेट प्रेमी होने के नाते मैं इतना आग्रह करने का अधिकार तो रखता हूं कि 'संगा भाई अभी अलविदा न कहना।'  
                                                                                         धर्मेन्द्र पंत 


Monday, March 9, 2015

भारत . बांग्लादेश में हो सकता है क्वार्टर फाइनल

   
जीत का जश्न। बांग्लादेश इसका हकदार है। फोटो सौजन्य : बीसीबी 
 इंग्लैंड विश्व कप के पहले दौर से बाहर हो गया। तीन बार के उपविजेता का इस तरह दर्दनाक पराजयों का बोझ लिये विदा होना अच्छा नहीं लगा। लेकिन साथ ही खुशी भी हुई। बांग्लादेश ने पहली बार अपना दम दिखाया है। अब तक उसे पुछल्ली टीम ही कहा जाता था जो यदाकदा ही जीत दर्ज कर पाती थी। उसकी हार पहले ही तय मान ली जाती थी और इसलिए जब आईसीसी ने क्वार्टर फाइनल के लिये कार्यक्रम तय किया तो उसने मेलबर्न में इंग्लैंड का मैच रखा था। अब वहां बांग्लादेश खेलेगा। यह दूसरा क्वार्टर फाइनल 19 मार्च को होगा और पूरी संभावना है कि यह मैच भारत और बांग्लादेश के बीच खेला जाएगा। 
      बांग्लादेश को ग्रुप ए में अपना आखिरी लीग मैच न्यूजीलैंड से खेलना है जो अब तक अजेय है और जिसने अधिकतर एकतरफा जीत दर्ज की। बांग्लादेश उलटफेर का माद्दा रखता है लेकिन फिर इस मैच में जीत का प्रबल दावेदार न्यूजीलैंड ही रहेगा। बांग्लादेश अभी ग्रुप ए में तीसरे स्थान पर है लेकिन चौथे स्थान पर काबिज श्रीलंका को अपना अंतिम मैच में स्काटलैंड से खेलना है। उसमें उसकी जीत भी तय मानी जा रही है। आस्ट्रेलिया के भी सात अंक हैं लेकिन उसे भी आखिरी मैच में स्काटलैंड से भिड़ना है जिसने अब तक एक भी मैच नहीं जीता है। यदि न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया और श्रीलंका अपने अपने आखिरी मैच जीत जाते हैं तो ग्रुप ए में वे पहले तीन स्थान पर काबिज हो जाएंगे। बांग्लादेश चौथे स्थान पर खिसक जाएगा। 
     यह तय हो चुका है कि बांग्लादेश को मेलबर्न में अपना क्वार्टर फाइनल मैच खेलना है। यदि वह ग्रुप ए से चौथे स्थान पर रहता तो उसका सामना ग्रुप बी से पहले स्थान पर रहने वाली टीम से होगा। ग्रुप बी से भारत का पहला स्थान तय है। ऐसे में ये दोनों पड़ोसी देश आमने सामने होंगे। भारत इस मैच में 2007 जैसी गलती से बचना चाहेगा और जिस तरह की फार्म में अभी वह है उसके लिये जीत दर्ज करना आसान होगा। अभी के हिसाब से श्रीलंका का सामना दक्षिण अफ्रीका से हो सकता है। 
     ब जरा इंग्लैंड की बात कर लें। उसकी हार के लिये उसके बोर्ड यानि ईसीबी के कुछ अजीबोगरीब फैसले भी जिम्मेदार रहे। वह आखिर तक तय नहीं कर पाया कि टीम का कप्तान कौन होगा। एलिस्टेयर कुक को आनन फानन में हटाकर इयोन मोर्गन को कप्तानी सौंपने का फैसला बुद्धिमतापूर्ण नहीं था। बेहतर होता कि कुक को टीम में भी बनाये रखा जाता। मोर्गन कप्तानी का दबाव नहीं झेल पा रहे हैं और उनके प्रदर्शन में साफ तौर पर इसकी छाप दिख रही है। उनकी कप्तानी में अपरिपक्वता भी साफ नजर आयी। 
        दूसरी बात इंग्लैंड की टीम में कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं था जिसका नाम ही विरोधी गेंदबाजों के दिलो दिमाग में खौफ पैदा कर दे। उसके पास फिलहाल केविन पीटरसन ही ऐसा खिलाड़ी था लेकिन ईसीबी और पीटरसन दोनों ने अपनी टीम, क्रिकेट और विश्व कप के बजाय अपने अहं को अधिक तवज्जो दी और नतीजा सामने है। पीटरसन अब भी ऐसा खिलाड़ी है जो अकेले दम पर मैच का पासा पलट सकता है। इंग्लैंड की वर्तमान टीम में कोई भी अन्य खिलाड़ी ऐसा नजर नहीं आता है। उसे अपनी गेंदबाजी पर भरोसा था लेकिन विश्व कप में भी यह साबित हो गया कि जेम्स एंडरसन और स्टुअर्ट ब्राड जैसे गेंदबाज टेस्ट क्रिकेट में कहर बरपा सकते हैं लेकिन एकदिवसीय क्रिकेट अलग तरह का खेल है और यहां उनकी तूती नहीं बोलती। 
    ​बहरहाल अभी बांग्लादेश के लिये ताली बजाइये। इस बार वह किसी अगर मगर के बिना क्वार्टर फाइनल में पहुंचा है। विश्व कप में पहली बार एशिया की चार टीमों को हम क्वार्टर फाइनल में देख सकते हैं। यह एशियाई क्रिकेट के लिये भी खुशी की बात है।  यह उसके लिये बड़ी जीत है। इंग्लैंड को तो पिछले कुछ विश्व कप से शुरूआती दौर में बाहर आने की आदत पड़ चुकी है। उम्मीद है कि इस बार वह घर जाकर 2019 के बारे में विचार करेगा। आखिर तब उसे अपनी पिचों पर विश्व कप खेलना है और उसके दर्शक नहीं चाहेंगे कि उनकी टीम उनके सामने बुजदिलों जैसा प्रदर्शन करे।

Wednesday, March 4, 2015

अब तो सुधर जाओ विराट

      मेरे सामने विश्व क्रिकेट के सफल कप्तानों की सूची पड़ी है। इनमें वे कप्तान शामिल हैं जिन्हें या तो मैंने खेलते हुए देखा या फिर तब वे क्रिकेट खेल रहे थे जबसे मैंने इस खेल को समझना शुरू किया था। क्लाइव लायड, माइक ब्रेयरली, विव रिचर्ड्स, सुनील गावस्कर, एलन बोर्डर, इमरान खान, अर्जुन रणतुंगा, मार्क टेलर, स्टीव वॉ, हैन्सी क्रोन्ये, स्टीफन फ्लेमिंग, नासिर हुसैन, सौरव गांगुली, ग्रीम स्मिथ, रिकी पोंटिंग, महेंद्र सिंह धोनी ....। इन सभी ने अपनी कप्तानी की किसी न किसी तरह से सकारात्मक छाप छोड़ी। इनमें से कोई भी ऐसा नहीं था जिसका मैदान या उससे बाहर व्यवहार खराब रहा हो और जिसके कारण उसे लताड़ पड़ी हो या माफी मांगनी पड़ी हो। इनमें से अधिकतर आक्रामक कप्तान थे लेकिन उनकी यह आक्रामकता सकारात्मक थी, जो उनके आम जीवन के व्यवहार को भी प्रभावित नहीं करती थी।
     यह सारी भूमिका मुझे विराट कोहली के संदर्भ में बांधनी पड़ी जो अपने खराब व्यवहार के कारण चर्चा में हैं। इस बार वह एक पत्रकार को गाली देने को लेकर चर्चा में हैं। उन्होंने मां से लेकर बहन तक सभी गालियां अपने मुंह से निकाली। कोहली को भारत का भावी कप्तान माना जाता है लेकिन भले ही वह एक बल्लेबाज के रूप में परिपक्व हो गये हों लेकिन उनका व्यवहार दिखाता है कि आम जीवन में वह अब भी 'बिगड़ैल लड़का' हैं। भारत में यदि क्रिकेट धर्म है और क्रिकेटरों को ऊंचा दर्जा दे दिया जाता है तो उनसे अच्छे व्यवहार की उम्मीद भी की जाती है, लेकिन अफसोस है कि एक शांतचित कोच के संरक्षण में क्रिकेट का ककहरा सीखकर शिखर पर पहुंचने वाला कोहली इस मानदंड पर खरा नहीं उतर रहा है।
      कोहली को टेस्ट कप्तानी सौंप दी गयी ​है कि और हो सकता है कि जल्द ही उन्हें तीनों प्रारूपों में कप्तान बना दिया जाए लेकिन इस देश का कोई भी क्रिकेट प्रेमी नहीं चाहेगा कि उनका कप्तान नकारात्मक आक्रामकता अपनायें। फिलहाल कोहली में सकारात्मक के साथ नकारात्मक आक्रामकता भी भरी हुई है और यदि वह अपने अंदर इसे बनाये रखते हैं तो भविष्य में इससे उन्हें ही परेशानी हो सकती है। यदि एक कप्तान किसी पत्रकार के लिये सार्वजनिक रूप से मां बहन की गाली निकाल सकता है तो उससे ड्रेसिंग रूम में अच्छे व्यवहार की उम्मीद कैसे की जा सकती है। दुख इस बात का है कि सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण जैसे खिलाड़ियों के साथ खेलने के बावजूद भी कोहली उनसे महानता के गुण नहीं सीख पाये।  वह अपने कप्तान महेंद्र सिंह धौनी से भी कुछ नहीं सीख रहे हैं जिन्हें 'कैप्टेन कूल' कहा जाता है। मुझे नहीं लगता कि कोहली की इस हरकत से उनकी मां या कोच में से किसी को खुशी हुई होगी। वे भी दुखी होंगे। आखिर कोई मां बाप नहीं चाहता कि उनका बेटा अपनी जुबान से अपशब्द निकाले। देश के लिये न सही अपने प्रशंसकों, अपने परिजनों और कोच के लिये तो कोहली को सुधरना चाहिए। आखिर जब वह क्रिकेट में शुरू में रन बना रहे थे तब उनसे जुड़े लोग ही पत्रकारों से अखबार के एक कोने में कोहली को भी जगह देने का आग्रह करते थे।
     किसी भी क्रिकेटर को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसको आगे बढ़ाने में मीडिया की भूमिका भी अहम होती है। कोहली लगता है कि सफलता के मद में चूर होते जा रहे हैं। उन्हें खुद के लिये, अपने प्रशंसकों के लिये, देश के लिये और क्रिकेट के लिये सुधरना होगा। 

Tuesday, March 3, 2015

जब पूरी भारतीय पारी में लगे केवल दो चौके

     भारतीय टीम ने लगभग 48 ओवर बल्लेबाजी की लेकिन इस दौरान वह केवल दो बार गेंद को सीमा रेखा के पार भेज पायी। भारतीय टीम की तरफ से ये दोनों चौके भी एक बल्लेबाज ने लगाये थे। यह दिलचस्प नजारा आज से लगभग 14 साल पहले छह दिसंबर 1991 को पर्थ के वाका मैदान पर देखने को मिला था। बेंसन एंड हेजस विश्व सीरीज के इस मैच में भारत के सामने वेस्टइंडीज था। ये दोनों टीमें अर्से बाद फिर से वाका पर छह मार्च यानि होली के दिन विश्व कप मैच के लिये आमने सामने होंगी और उस दिन इतना तय है कि भारतीय पारी में केवल दो चौके नहीं पड़ेंगे। 
     भारत और वेस्टइंडीज के बीच इससे पहले पर्थ में खेला गया एकमात्र मैच कई मायनों में खास था। इस मैच में दोनों टीमों ने 40 से अधिक ओवर खेले लेकिन बल्लेबाज वाका की तेज और उछाल वाली पिच से सामंजस्य नहीं बिठा पाये और कम स्कोर का यह मैच टाई रहा था। 
रवि शास्त्री के बल्ले से निकले थे दोनों चौके
    भारत को पहले बल्लेबाजी का न्यौता मिला और उसकी पूरी टीम 47.4 ओवर में 126 रन पर सिमट गयी। भारतीय पारी की खासियत यह रही कि इसमें केवल दो चौके लगे। ये दोनों चौके भी सलामी बल्लेबाज रवि शास्त्री ने लगाये जो निदेशक के रूप में वर्तमान टीम के साथ अभी पर्थ में मौजूद हैं। शास्त्री ने तब टीम की तरफ से सर्वाधिक 33 रन भी बनाये थे। उनके बाद दूसरा बड़ा स्कोर अतिरिक्त रनों (24 रन) का था। प्रवीण आमरे (20 रन), संजय मांजरेकर (15 रन) और मनोज प्रभाकर (13 रन) भी दोहरे अंक में पहुंचे लेकिन कोई भी गेंद को सीमा रेखा पार नहीं पहुंचा पाया था। कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन, सचिन तेंदुलकर, के श्रीकांत, कपिल देव जैसे धुरंधर दोहरे अंक में नहीं पहुंच पाये थे। 
       अभी वेस्टइंडीज टीम से कोच के रूप में जुड़े कर्टली एंब्रोस ने तब 8.4 ओवर में केवल नौ रन देकर दो विकेट लिये थे और बाद में उन्हें मैन आफ द मैच भी चुना गया था। एंब्रोस ने बाद में बल्लेबाजी करते हुए 17 रन भी बनाये थे और मैच का एकमात्र छक्का भी लगाया था।
      लेकिन यह क्या वेस्टइंडीज के बल्लेबाजों ने फिर से 1983 के विश्व कप फाइनल की कहानी दोहरा दी जबकि कैरेबियाई टीम के लिये भारत का 183 रन का स्कोर पहाड़ जैसा बन गया था। यहां तो लक्ष्य 127 रन था और वेस्टइंडीज की टीम में कप्तान रिची रिचर्डसन, ब्रायन लारा, डेसमंड हेन्स, कार्ल हूपर जैसे बल्लेबाज थे। 
      कपिल ने पहली गेंद पर हेन्स को आउट कर दिया। इसके बाद फिलो वालेस, रिचर्डसन, लारा और हूपर दोहरे अंक में पहुंचे लेकिन इनमें से कोई भी 14 रन से आगे नहीं बढ़ा। वेस्टइंडीज के आठ विकेट 76 रन  पर निकल गये और उस पर हार का खतरा मंडराने लगा। एंब्रोस और दसवें नंबर के बल्लेबाज एंडरसन कमिन्स (24 रन) ने आखिरी क्षणों में मैच रोमांचक बना दिया। वेस्टइंडीज को जब छह रन और भारत को एक विकेट की दरकार थी तब तेंदुलकर ने गेंद संभाली। उनकी पहली पांच गेंदों पर पांच रन बने लेकिन आखिरी गेंद पर वह कमिन्स को आउट करने में सफल रहे। अजहर ने स्लिप में बेहतरीन कैच लपका।  वेस्टइंडीज की टीम 41 ओवर में 126 रन पर आउट हो गयी और मैच टाई हो गया।  अपना पहला एकदिवसीय मैच खेल रहे सुब्रत बनर्जी ने भारत की तरफ से तीन जबकि कपिल और जवागल श्रीनाथ ने दो . दो विकेट लिये थे। 
       रिकार्ड के लिये बता दें कि भारत ने पर्थ पर कुल 12 मैच (विश्व कप 2015 में यूएई के खिलाफ खेले गये मैच सहित) खेले हैं जिनमें से पांच में उसने जीत दर्ज की है जबकि छह मैचों में उसे हार मिली है। एक मैच टाई रहा है। 

Saturday, February 28, 2015

विश्व कप में 'छोटे' बन गये 'बड़े' मैच

     यरलैंड और यूएई या फिर अफगानिस्तान और स्काटलैंड के मैचों को आईसीसी से लेकर ​मीडिया और क्रिकेट पंडितों ने कोई तवज्जो नहीं दी। इन्हें विश्व कप का 'छोटा मैच' आंका गया लेकिन इन मैचों का अंत इतना रोमांचक था कि क्रिकेट में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखने वाले व्यक्ति को भी अपना टीवी सेट खोलना पड़ा। इसके उलट जिन्हें 'बड़ा मैच' कहकर मीडिया जगत मुंह फाड़ फाड़कर चिल्ला रहा था और क्रिकेट विश्लेषक अपना पांडित्य झाड़ रहे थे, उनमें से अधिकतर एकतरफा और नीरस साबित हुए हैं। मसलन न्यूजीलैंड और श्रीलंका, आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड, भारत और पाकिस्तान, न्यूजीलैंड और इंग्लैंड, पाकिस्तान और वेस्टइंडीज, भारत और दक्षिण अफ्रीका तथा दक्षिण अफ्रीका और वेस्टइंडीज जैसे बड़े मैचों में आखिर में कोई रोमांच नहीं बचा था। इन मैचों में आखिर तक टीवी सेट पर जो लोग चिपके रहे उनमें से अधिकतर पर क्रिकेट नहीं भावनाएं हावी थी।
        भारत और पाकिस्तान मैच को लेकर तो इतना अधिक हाइप बना दिया गया था कि एडिलेड जंग का मैदान बन गया। आखिर में यह मैच एकतरफा साबित हुआ। भारत ने 76 रन से आसानी से जीत दर्ज की। भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच मेलबर्न में खेले गये मैच की कहानी भी ऐसी ही थी। भारत ने दक्षिण अफ्रीका को 130 रन से पीटा और सुनील गावस्कर जैसे दिग्गजों को कहना पड़ा कि उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैच इस कदर एकतरफा होगा।
     ये दो मैच ही क्यों। विश्व कप के उदघाटन मैच में न्यूजीलैंड ने श्रीलंका को 98 रन से हराया तो दो चिर प्रतिद्वंद्वियों के बीच मुकाबले में आस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को 111 रन से रौंदकर इसे एकतरफा बना दिया। जब न्यूजीलैंड का मुकाबला इंग्लैंड से हुआ तो तब किसी भी समय ऐसा नहीं लगा कि दुनिया की चोटी की आठ टीमों में शामिल दो टीमें आमने सामने हैं। इंग्लैंड की टीम 123 रन पर ढेर हो गयी और न्यूजीलैंड ने केवल 12.2 ओवर में दो विकेट खोकर लक्ष्य हासिल कर दिया। मतलब 226 गेंदें खेली जानी बाकी थी। वेस्टइंडीज ने पाकिस्तान को 150 रन से हराकर विशुद्ध क्रिकेट प्रेमियों को निराश ही किया। क्रिस गेल के दोहरे शतक से वेस्टइंडीज ने जिम्बाब्वे को भी आसानी से हराया। इसके बाद उम्मीद लगायी जा रही थी कि क्रिस गेल एंड कंपनी और डेल स्टेन एंड कंपनी के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। गेल बनाम स्टेन मुकाबले को लेकर बड़ी बड़ी बातें की गयी लेकिन आखिर में हुआ क्या। दक्षिण अफ्रीका ने पांच विकेट पर 408 रन बनाये और वेस्टइंडीज 151 रनों पर ढेर हो गया। पूरी तरह से एकतरफा मैच। ​मैच को देखने के लिये स्टेडियम में पहुंचे दर्शकों के लिये दिलासा देने वाली बात यही थी कि उन्होंने एबी डिविलियर्स की धांसू पारी अपने सामने देखी।
          ब आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड मैच की बात करें। ये दोनों पड़ोसी पिछले विश्व कप के बाद केवल एक बार एक दूसरे से भिड़े थे और उस मैच का भी परिणाम नहीं निकल पाया था। इस तरह से ये दोनों टीमें 2011 के बाद पहली बार किसी ऐसे मैच में खेली जिसका परिणाम निकला। दोनों देशों ही नहीं क्रिकेट खेलने वाले अन्य देशों में भी इस मैच को लेकर बड़ी बड़ी बातें की गयी लेकिन टिम साउथी, ट्रेंट बोल्ट और डेनियल विटोरी की गेंदबाजी त्रिमूर्ति  के सामने चार बार की चैंपियन आस्ट्रेलिया की टीम 151 रन पर ढेर हो गयी। ब्रैंडन मैकुलम ने फिर तूफानी अर्धशतक बनाया लेकिन आस्ट्रेलिया ने भी अपनी गेंदबाजी पावर का जलवा दिखाया, जिससे मैच आखिर में रोमांचक बन गया। अब भावनाओं से ओतप्रोत ही नहीं आम क्रिकेट प्रेमी भी मैच से जुड़ गया था। पहली बार किसी बड़े मैच में खिलाड़ियों के चेहरों पर तनाव दिख रहा था। केन विलियमसन ने आखिर में छक्का जड़कर न्यूजीलैंड को क्वार्टर फाइनल में पहुंचाने के साथ चैपल . हैडली ट्राफी भी दिला दी। यह ट्राफी इन दोनों टीमों के बीच वनडे मैच के विजेता को दी जाती है। न्यूजीलैंड ने 23.1 ओवर में जीत हासिल कर ली थी। लेकिन उसका केवल एक विकेट बचा था। विश्व कप में यह छठा अवसर था जबकि कोई टीम एक विकेट से जीती जिससे पता चलता है कि आखिरी क्षणों में मैच रोमांचक बन गया था। पहली बार कोई बड़ा मैच रोमांच पैदा कर ​गया लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि न्यूजीलैंड ने 161 गेंद शेष रहते हुए जीत दर्ज की। इससे उसका नेट रन रेट भी सुधरा होगा।
        लेकिन छोटे मैचों में आयरलैंड ने यूएई को जब दो विकेट से हराया तब केवल चार गेंद बची हुई थी। अफगानिस्तान ने भी स्काटलैंड को आखिरी ओवर में एक विकेट से हराया। विश्व कप में अब तक केवल ये ही दो मैच ऐसे हुए हैं जिन्होंने आखिरी क्षणों तक क्रिकेट प्रेमियों की सांसें थाम रखी थी। इसके अलावा जब एक बड़ी और एक छोटी टीम आमने सामने थी तब भी मैच में कुछ रोमांच देखने को मिला। आयरलैंड ने तो वेस्टइंडीज को हराकर उलटफेर भी किया। जिम्बाब्वे ने दक्षिण अफ्रीका को परेशान किया। यूएई और जिम्बाब्वे का मैच आखिर पलों तक रोमांचक बना रहा। अफगानिस्तान ने भी श्रीलंका को 49वें ओवर तक मैच खींचने के लिये मजबूर किया। जिस न्यूजीलैंड ने श्रीलंका, इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया को करारी शिकस्त दी उसे ही स्काटलैंड के खिलाफ जीत के लिये संघर्ष करना पड़ा। अब आप ही बताईये कि कौन मैच 'बड़ा' था और कौन 'छोटा'। छोटी टीमों का बेहतर प्रदर्शन क्रिकेट के लिये अच्छा संकेत है। आईसीसी इंग्लैंड में होने वाले अगले विश्व कप में इस टूर्नामेंट का प्रारूप बदलने और इसे दस टीमों तक सीमित करने पर विचार कर रही है लेकिन इन मैचों से उसका फैसला प्रभावित हो सकता है।

Tuesday, February 24, 2015

पांच साल, 651 मैचों में बने पांच दोहरे शतक

                                                                    धर्मेन्द्र पंत 


पांच साल, पांच दोहरे शतक और चेहरों से झलकती खुशी
      कदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पहले दोहरे शतक के लिये 39 साल और 50 दिन तथा 2962 मैचों का इंतजार करना पड़ा लेकिन इसके बाद पिछले पांच वर्ष और 651 मैचों के अंदर क्रिकेट के इस प्रारूप में पांच दोहरे शतक लग चुके हैं। यह भी संयोग है कि पहले चार दोहरे शतक भारतीय बल्लेबाजों ने लगाये। रोहित शर्मा दो बार ऐसा कारनामा कर चुके हैं जबकि अब क्रिस गेल पहले गैर भारतीय बल्लेबाज हैं जो इस सूची में शामिल हुए हैं। गेल ने विश्व कप में दोहरा शतक जड़ा और वह इस टूर्नामेंट में यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले बल्लेबाज हैं। 
       पहला एकदिवसीय मैच पांच जनवरी 1971 को खेला गया था और वनडे में पहला शतक 24 अगस्त 1972 को डेनिस एमिस ने लगाया था। इसके बाद तेंदुलकर के दोहरे शतक बनाने तक वनडे में 1051 शतक लगे लेकिन इनमें कोई भी दोहरा शतक नहीं था। दो बल्लेबाज ऐसे थे जो एक छक्का जड़ने पर 200 रन पर पहुंच जाते लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। पाकिस्तान के सईद अनवर 1997 में भारत के खिलाफ 194 रन बनाकर आउट हो गये जबकि 2009 में जिम्बाब्वे चार्ल्स कावेंट्री बांग्लादेश के खिलाफ इसी स्कोर पर नाबाद रहे थे। इस बीच वनडे क्रिकेट में कई धुरंधर बल्लेबाज देखे गये। मसलन वि​व रिचर्ड्स, सनथ जयसूर्या, मैथ्यू हेडन, कपिल देव, वीरेंद्र सहवाग, एडम गिलक्रिस्ट आदि। ये सभी 170 रन की संख्या के पार भी पहुंचे लेकिन दोहरे शतक से महरूम रहे। यहां तक कि तेंदुलकर ने जब पहला दोहरा शतक लगाया तो यही कहा गया कि उन्होंने इस मुकाम पर पहुंचने में देर लगायी। आखिर तब तक भारत की तरफ 172, आस्ट्रेलिया की तरफ से 152, पाकिस्तान की तरफ से 142, वेस्टइंडीज की तरफ से 130, श्रीलंका की तरफ से 106, इंग्लैंड की तरफ से 91, दक्षिण अफ्रीका की तरफ से 88 और न्यूजीलैंड की तरफ से 71 शतक वनडे क्रिकेट में लग चुके थे। तेंदुलकर ने यह मुकाम अपने 37वें जन्मदिन से दो महीने  पहले किया। 
    यह भी संयोग है कि तेंदुलकर ने 24 फरवरी 2010 को वनडे का पहला दोहरा शतक लगाया था और अब गेल ने इसके ठीक पांच साल बाद 24 फरवरी 2015 का विश्व कप का पहला और वनडे का पांचवां दोहरा शतक जड़ दिया। इन पांच वर्षों में वनडे में कुल 345 शतक लगे जिनमें पांच दोहरे शतक शामिल है। जाहिर है इस बीच मैचों की संख्या बढ़ी और उसी अनुपात में शतकों की संख्या में भी इजाफा हुआ। दक्षिण अफ्रीका ने इन पांच वर्षों में सर्वाधिक 55, भारत ने 54, श्रीलंका ने 44, आस्ट्रेलिया ने 33, इंग्लैंड ने 31, न्यूजीलैंड ने 29, वेस्टइंडीज ने 27 और पाकिस्तान ने 24 शतक लगाये। बांग्लादेश ने 11 और आयरलैंड ने 10 शतक लगाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी लेकिन भारत के तीन बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर (200 नाबाद), वीरेंद्र सहवाग (219) और रोहित शर्मा (209 और 264) चार दोहरे शतक जमाने में सफल रहे। 
        सल में जिस दोहरे शतक को कभी वनडे में मुश्किल मुकाम माना जा रहा था, टी20 क्रिकेट के आगमन के बाद वह कुछ आसान बन गया। इस बीच बल्लेबाजों के पक्ष में बने क्षेत्ररक्षण और बाउंसर के नियमों ने भी मदद पहुंचायी। बल्ले के निचले भाग की मोटाई विशेषकर 'स्वीट स्पॉट' में भी ताकत भर दी गयी। इससे बड़े शाट खेलने में मदद मिली। गेल सरीखों से तो बहुत पहले से उम्मीद की जा रही थी लेकिन उनके बारे में भी यही कहा जाएगा कि वह देर से इस मुकाम तक पहुंचे। वैसे सिर्फ मददगार परिस्थितियों के दम पर ही दोहरे शतक तक नहीं पहुंचा जा सकता। इसके लिये संयम की भी जरूरत पड़ती है। जैसे कि आज गेल ने दिखाया। उन्होंने अपने पहले 50 रन 51 गेंदों और फिर शतक 105 गेंदों में पूरा किया। मतलब उन्होंने अगले 50 रन के लिये 54 गेंद खेली। वह 100 से 150 रन तक 21 गेंदों में और फिर 150 से 200 रन तक केवल 12 गेंद में पहुंचे। दोहरा शतक इसी तरह से पूरा किया जा सकता है। 
    तेंदुलकर ने भी जब पहला दोहरा शतक लगाया था तो उन्होंने पहले 100 रन 90 गेंद पर बनाये लेकिन अगले 100 रन के लिये उन्होंने केवल 57 गेंदें खेली थी। सहवाग ने अपनी लय एक जैसी बनाये रखी थी। उन्होंने शतक 69 गेंदों में पूरा किया जबकि अगले 100 रन बनाने के लिये भी 71 गेंदों का सामना किया था। रोहित ने जब 2013 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ अपना पहला दोहरा शतक लगाया था तो उन्होंने बेहद धीमी शुरूआत की थी और पहले 100 रन के लिये 114 गेंद खेल ली थी लेकिन इसके बाद उन्होंने मौके की नजाकत को भांपते हुए तेजी दिखायी और अगली 42 गेंदों पर 200 रन पर पहुंच गये। उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ 264 रन की रिकार्ड पारी के दौरान भी यही रणनी​ति अपनायी। रोहित ने तब शतक 100 गेंद पर पूरा किया लेकिन उनका दोहरा शतक 151 गेंदों पर बना। मतलब अगले शतक के लिये उन्होंने केवल 51 गेंदे खेली थी। 
         और हां अंत में ..... 24 फरवरी को वनडे में दो दोहरे शतक लग चुके हैं। क्या आप जानते हैं कि इस दिन पहला वनडे शतक किस बल्लेबाज ने बनाया था? आस्ट्रेलिया के रिकी ​पोंटिंग ने 2008 में भारत के खिलाफ सिडनी में। बाद में गौतम गंभीर ने भी इस मैच में सैकड़ा जड़ा था। संयोग देखिये कि इससे ठीक 100 साल पहले 24 फरवरी को टेस्ट मैचों में पहला शतक पूरा किया गया था। यह शतक 1908 में इंग्लैंड के जार्ज गुन ने बनाया था। 
     तो कैसी लगी आपको यह जानकारी। टिप्पणी जरूर करें। 

Monday, February 23, 2015

फिर बदलेगा विश्व कप का प्रारूप

                                                                                            धर्मेन्द्र पंत 
    बात विश्व कप 2007 की है। बांग्लादेश ने पहले दौर में भारत को हराकर उलटफेर कर दिया और एक अन्य ग्रुप में आयरलैंड ने पाकिस्तान को पीट दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि उपमहाद्वीप की ये दोनों टीमें पहले दौर से आगे नहीं बढ़ पायी। यह भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट प्रेमियों के लिये ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानि आईसीसी के लिये भी झटका था। आईसीसी का यह नंबर एक टूर्नामेंट है और इससे उसे मोटी कमाई होती है लेकिन विशेषकर भारतीय टीम के जल्दी स्वदेश लौटने के कारण विश्व कप की लोकप्रियता का ग्राफ अचानक ही नीचे गिर गया। आईसीसी की उम्मीद के मुताबिक कमाई भी नहीं हुई और तब क्रिकेट की इस सर्वोच्च संस्था को भारत का महत्व पता चल गया। अब ऐसा प्रारूप तैयार किया जाने लगा जिससे भारत कम से कम नाकआउट तक पहुंच पाये। उसके बाद मैच कितने ही बचते हैं और फिर सेमीफाइनल, फाइनल में तो सभी की दिलचस्पी बनी ही रहती है।
        इसलिए 2011 से टीमों को चार नहीं दो ग्रुप में बांट दिया गया। प्रत्येक ग्रुप में सात टीमें रखी गयी और चार टीमों के क्वार्टर फाइनल में पहुंचने का प्रावधान रखा गया। आईसीसी जो चाहता था वही हुआ। चोटी की आठ टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंची और भारत तो अपनी सरजमीं पर चैंपियन भी बन गया। इस बार आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में चल रहे विश्व कप में भी प्रारूप नहीं बदला गया। बांग्लादेश और जिम्बाब्वे जैसे टेस्ट खेलने वाले देशों सहित दोनों ग्रुप में तीन . तीन ऐसी टीमों को शामिल किया गया है जिन्हें कमजोर माना जा रहा है।
         आईसीसी फिर से चाहती  है कि आस्ट्रेलिया, भारत, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, इंग्लैंड, श्रीलंका और वेस्टइंडीज क्वार्टर फाइनल में पहुंचे। यदि ये थोड़ा सा अच्छा प्रदर्शन करें तो इनके लिये यह काम मुश्किल भी नहीं होगा। मसलन इंग्लैंड को ही लीजिए। वह अपने ग्रुप की दो मजबूत टीमों आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से बुरी तरह हार गया लेकिन अब स्काटलैंड को हराकर दौड़ में शामिल है। उसके ग्रुप में बांग्लादेश और अफगानिस्तान भी है और लग रहा है कि वह इनको हरा देगा। लेकिन एक उलटफेर होने पर आईसीसी के समीकरण बदल सकते हैं। जैसे कि आयरलैंड ने वेस्टइंडीज को हरा दिया और ऐसे में यदि वह बाकी तीन मजबूत टीमों से हार जाता और दूसरी तरफ आयरिश टीम दो अन्य कमजोर टीमों को हरा देती तो मामला गड़बड़ा जाता। इसके अलावा कई पूर्व क्रिकेटरों ने इस प्रारूप की आलोचना भी की। दर्शक भी केवल बड़े मैचों में दिलचस्पी ले रहे हैं। इसलिए अब आईसीसी को लगने लगा है कि यदि वह इस प्रारूप के साथ आगे बढ़ी तो टूर्नामेंट की लोकप्रियता पर असर पड़ सकता है।
         ईसीसी अब इंग्लैंड में 2019 में होने वाले विश्व कप के प्रारूप में बदलाव पर गंभीरता से विचार कर रही है। क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिये उसने इस टूर्नामेंट में एसोसिएट देशों को भी पर्याप्त जगह दी लेकिन ऐसे अधिकतर मुकाबले में एकतरफा रहे। इसलिए अब यह तय लग रहा है कि अगले विश्व कप में यह प्रारूप नहीं अपनाया जाएगा। आईसीसी फिर से पुरार्ने ढर्रे पर लौटने की सोच रही है। इससे पहले 1992 में जो प्रारूप था उसे दोबारा अपनाया जा सकता है। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में ही 1992 में खेले गये विश्व कप में नौ टीमों ने हिस्सा लिया। कोई ग्रुप नहीं था और सभी टीमें राउंड रोबिन आधार पर एक दूसरे से भिड़ीं और फिर जिन चार टीमों के सबसे अधिक अंक थे वे सेमीफाइनल में पहुंच गयी। भारत और आस्ट्रेलिया इन चार टीमों में शामिल नहीं थे।
            आईसीसी अब टूर्नामेंट में अधिक टीमों को शामिल करना चाहती थी और इसलिए 1996 में यह प्रारूप बदल दिया गया। छह छह टीमों के दो ग्रुप बनाये गये और प्रत्येक ग्रुप से चोटी पर रहने वाली चार टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंची। इंग्लैंड में 1999 में हुए विश्व कप में इसमें सीधे क्वार्टर फाइनल के बजाय सुपर सिक्स जोड़ दिया गया जिससे मैचों की संख्या बढ़ी। चार साल बाद 2003 में भी यही प्रारूप अपनाया गया लेकिन इस बार टीमों की संख्या बढ़कर 14 हो गयी थी यानि सात . सात टीमों के दो ग्रुप। यहां पर बड़ी टीमों के जल्द बाहर होने की संभावना बन गयी। मेजबान दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, पाकिस्तान, वेस्टइंडीज सुपर सिक्स में नहीं पहुंच पायी। इसके अलावा अंक आगे ले जाने की व्यवस्था के कारण भी यह प्रारूप जमा नहीं। इस प्रारूप को 2003 में ही विदाई दे दी गयी।  प्रारूप फिर बदल दिया गया। इस बार टीमों की संख्या भी 16 हो गयी और इसलिए चार चार टीमों के चार प्रारूप बन गये लेकिन भारत और पाकिस्तान के पहले दौर में बाहर होने से सारे योजनाएं धरी की धरी रह गयीं। तब प्रत्येक ग्रुप से दो टीमें सुपर आठ में पहुंची थी।
              अब फिर से प्रारूप बदलने जा रहा है। आईसीसी को पता चल गया है कि अधिक टीमों को शामिल करने से विश्व कप की लोकप्रियता या रोमांच नहीं बढ़ेगा। इसके उलट इन दोनों के स्तर में कमी आ रही है। इसलिए अब वह 2019 में दस टीमों को राउंड रोबिन आधार पर एक दूसरे से भिड़ाने की तैयारी कर रही है। सभी प्रारूपों पर गौर करने पर लगता है कि यह सही भी है। किसी टीम को किसी तरह का गिला शिकवा भी नहीं रहेगा। हां बारिश के कारण यदि कोई मैच रद्द होता है तो तब कुछ समीकरण गड़बड़ा सकते हैं लेकिन कुछ ऐसी चीजें होती हैं जिन पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता है और फिलहाल क्रिकेट में बारिश इन चीजों में शामिल है। जहां तक कमजोर टीमों का सवाल है तो उनके लिये टी20 विश्व चैंपियनशिप सबसे बढ़िया विकल्प है। क्रिकेट इस प्रारूप के जरिये ही दुनिया के तमाम देशों में फैलाया जा सकता है।