Showing posts with label भारत. Show all posts
Showing posts with label भारत. Show all posts

Wednesday, November 4, 2015

भारत . दक्षिण अफ्रीका टेस्ट श्रृंखला से जुड़े आंकड़े

     रिष्ठ पत्रकार सम्मानीय श्री पदमपति शर्मा जी का सवाल था कि आखिर मैंने आंकड़ों की दु​कान सजानी क्यों बंद कर दी। पदमपति सर हमेशा प्रेरित करते हैं। यह शायद उन्हीं की प्रेरणा है कि जिस खेलराज ब्लाग को लगभग बंद कर दिया था उसे अब नये नाम 'आंकड़ेबाज' से शुरू कर रहा हूं। आंकड़ों की इस दुकान में सबसे पहले भारत और दक्षिण अफ्रीका की टेस्ट श्रृंखला जो पांच नवंबर से मोहाली में शुरू हो रही है।

     भारत और दक्षिण अफ्रीका टेस्ट श्रृंखला से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े

1... भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच अब तक 29 टेस्ट मैच खेले जा चुके हैं। इनमें से भारत ने सात और दक्षिण अफ्रीका ने 13 में जीत दर्ज की। बाकी 9 मैच ड्रा रहे। भारतीय सरजमीं पर अब तक 12 टेस्ट मैच खेले गये हैं। इनमें दोनों टीमों ने पांच . पांच जीते हैं जबकि दो मैच अनिर्णीत समाप्त हुए हैं।
2... भारतीय धरती पर दोनों देशों के बीच पांच श्रृंखलाएं खेली गयी हैं। इनमें से भारत ने दो में जीत दर्ज की जबकि दक्षिण अफ्रीका ने एक श्रृंखला जीती। पिछली दोनों टेस्ट श्रृंखलाएं बराबरी पर छूटी थी। ओवरआल 12वीं बार ये दोनों देश किसी टेस्ट श्रृंखला में आमने सामने होंगे। पिछले 11 अवसरों में से दक्षिण अफ्रीका छह बार सीरीज जीतने में सफल रहा जबकि भारत ने दो बार श्रृंखला अपने नाम की। बाकी तीन श्रृंखलाएं बराबर रही।
3... वर्तमान श्रृंखला में माना जा रहा है कि एबी डिविलियर्स भारत को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं लेकिन वह हाशिम अमला ​हैं जिन्होंने अब तक भारतीय सरजमीं पर सबसे अधिक धमाल मचाया है। इन दोनों देशों के बीच टेस्ट मैचों में सर्वाधिक 1741 रन सचिन तेंदुलकर ने बनाये हैं और उनके बाद जाक कैलिस (1734 रन) का नंबर आता है लेकिन अमला 1207 रन बनाकर बहुत पीछे नहीं हैं।
4... अमला की निगाह इस श्रृंखला में कई रिकार्डों पर टिकी रहेगी। तेंदुलकर के दोनों देशों के बीच सर्वाधिक रन के रिकार्ड की बराबरी करने के लिये उन्हें 534 रन चाहिए। अमला ने अब तक भारत के खिलाफ पांच शतक लगाये हैं और वह दोनों देशों के बीच सर्वाधिक शतक के तेंदुलकर और कैलिस (सात सात शतक) के रिकार्ड को भी तोड़ना चाहेंगे।
5... अमला हालांकि सबसे पहले दोनों देशों के बीच श्रृंखलाओं में भारतीय सरजमीं पर सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज बनना चाहेंगे। अभी रिकार्ड वीरेंद्र सहवाग (924 रन) के नाम पर है। अमला को उनकी बराबरी के लिये केवल 101 रन चाहिए। अमला ने भारतीय सरजमीं पर अभी तक छह मैचों में चार शतकों की मदद से 823 रन बनाये हैं और उनका औसत 102 . 87 है। मतलब वर्तमान श्रृंखला में यदि वह 177 रन बना लेते हैं तो भारतीय सरजमीं पर 1000 या इससे अधिक रन बनाने वाले चौथे विदेशी बल्लेबाज बन जाएंगे। अभी तक क्लाइव लायड (1359), गोर्डन ग्रीनिज (1042) और मैथ्यू हेडन (1027) ही यह कारनामा कर पाये हैं। एक शतक लगाते ही अमला भारतीय धरती पर सर्वाधिक सैकड़े जड़ने वाले विदेशी बल्लेबाज भी बन जाएंगे। अभी लायड, एवर्टन वीक्स, एलिस्टेयर कुक और अमला चारों ने चार चार शतक लगाये हैं।
6... भारत के वर्तमान बल्लेबाजों में चेतेश्वर पुजारा ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ सर्वाधिक 311 रन बनाये हैं जिसमें एक शतक शामिल हैं। विराट कोहली ने भी एक शतक की मदद से 272 रन बनाये हैं।
7... दोनों देशों के बीच टेस्ट मैचों में अब तक केवल चार दोहरे शतक लगे हैं। ये हैं सहवाग (319), अमला (153 नाबाद), डिविलियर्स (217) और कैलिस (201 नाबाद)।
8... किसी एक श्रृंखला में सर्वाधिक रन बनाने का रिकार्ड जाक कैलिस के नाम पर है। उन्होंने 2010.11 में तीन मैचों में 498 रन बनाये थे। अमला ने इससे पहले फरवरी 2010 में दो मैचों में 490 रन ठोक दिये थे। उन्होंने तब तीनों पारियों में शतक जड़ा था। इस तरह से यदि वह मोहाली में पहली पारी में शतक लगाते हैं तो यह उनका भारतीय धरती पर लगातार चौथा शतक होगा।
9... भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच टेस्ट मैचों में अनिल कुंबले ने सर्वाधिक 84 विकेट लिये हैं। वर्तमान गेंदबाजों में डेल स्टेन 63 विकेट लेकर सबसे आगे हैं। कुंबले की बराबरी के लिये उन्हें 21 विकेट चाहिए।
10... दोनों देशों के बीच विकेटकीपर द्वारा सर्वाधिक शिकार का रिकार्ड मार्क बाउचर (60) के नाम पर है। सर्वाधिक कैच कैलिस (23) ने लिये हैं। वर्तमान खिलाड़ियों में डिविलियर्स (15), अमला (10), पुजारा (6) और मुरली विजय (5) का नंबर आता है।

Friday, March 27, 2015

क्रिकेट में हार पर दुख और खुशी

                                  धर्मेन्द्र पंत 

    भारतीय क्रिकेट टीम हार गयी। मुझे दुख नहीं हुआ। यह दुख बहुत पहले काफूर हो चुका था। मुझे याद है ​1987 के विश्व कप सेमीफाइनल की। भारत का सामना इंग्लैंड से था और लक्ष्य का पीछा करते हुए भारतीय विकेट धड़ाधड़ गिर रहे थे। मैं तब रेडियो पर कमेंट्री सुन रहा था। कमेंटेटर के मुंह से जैसे ही निकला, ''ये रवि शास्त्री का हवा में लहराता शाट और कैच आउट ...।'' रेडियो की सलामती के लिये उसे पिताजी को सौंप दिया था। शायद यह आखिरी क्षण था जबकि मुझे भारतीय टीम की हार पर दुख हुआ। इसके बाद एक पत्रकार के रूप में खेलों से जुड़ा और यह जीवन का हिस्सा बन गया। जल्द ही समझ में आ गया कि अगर दो टीमें आपस में खेलेंगी तो जीत एक को ही मिलेगी। एक टीम को हारना है तभी दूसरी जीतेगी। हारने वाली टीम भारत की भी हो सकती है। यही खेल है। यही जिंदगी है। भारत की जीत के साथ हार की रिपोर्ट भी कई बार तैयार की लेकिन दोनों के साथ पूरा न्याय किया। 
      भारत की हार पर मैंने लोगों की प्रतिक्रियाएं भी देखी। हार पर आक्रामक प्रतिक्रिया देने वालों को मैंने कभी क्रिकेट प्रेमी नहीं माना। किसी खेल का प्रेमी हुड़दंगी नहीं होता। वे निराश हो सकते हैं, वे दुखी हो सकते हैं, वे किसी खिलाड़ी को कोस सकते हैं लेकिन उसे गाली नहीं दे सकते। उसके पुतले नहीं जला सकते। उसके घर में पथराव नहीं कर सकते। ऐसे लोगों पर मुझे हमेशा दया आयी। मैंने उनमें एक अपरिपक्व इंसान देखा। सिडनी में आस्ट्रेलिया के हाथों भारत की हार के बाद विराट कोहली की महिला मित्र अनुष्का शर्मा को कोसने वाले व्यक्ति भी इसी श्रेणी में आते हैं। ये सभी लोग दया के पात्र हैं। वे उस भीड़ का हिस्सा हैं जिनका न तो क्रिकेट से लेना देना है और ना ही देश से। उन्हें तो बस बात का बतंगड़ बनाना है और मुझे अफसोस इस बात का है कि मीडिया से जुड़े कुछ लोग भी इसमें शामिल हैं। प्रिंट मीडिया फिर भी संयम दिखाता है लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया का व्यवहार कई अवसरों पर बेहद असंयमित हो जाता है। यह ठीक उसी तरह से है जैसे कि कोई अफसर चंद रूपयों की खातिर अपना ईमान बेचे दे। तथाकथित टीआरपी के लिये पत्रकारिता को मत बेचिये प्लीज। 
         यह तो रही दुख, निराशा और अतिरंजित प्रतिक्रिया करने वाले लोगों की बात। एक और वर्ग है। यह वह वर्ग है जो भारत की हार पर खुश होता है और इसमें वे लोग शामिल हैं जिनको लगता है कि क्रिकेट देश के अन्य खेलों को बर्बाद कर रहा है क्योंकि हाकी या फुटबाल में हार पर विस्फोटक प्रतिक्रियाएं देखने या सुनने को नहीं मिलती। क्या वास्तव में इस सबके लिये क्रिकेट दोषी है। मैं ऐसा नहीं मानता। इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका में तो क्रिकेट के साथ साथ फुटबाल, रग्बी, हाकी आदि टीम गेम भी समान रूप से आगे बढ़े हैं। विश्व कप की दूसरी फाइनलिस्ट न्यूजीलैंड में रग्बी हावी है। हालैंड हाकी का दीवाना है ​लेकिन फुटबाल में उसकी टीम अव्वल दर्जे की है और वह क्रिकेट में भी दखल देता है। जर्मनी के सामने फुटबाल हो या हाकी दुनिया की कोई टीम टिक नहीं सकती। ऐसे कई देश हैं जिन्होंने कई टीम खेलों में अपनी महारत दिखायी और वे समान रूप से आगे बढ़े। 
     फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं हो पाया। इसके कई कारण हैं। इनमें पहला कारण तो भारतीय खेल संघों की व्यवस्था और लालफीताशाही है। खिलाड़ियों के लिये सुविधाओं का अभाव है। लेकिन सबस अहम कारण टीमों का विश्व स्तर पर अच्छे परिणाम नहीं देना है। आखिर जब हाकी टीम ने एशियाड में स्वर्ण पदक जीता था तो फिर देश के हर खेल प्रेमी ने खिलाड़ियों को सर आंखों पर बिठाया था। अभिनव बिंद्रा का ओलंपिक स्वर्ण आज भी हर भारतीय की जुबान है और मेरीकाम या साइना नेहवाल से पूछिये कि ओलंपिक में पदक की कीमत क्या होती हैं। उन्होंने प​रिणाम दिये तो आज भारतीय खेलों में उनका दर्जा महारानी जैसा है। सानिया मिर्जा एक समय कमाई और लोकप्रियता दोनों में तब के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटरों को बराबर की टक्कर देती थी। कई नाम हैं लिएंडर पेस, महेश भूपति, सुशील कुमार, विजेंदर सिंह, दीपिका कुमारी, जीव मिल्खा सिंह, बाईचुंग भूटिया, सरदार सिंह जिनको मीडिया ने हमेशा तवज्जो दी। मुझे नहीं लगता कि इनमें से कोई भी ऐसा खिलाड़ी होगा जो देश में दूसरे खेलों की दुर्दशा के लिये क्रिकेट को दोषी देगा। आखिर क्रिकेट हमें ज्यादा मनोरंजन देता है तो फिर उसे क्यों कोसा जाए। मुझे तो लगता है कि यह खुश होने का कारण है कि चलो एक खेल तो ऐसा है जिसमें हम विश्व में जीवंत उपस्थिति दर्ज कराते हैं। 
    इसलिए क्रिकेट हो या हाकी हर खेल का मजा लीजिए। खेल मनोरंजन के लिये होते हैं। उनका आनंद उठाइये। गुस्सा और घृणा को थूक दीजिए। 

Saturday, March 14, 2015

अब विशाल नहीं कहलाता 300

                                                            धर्मेन्द्र पंत 
       ईसीसी ने विश्व कप से पहले कहा था कि वह बल्ले और गेंद के बीच संतुलन पैदा करना चाहती है। उसने सीमा रेखा बढ़ाने का तर्क दिया ताकि आम शाट छक्के में तब्दील नहीं हो पाये। फिर भी रन बन रहे हैं और छक्के लग रहे हैं। अब तक जिन 39 मैचों में खेल संभव हो पाया उनमें से 25 में 300 से अधिक स्कोर बन गया है। तीन बार तो स्कोर 400 रन के पार भी पहुंच गया। रन आगे भी बनते रहेंगे क्योंकि जब नियम बल्लेबाजों के पक्ष में रहेंगे तब तक संतुलन नहीं साधा जा सकता है। पांच क्षेत्ररक्षकों को हर समय 30 गज के घेरे के अंदर रखने से नियम के चलते गेंदबाजों के साथ न्याय करने की बात नहीं की जा सकती है। इसके अलावा बल्ले इस तरह से तैयार किये जा रहे हैं उनके 'स्वीट स्पाट' की शक्ति चार गुनी बढ़ गयी है। ट्वेंटी . 20 क्रिकेट के आगमन से बल्लेबाजों के रवैये में भी बदलाव हुआ। वे अधिक आक्रामक बन गये। तिस पर नियमों और बल्ले ने भी उन्हें पूरी मदद पहुंचायी।
       मैं पिछले 23 साल से खेल पत्रकारिता कर रहा हूं। एक जमाना था जब हम एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 200 के आसपास के स्कोर को चुनौतीपूर्ण लिखते थे। 250 या 260 रन का स्कोर बड़ा हो जाता था और 300 रन, उसके लिये तो 'रनों का एवरेस्ट' खड़ा कर दिया लिखने में भी हमें गुरेज नहीं थी। लेकिन अब 400 रन के स्कोर के लिये भी इस शब्द का उपयोग करने में हिचकिचाहट होती है। आखिर विरोधी टीम भी नियमों का सहारा लेकर यहां तक पहुंच सकती है। पिछले कुछ वर्षों में यह बदलाव आया है क्योंकि 2002 में नेटवेस्ट सीरीज में भारत ने जब 326 रन का लक्ष्य हासिल किया था तो हमने यही लिखा था कि 'भारत ने इंग्लैंड के रन एवरेस्ट को बौना कर दिया।'

कभी एवरेस्ट कहलाता था 300 का स्कोर 

      ब विश्व कप में ही देख लीजिए। पहले तीन विश्व कप में प्रत्येक पारी 60 ओवर की होती थी लेकिन तब भी 250 या 300 रन तक पहुंचना मुश्किल होता था। पहले तीनों विश्व कप इंग्लैंड में खेले गये। इनमें से पहले विश्व कप में चार बार 300 रन से अधिक का स्कोर बना। इंग्लैंड ने तब भारत के खिलाफ लार्ड्स में चार विकेट पर 334 रन बनाये थे और उसका यह रिकार्ड 1983 में पाकिस्तान ने श्रीलंका के खिलाफ स्वान्सी में पांच विकेट पर 338 रन बनाकर तोड़ा था। इससे पहले 1979 विश्व कप में तो कोई भी टीम 300 रन के स्कोर तक नहीं पहुंच पायी थी। उस टूर्नामेंट का उच्चतम स्कोर छह विकेट पर 293 रन था जो वेस्टइंडीज ने पाकिस्तान के खिलाफ ओवल में बनाया था। आलम यह था कि 250 या उससे अधिक रन के केवल चार स्कोर बने थे और 19 बार टीमों ने 200 से भी कम का स्कोर बनाया था। इसके चार साल बाद 1983 में हालांकि 15 बार टीमों ने 250 या इससे अधिक रन बनाये। चार बार 300 से अधिक का स्कोर बना।
     पहली बार विश्व कप 1987 में इंग्लैंड से बाहर निकला। अब ओवरों की संख्या घटकर 50 रह गयी थी लेकिन बल्लेबाज तेजी से रन बनाना सीख रहे थे। भारत और पाकिस्तान में खेले गये विश्व कप 1987 में केवल एक बार 300 से अधिक का स्कोर बना। वेस्टइंडीज ने श्रीलंका के खिलाफ कराची में चार विकेट पर 360 रन का विशाल स्कोर खड़ा कर दिया था। वैसे इस टूर्नामेंट में 250 रन से अधिक 16 स्कोर बने थे। 
        आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने इससे पहले 1992 में विश्व कप की मेजबानी की थी लेकिन तब भी रनों की बारिश नहीं हुई थी। केवल दस पारियों में 250 रन से अधिक का स्कोर बना था। सिर्फ दो टीमें 300 रन के 'पहाड़' को पार कर पायी थी और दिलचस्प तथ्य ये है कि ये दोनों स्कोर एक ही मैच में बने थे। जिम्बाब्वे ने न्यू प्लाईमाउथ में श्रीलंका के खिलाफ चार विकेट पर 312 रन बनाये। यह एंडी फ्लावर का पहला वनडे थे जिसमें उन्होंने 115 रन बनाये और एंडी वालेर ने 45 गेंदों पर 83 रन ठोके थे। श्रीलंका ने हालांकि सात विकेट पर 313 रन बनाकर जिम्बाब्वे के रनों के एवरेस्ट को छोटा कर दिया था। भारत की बात करें तो तब मोहम्मद अजहरूद्दीन की अगुवाई वाली टीम का सर्वोच्च स्कोर था 234 रन। उसने आस्ट्रेलिया के खिलाफ ब्रिस्बेन में 47 ओवरों में यह स्कोर बनाया था। 
        भारतीय उपमहाद्वीप में 1996 में जब दूसरी बार विश्व कप का आयोजन हुआ तो तब रिकार्ड पांच बार 300 से अधिक रन का स्कोर बना था। श्रीलंका ने केन्या के खिलाफ कैंडी में पांच विकेट पर 398 रन का रिकार्ड स्कोर खड़ा कर दिया था। कुल 18 पारियों में स्कोर 250 रन के पार पहुंचा। दक्षिण अफ्रीका ने दो बार 300 रन की संख्या को पार किया लेकिन भारत के लिये यह तब भी दूर की कौड़ी बनी रही। उसका उच्चतम स्कोर आठ विकेट पर 287 रन था जो उसने पाकिस्तान के खिलाफ बेंगलूर में क्वार्टर फाइनल में बनाया था। भारत 1999 में पहली बार विश्व कप में 300 रन की संख्या को पार करने में सफल रहा था। इंग्लैंड में खेले गये टूर्नामेंट में उसने श्रीलंका के खिलाफ टांटन में छह विकेट पर 373 रन बनाये और फिर केन्या के खिलाफ ब्रिस्टल में दो विकेट पर 329 रन ठोके। भारत के ​अलावा केवल आस्ट्रेलिया एक बार (303/4 बनाम जिम्बाब्वे बर्मिंघम) 300 रन की संख्या छू पाया था। वैसे इस टूर्नामेंट कुल 19 स्कोर 250 रन से अधिक के थे।

नयी सदी में छोटा बन गया 300

           स्ट्रेलिया ने 2003 में अफ्रीकी महाद्वीप में खेले गये विश्व कप में भारत के खिलाफ जोहानिसबर्ग में खेले गये फाइनल में दो विकेट पर 359 रन बना दिये थे। भारत ​लगातार आठ मैच जीतकर फाइनल में पहुंचा था लेकिन रनों के इस पहाड़ के सामने उसकी हार पहले से ही तय मानी जाने लगी थी। वैसे विश्व कप 2003 में 300 रन से अधिक स्कोर का नया रिकार्ड बना था। कुल नौ बार 300 या इससे अधिक के स्कोर बने। यही नहीं 26 बार टीमों ने 250 रन की संख्या को छुआ। भारत का उच्चतम स्कोर दो विकेट पर 311 रन था जो उसने नामीबिया के खिलाफ पीटरमैरित्जबर्ग में बनाया था। इसके चार साल बाद वेस्टइंडीज में खेले गये विश्व कप में बल्लेबाजों ने बाउंड्री छोटी होने का पूरा फायदा उठाया और 16 बार 300 रन का आंकड़ा स्पर्श किया गया। भारत भले ही तब पहले दौर में बाहर हो गया था लेकिन उसने बरमुडा को क्रिकेट का ककहरा सिखाकर पांच विकेट पर 413 रन बना दिये थे। चैंपियन आस्ट्रेलिया ने पांच बार 300 से अधिक का स्कोर बनाया। उप विजेता श्रीलंका तीन, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका दो . दो जबकि भारत, इंगलैंड, पाकिस्तान और वेस्टइंडीज एक एक बार 300 रन तक पहुंचे थे। नियम बल्लेबाजों के अनुकूल बनने लगे थे और सभी टीमों ने इसका फायदा उठाया। कुल 25 बार टीमें 250 रन या इससे अधिक का स्कोर खड़ा करने में सफल रही थी।  
           रनों का अंबार लगना शुरू हो गया था और 2011 विश्व कप में भारतीय उपमहाद्वीप की सपाट पिचों पर 17 बार 300 या इससे अधिक का स्कोर का नया रिकार्ड बन गया। अब समय आ गया था जबकि 250 और 300 के बीच के लक्ष्य को बड़ा कहना इस शब्द के प्रति अन्याय लगने लगा था। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि 37 बार टीमों ने 250 रन या इससे अधिक रन बनाये थे। भारत ने बांग्लादेश के खिलाफ ढाका में चार विकेट पर 370 रन बनाये। इस मैच में तो वह जीत गया था लेकिन इंग्लैंड के खिलाफ बेंगलूर में 338 रन का स्कोर भी बड़ा नहीं बन पाया। इंग्लैंड ने इसकी बराबरी करके मैच टाई करवा दिया था। 
    और अब विश्व कप 2015 में वेस्टइंडीज 300 रन से अधिक का स्कोर बनाकर अपनी जीत मानकर चलने लग जाता है लेकिन आयरलैंड लक्ष्य हासिल कर लेता है। यह सभी टीमों के लिये साफ संकेत था कि वे 300 रन के स्कोर को बड़ा नहीं माने। अब 300 रन को मैं विशाल स्कोर नहीं लिखता और अगर 39 मैचों में 40 बार टीमें 250 रन या इससे अधिक स्कोर बना लेती हैं तो 250 से अधिक और 300 रन से कम के स्कोर को चुनौतीपूर्ण लिखने में भी झिझक लगती है। 
                     (सभी आंकड़े 14 मार्च 2015 तक के हैं।)
                                                                                     


Monday, March 9, 2015

भारत . बांग्लादेश में हो सकता है क्वार्टर फाइनल

   
जीत का जश्न। बांग्लादेश इसका हकदार है। फोटो सौजन्य : बीसीबी 
 इंग्लैंड विश्व कप के पहले दौर से बाहर हो गया। तीन बार के उपविजेता का इस तरह दर्दनाक पराजयों का बोझ लिये विदा होना अच्छा नहीं लगा। लेकिन साथ ही खुशी भी हुई। बांग्लादेश ने पहली बार अपना दम दिखाया है। अब तक उसे पुछल्ली टीम ही कहा जाता था जो यदाकदा ही जीत दर्ज कर पाती थी। उसकी हार पहले ही तय मान ली जाती थी और इसलिए जब आईसीसी ने क्वार्टर फाइनल के लिये कार्यक्रम तय किया तो उसने मेलबर्न में इंग्लैंड का मैच रखा था। अब वहां बांग्लादेश खेलेगा। यह दूसरा क्वार्टर फाइनल 19 मार्च को होगा और पूरी संभावना है कि यह मैच भारत और बांग्लादेश के बीच खेला जाएगा। 
      बांग्लादेश को ग्रुप ए में अपना आखिरी लीग मैच न्यूजीलैंड से खेलना है जो अब तक अजेय है और जिसने अधिकतर एकतरफा जीत दर्ज की। बांग्लादेश उलटफेर का माद्दा रखता है लेकिन फिर इस मैच में जीत का प्रबल दावेदार न्यूजीलैंड ही रहेगा। बांग्लादेश अभी ग्रुप ए में तीसरे स्थान पर है लेकिन चौथे स्थान पर काबिज श्रीलंका को अपना अंतिम मैच में स्काटलैंड से खेलना है। उसमें उसकी जीत भी तय मानी जा रही है। आस्ट्रेलिया के भी सात अंक हैं लेकिन उसे भी आखिरी मैच में स्काटलैंड से भिड़ना है जिसने अब तक एक भी मैच नहीं जीता है। यदि न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया और श्रीलंका अपने अपने आखिरी मैच जीत जाते हैं तो ग्रुप ए में वे पहले तीन स्थान पर काबिज हो जाएंगे। बांग्लादेश चौथे स्थान पर खिसक जाएगा। 
     यह तय हो चुका है कि बांग्लादेश को मेलबर्न में अपना क्वार्टर फाइनल मैच खेलना है। यदि वह ग्रुप ए से चौथे स्थान पर रहता तो उसका सामना ग्रुप बी से पहले स्थान पर रहने वाली टीम से होगा। ग्रुप बी से भारत का पहला स्थान तय है। ऐसे में ये दोनों पड़ोसी देश आमने सामने होंगे। भारत इस मैच में 2007 जैसी गलती से बचना चाहेगा और जिस तरह की फार्म में अभी वह है उसके लिये जीत दर्ज करना आसान होगा। अभी के हिसाब से श्रीलंका का सामना दक्षिण अफ्रीका से हो सकता है। 
     ब जरा इंग्लैंड की बात कर लें। उसकी हार के लिये उसके बोर्ड यानि ईसीबी के कुछ अजीबोगरीब फैसले भी जिम्मेदार रहे। वह आखिर तक तय नहीं कर पाया कि टीम का कप्तान कौन होगा। एलिस्टेयर कुक को आनन फानन में हटाकर इयोन मोर्गन को कप्तानी सौंपने का फैसला बुद्धिमतापूर्ण नहीं था। बेहतर होता कि कुक को टीम में भी बनाये रखा जाता। मोर्गन कप्तानी का दबाव नहीं झेल पा रहे हैं और उनके प्रदर्शन में साफ तौर पर इसकी छाप दिख रही है। उनकी कप्तानी में अपरिपक्वता भी साफ नजर आयी। 
        दूसरी बात इंग्लैंड की टीम में कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं था जिसका नाम ही विरोधी गेंदबाजों के दिलो दिमाग में खौफ पैदा कर दे। उसके पास फिलहाल केविन पीटरसन ही ऐसा खिलाड़ी था लेकिन ईसीबी और पीटरसन दोनों ने अपनी टीम, क्रिकेट और विश्व कप के बजाय अपने अहं को अधिक तवज्जो दी और नतीजा सामने है। पीटरसन अब भी ऐसा खिलाड़ी है जो अकेले दम पर मैच का पासा पलट सकता है। इंग्लैंड की वर्तमान टीम में कोई भी अन्य खिलाड़ी ऐसा नजर नहीं आता है। उसे अपनी गेंदबाजी पर भरोसा था लेकिन विश्व कप में भी यह साबित हो गया कि जेम्स एंडरसन और स्टुअर्ट ब्राड जैसे गेंदबाज टेस्ट क्रिकेट में कहर बरपा सकते हैं लेकिन एकदिवसीय क्रिकेट अलग तरह का खेल है और यहां उनकी तूती नहीं बोलती। 
    ​बहरहाल अभी बांग्लादेश के लिये ताली बजाइये। इस बार वह किसी अगर मगर के बिना क्वार्टर फाइनल में पहुंचा है। विश्व कप में पहली बार एशिया की चार टीमों को हम क्वार्टर फाइनल में देख सकते हैं। यह एशियाई क्रिकेट के लिये भी खुशी की बात है।  यह उसके लिये बड़ी जीत है। इंग्लैंड को तो पिछले कुछ विश्व कप से शुरूआती दौर में बाहर आने की आदत पड़ चुकी है। उम्मीद है कि इस बार वह घर जाकर 2019 के बारे में विचार करेगा। आखिर तब उसे अपनी पिचों पर विश्व कप खेलना है और उसके दर्शक नहीं चाहेंगे कि उनकी टीम उनके सामने बुजदिलों जैसा प्रदर्शन करे।

Tuesday, March 3, 2015

जब पूरी भारतीय पारी में लगे केवल दो चौके

     भारतीय टीम ने लगभग 48 ओवर बल्लेबाजी की लेकिन इस दौरान वह केवल दो बार गेंद को सीमा रेखा के पार भेज पायी। भारतीय टीम की तरफ से ये दोनों चौके भी एक बल्लेबाज ने लगाये थे। यह दिलचस्प नजारा आज से लगभग 14 साल पहले छह दिसंबर 1991 को पर्थ के वाका मैदान पर देखने को मिला था। बेंसन एंड हेजस विश्व सीरीज के इस मैच में भारत के सामने वेस्टइंडीज था। ये दोनों टीमें अर्से बाद फिर से वाका पर छह मार्च यानि होली के दिन विश्व कप मैच के लिये आमने सामने होंगी और उस दिन इतना तय है कि भारतीय पारी में केवल दो चौके नहीं पड़ेंगे। 
     भारत और वेस्टइंडीज के बीच इससे पहले पर्थ में खेला गया एकमात्र मैच कई मायनों में खास था। इस मैच में दोनों टीमों ने 40 से अधिक ओवर खेले लेकिन बल्लेबाज वाका की तेज और उछाल वाली पिच से सामंजस्य नहीं बिठा पाये और कम स्कोर का यह मैच टाई रहा था। 
रवि शास्त्री के बल्ले से निकले थे दोनों चौके
    भारत को पहले बल्लेबाजी का न्यौता मिला और उसकी पूरी टीम 47.4 ओवर में 126 रन पर सिमट गयी। भारतीय पारी की खासियत यह रही कि इसमें केवल दो चौके लगे। ये दोनों चौके भी सलामी बल्लेबाज रवि शास्त्री ने लगाये जो निदेशक के रूप में वर्तमान टीम के साथ अभी पर्थ में मौजूद हैं। शास्त्री ने तब टीम की तरफ से सर्वाधिक 33 रन भी बनाये थे। उनके बाद दूसरा बड़ा स्कोर अतिरिक्त रनों (24 रन) का था। प्रवीण आमरे (20 रन), संजय मांजरेकर (15 रन) और मनोज प्रभाकर (13 रन) भी दोहरे अंक में पहुंचे लेकिन कोई भी गेंद को सीमा रेखा पार नहीं पहुंचा पाया था। कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन, सचिन तेंदुलकर, के श्रीकांत, कपिल देव जैसे धुरंधर दोहरे अंक में नहीं पहुंच पाये थे। 
       अभी वेस्टइंडीज टीम से कोच के रूप में जुड़े कर्टली एंब्रोस ने तब 8.4 ओवर में केवल नौ रन देकर दो विकेट लिये थे और बाद में उन्हें मैन आफ द मैच भी चुना गया था। एंब्रोस ने बाद में बल्लेबाजी करते हुए 17 रन भी बनाये थे और मैच का एकमात्र छक्का भी लगाया था।
      लेकिन यह क्या वेस्टइंडीज के बल्लेबाजों ने फिर से 1983 के विश्व कप फाइनल की कहानी दोहरा दी जबकि कैरेबियाई टीम के लिये भारत का 183 रन का स्कोर पहाड़ जैसा बन गया था। यहां तो लक्ष्य 127 रन था और वेस्टइंडीज की टीम में कप्तान रिची रिचर्डसन, ब्रायन लारा, डेसमंड हेन्स, कार्ल हूपर जैसे बल्लेबाज थे। 
      कपिल ने पहली गेंद पर हेन्स को आउट कर दिया। इसके बाद फिलो वालेस, रिचर्डसन, लारा और हूपर दोहरे अंक में पहुंचे लेकिन इनमें से कोई भी 14 रन से आगे नहीं बढ़ा। वेस्टइंडीज के आठ विकेट 76 रन  पर निकल गये और उस पर हार का खतरा मंडराने लगा। एंब्रोस और दसवें नंबर के बल्लेबाज एंडरसन कमिन्स (24 रन) ने आखिरी क्षणों में मैच रोमांचक बना दिया। वेस्टइंडीज को जब छह रन और भारत को एक विकेट की दरकार थी तब तेंदुलकर ने गेंद संभाली। उनकी पहली पांच गेंदों पर पांच रन बने लेकिन आखिरी गेंद पर वह कमिन्स को आउट करने में सफल रहे। अजहर ने स्लिप में बेहतरीन कैच लपका।  वेस्टइंडीज की टीम 41 ओवर में 126 रन पर आउट हो गयी और मैच टाई हो गया।  अपना पहला एकदिवसीय मैच खेल रहे सुब्रत बनर्जी ने भारत की तरफ से तीन जबकि कपिल और जवागल श्रीनाथ ने दो . दो विकेट लिये थे। 
       रिकार्ड के लिये बता दें कि भारत ने पर्थ पर कुल 12 मैच (विश्व कप 2015 में यूएई के खिलाफ खेले गये मैच सहित) खेले हैं जिनमें से पांच में उसने जीत दर्ज की है जबकि छह मैचों में उसे हार मिली है। एक मैच टाई रहा है। 

Monday, February 23, 2015

फिर बदलेगा विश्व कप का प्रारूप

                                                                                            धर्मेन्द्र पंत 
    बात विश्व कप 2007 की है। बांग्लादेश ने पहले दौर में भारत को हराकर उलटफेर कर दिया और एक अन्य ग्रुप में आयरलैंड ने पाकिस्तान को पीट दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि उपमहाद्वीप की ये दोनों टीमें पहले दौर से आगे नहीं बढ़ पायी। यह भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट प्रेमियों के लिये ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानि आईसीसी के लिये भी झटका था। आईसीसी का यह नंबर एक टूर्नामेंट है और इससे उसे मोटी कमाई होती है लेकिन विशेषकर भारतीय टीम के जल्दी स्वदेश लौटने के कारण विश्व कप की लोकप्रियता का ग्राफ अचानक ही नीचे गिर गया। आईसीसी की उम्मीद के मुताबिक कमाई भी नहीं हुई और तब क्रिकेट की इस सर्वोच्च संस्था को भारत का महत्व पता चल गया। अब ऐसा प्रारूप तैयार किया जाने लगा जिससे भारत कम से कम नाकआउट तक पहुंच पाये। उसके बाद मैच कितने ही बचते हैं और फिर सेमीफाइनल, फाइनल में तो सभी की दिलचस्पी बनी ही रहती है।
        इसलिए 2011 से टीमों को चार नहीं दो ग्रुप में बांट दिया गया। प्रत्येक ग्रुप में सात टीमें रखी गयी और चार टीमों के क्वार्टर फाइनल में पहुंचने का प्रावधान रखा गया। आईसीसी जो चाहता था वही हुआ। चोटी की आठ टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंची और भारत तो अपनी सरजमीं पर चैंपियन भी बन गया। इस बार आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में चल रहे विश्व कप में भी प्रारूप नहीं बदला गया। बांग्लादेश और जिम्बाब्वे जैसे टेस्ट खेलने वाले देशों सहित दोनों ग्रुप में तीन . तीन ऐसी टीमों को शामिल किया गया है जिन्हें कमजोर माना जा रहा है।
         आईसीसी फिर से चाहती  है कि आस्ट्रेलिया, भारत, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, इंग्लैंड, श्रीलंका और वेस्टइंडीज क्वार्टर फाइनल में पहुंचे। यदि ये थोड़ा सा अच्छा प्रदर्शन करें तो इनके लिये यह काम मुश्किल भी नहीं होगा। मसलन इंग्लैंड को ही लीजिए। वह अपने ग्रुप की दो मजबूत टीमों आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से बुरी तरह हार गया लेकिन अब स्काटलैंड को हराकर दौड़ में शामिल है। उसके ग्रुप में बांग्लादेश और अफगानिस्तान भी है और लग रहा है कि वह इनको हरा देगा। लेकिन एक उलटफेर होने पर आईसीसी के समीकरण बदल सकते हैं। जैसे कि आयरलैंड ने वेस्टइंडीज को हरा दिया और ऐसे में यदि वह बाकी तीन मजबूत टीमों से हार जाता और दूसरी तरफ आयरिश टीम दो अन्य कमजोर टीमों को हरा देती तो मामला गड़बड़ा जाता। इसके अलावा कई पूर्व क्रिकेटरों ने इस प्रारूप की आलोचना भी की। दर्शक भी केवल बड़े मैचों में दिलचस्पी ले रहे हैं। इसलिए अब आईसीसी को लगने लगा है कि यदि वह इस प्रारूप के साथ आगे बढ़ी तो टूर्नामेंट की लोकप्रियता पर असर पड़ सकता है।
         ईसीसी अब इंग्लैंड में 2019 में होने वाले विश्व कप के प्रारूप में बदलाव पर गंभीरता से विचार कर रही है। क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिये उसने इस टूर्नामेंट में एसोसिएट देशों को भी पर्याप्त जगह दी लेकिन ऐसे अधिकतर मुकाबले में एकतरफा रहे। इसलिए अब यह तय लग रहा है कि अगले विश्व कप में यह प्रारूप नहीं अपनाया जाएगा। आईसीसी फिर से पुरार्ने ढर्रे पर लौटने की सोच रही है। इससे पहले 1992 में जो प्रारूप था उसे दोबारा अपनाया जा सकता है। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में ही 1992 में खेले गये विश्व कप में नौ टीमों ने हिस्सा लिया। कोई ग्रुप नहीं था और सभी टीमें राउंड रोबिन आधार पर एक दूसरे से भिड़ीं और फिर जिन चार टीमों के सबसे अधिक अंक थे वे सेमीफाइनल में पहुंच गयी। भारत और आस्ट्रेलिया इन चार टीमों में शामिल नहीं थे।
            आईसीसी अब टूर्नामेंट में अधिक टीमों को शामिल करना चाहती थी और इसलिए 1996 में यह प्रारूप बदल दिया गया। छह छह टीमों के दो ग्रुप बनाये गये और प्रत्येक ग्रुप से चोटी पर रहने वाली चार टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंची। इंग्लैंड में 1999 में हुए विश्व कप में इसमें सीधे क्वार्टर फाइनल के बजाय सुपर सिक्स जोड़ दिया गया जिससे मैचों की संख्या बढ़ी। चार साल बाद 2003 में भी यही प्रारूप अपनाया गया लेकिन इस बार टीमों की संख्या बढ़कर 14 हो गयी थी यानि सात . सात टीमों के दो ग्रुप। यहां पर बड़ी टीमों के जल्द बाहर होने की संभावना बन गयी। मेजबान दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, पाकिस्तान, वेस्टइंडीज सुपर सिक्स में नहीं पहुंच पायी। इसके अलावा अंक आगे ले जाने की व्यवस्था के कारण भी यह प्रारूप जमा नहीं। इस प्रारूप को 2003 में ही विदाई दे दी गयी।  प्रारूप फिर बदल दिया गया। इस बार टीमों की संख्या भी 16 हो गयी और इसलिए चार चार टीमों के चार प्रारूप बन गये लेकिन भारत और पाकिस्तान के पहले दौर में बाहर होने से सारे योजनाएं धरी की धरी रह गयीं। तब प्रत्येक ग्रुप से दो टीमें सुपर आठ में पहुंची थी।
              अब फिर से प्रारूप बदलने जा रहा है। आईसीसी को पता चल गया है कि अधिक टीमों को शामिल करने से विश्व कप की लोकप्रियता या रोमांच नहीं बढ़ेगा। इसके उलट इन दोनों के स्तर में कमी आ रही है। इसलिए अब वह 2019 में दस टीमों को राउंड रोबिन आधार पर एक दूसरे से भिड़ाने की तैयारी कर रही है। सभी प्रारूपों पर गौर करने पर लगता है कि यह सही भी है। किसी टीम को किसी तरह का गिला शिकवा भी नहीं रहेगा। हां बारिश के कारण यदि कोई मैच रद्द होता है तो तब कुछ समीकरण गड़बड़ा सकते हैं लेकिन कुछ ऐसी चीजें होती हैं जिन पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता है और फिलहाल क्रिकेट में बारिश इन चीजों में शामिल है। जहां तक कमजोर टीमों का सवाल है तो उनके लिये टी20 विश्व चैंपियनशिप सबसे बढ़िया विकल्प है। क्रिकेट इस प्रारूप के जरिये ही दुनिया के तमाम देशों में फैलाया जा सकता है।
                                        
      

Sunday, February 15, 2015

भारत 6, पाकिस्तान 0

        भारत ने फिर 'बड़ी जीत' दर्ज की है। पाकिस्तान के लिये यह सबसे बड़ी हार है। इमरान खान ने 1992 में पाकिस्तान को विश्व कप दिलाया था लेकिन यही वह साल था जब ​क्रिकेट महाकुंभ में भारत ने पहली बार अपने इस चिर प्रतिद्वंद्वी को हराया था और तब यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। छह मैच और सभी में जीत, महज संयोग नहीं है। महेंद्र सिंह धौनी भले ही कह रहे थे कि पिछले रिकार्ड मायने नहीं रखते लेकिन पाकिस्तान के मामले में वह भी पिछले आंकड़ों का महत्व समझते होंगे। पाकिस्तान पर बहुत बड़ा बोझ है इन आंकड़ों का। अगर ऐसा नहीं होता तो उसके खिलाड़ी हर बार विश्व कप मैच से पहले इन आंकड़ों और इन्हें पलट देने की बात नहीं करते। असल में उसके खिलाड़ी मैच से पहले ही इन आंकड़ों के बोझ तले दबे होते हैं और भारत को इसका पूरा लाभ मिलता है। 
            पाकिस्तान और वहां ​के क्रिकेट प्रेमियों की हालत ऐसी हो गयी है कि यदि मिसबाह उल हक की टीम इस बार जीत जाती तो वह मिसबाह को इमरान से बड़ा हीरो बना देती। भारत की स्थिति भी इससे हटकर नहीं है। आप तमाम सोसल साइट्स पर पिछले दिनों की पोस्ट देख लीजिए। लबोलुबाब एक ही था। भारत विश्व कप का खिताब नहीं जीत पाये गम नहीं लेकिन वह पाकिस्तान से नहीं हारना चाहिए। भारत जीता तो हर तरफ पटाखों की गूंज थी। इस विश्व कप के दौरान शायद ये पटाखे अब भारत के फिर से विश्व कप जीतने पर ही सुनने को मिलें। भारत और पाकिस्तान की इस आपसी जंग को आईसीसी से लेकर बीसीसीआई तक सभी भुनाते हैं। क्रिकेट प्रशासन से जुड़ा हर शख्स चाहता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में खटास बनी रहे क्योंकि ​इस तरह के मैचों में रिश्तों की यही खटास उन्हें मोटा माल दिला देती है। आईसीसी को जितना फायदा भारत और पाकिस्तान के मैच से होती है उतनी किसी अन्य मैच से नहीं। मैच के प्रसारक भी मालामाल हो जाते हैं, इसलिए वह मैच से पहले ऐसे विज्ञापन तैयार करता है जिनमें खटास साफ नजर आती है। ऐसे में यह कहना कि क्रिकेट भारत और पाकिस्तान के दिलों को जोड़ता है या करीब लाता है, बेमानी हो जाता है। असलियत तो यह है कि जब भारत और पाकिस्तान क्रिकेट मैदान पर आमने सामने होते हैं तब सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच कटुता अधिक बढ़ जाती है। इसलिए रवि शास्त्री ने एक बार कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच के मैच किसी जंग से कम नहीं।

           र भारत ने फिर से जंग जीत ​ली है। पहली बार उसका पाकिस्तान की ऐसी टीम से मुकाबला था जो असल में मुकाबले में दिख ही नहीं रही थी। उनके हाव भाव से किसी भी समय ऐसा नहीं लगा कि यह वास्तव में पाकिस्तान की वही टीम है जिसके खिलाड़ियों को भारतीय दुश्मन नजर आते थे। भारतीयों के हाव भाव भी बदले हुए थे। अंतर इतना था कि भारतीय खिलाड़ियों में जीत की ललक थी। यह अच्छा संकेत है। यदि खिलाड़ी खेल भावना से खेलते हैं और इसे जंग के बजाय एक आम क्रिकेट मैच की तरह लेकर चलते हैं तो संभवत: प्रशंसक भी इस बात को समझेंगे।
    मैच की बात करें तो यह सभी जानते हैं कि पाकिस्तान के बल्लेबाज नहीं चले लेकिन मैच में सबसे बड़ा अंतर क्षेत्ररक्षकों ने पैदा किया। पाकिस्तानी क्षेत्ररक्षकों ने शुरू से कैच टपकाये जबकि भारत की तरफ से कुछ मुश्किल कैच लपके गये। उन्होंने फिर से 'लपको कैच, जीतो मैच' को सही साबित किया। भारतीय गेंदबाजों को इस प्रदर्शन से फूल कर कुप्पा होने की जरूरत भी नहीं क्योंकि उनकी असली परीक्षा नहीं हुई। उनकी अग्निपरीक्षा तो अगले रविवार को होगी जबकि दक्षिण अफ्रीका के दमदार बल्लेबाज उनके सामने होंगे। जयहिन्द।। 

                                                                                         धर्मेन्द्र पंत 

Saturday, January 31, 2015

विश्व कप में भारत की उम्मीद

                                                          धर्मेन्द्र मोहन पंत 
   
ईसीसी क्रिकेट विश्व कप यानि क्रिकेट का महाकुंभ अब केवल दो सप्ताह दूर है। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में 14 फरवरी से दुनिया की 14 टीमों के बीच प्रतिष्ठित विश्व कप ट्राफी के लिये जंग देखने को मिलेगी जो 29 मार्च तक चलेगी। भारत मौजूदा चैंपियन है और उससे काफी उम्मीद की जा रही है। अब तक केवल वेस्टइंडीज और आस्ट्रेलिया ही अपना खिताब बचाने में कामयाब रहे हैं। भारत इस श्रेणी में तीसरी टीम बनता है या नहीं यह महेंद्र सिंह धौनी और उसके 14 अन्य साथियों के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। भारत को पूल बी दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, वेस्टइंडीज, जिम्बाब्वे, आयरलैंड और संयुक्त अरब अमीरात के साथ रखा गया है। पूल ए में मेजबान आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और स्काटलैंड हैं। लीग चरण में प्रत्येक पूल से चार . चार टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंचेंगी। मतलब साफ है कि चोटी की आठ टीमों के लिये अंतिम आठ में जगह बनाना मुश्किल नहीं होगा। असली जंग तो क्वार्टर फाइनल के बाद शुरू होगी। जो टीम आखिरी तीन मैचों में अच्छा प्रदर्शन करेगी वहीं विश्व चैंपियन बनेगी। बड़ी टीमों के लिहाज से यह प्रारूप बेहद आसान बना दिया गया है।   
       भारतीय टीम के हाल के प्रदर्शन को देखकर और कुछ नये खिलाड़ियों के सहारे आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सरजमीं पर उतरने के कारण कई क्रिकेट विश्लेषक मान रहे हैं टीम को 1992 की तरह मुंह की खानी पड़ सकती है। तब भी आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सह मेजबानी में विश्व कप का आयोजन हुआ था और मोहम्मद अजहरूद्दीन की अगुवाई वाली भारतीय टीम का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था। भारतीय टीम की कमान फिर से महेंद्र सिंह धौनी के हाथों में है जिनकी अगुवाई में भारत ने टी20 विश्व चैंपियनशिप 2007, वनडे विश्व कप 2011 और चैंपियन्स ट्राफी 2013 में खिताब जीते थे। धौनी को तिहरी भूमिका निभानी पड़ेगी। उन्हें छठे नंबर के बल्लेबाज के तौर पर डेथ ओवरों में अहम रन जोड़ने होंगे और फिनिशर की अपनी भूमिका ​को निखारना होगा। इसके अलावा वह विकेटकीपर भी हैं।
      शीर्ष क्रम में शिखर धवन, रोहित शर्मा और अंजिक्य रहाणे हैं। धवन पिछले कुछ समय से रन बनाने के लिये जूझ रहे हैं। रोहित अच्छी फार्म में हैं लेकिन उनकी चोट टीम के लिये चिंता का विषय है। ऐसे में रहाणे बचते हैं जो फिलहाल रन भी बना रहे हैं और टीम के भरोसेमंद बल्लेबाजों में से एक हैं। विराट कोहली की शीर्ष मध्यक्रम में भूमिका अहम होगी। बेहतर यही है कि धौनी उनके साथ प्रयोग नहीं करें और उन्हें वनडे में उनके पसंदीदा स्थान तीसरे नंबर पर ही उतारें। त्रिकोणीय श्रृंखला में कोहली को नंबर चार पर उतारने का दांव नहीं चल पाया था। यदि धवन चल जाते हैं और रोहित फिट होते हैं तो फिर रहाणे नंबर चार पर पारी संवारने का काम कर सकते हैं। सुरेश रैना नंबर पांच पर फिट ​बैठते हैं। बायें हाथ का यह बल्लेबाज दूसरे पावरप्ले का अच्छा उपयोग कर सकता है। अंबाती रायुडु को जरूरत पड़ने पर नंबर चार पर उतारा जा सकता है। वह विकेटकीपिंग का जिम्मा भी संभाल सकते हैं। धौनी इसके बाद नंबर छह पर बल्लेबाजी के लिये आएंगे।
           भारत के पास आलराउंडर के नाम पर स्टुअर्ट बिन्नी और रविंद्र जडेजा हैं। जडेजा ने हाल में फिटनेस हासिल की है लेकिन उन्हें विश्व कप से पहले खुद को मैचों के लिये भी तैयार करना होगा। बिन्नी को यह साबित करना होगा कि उनका चयन 'सिफारिशी' नहीं था। उनकी सीम और स्विंग गेंदबाजी आस्ट्रेलियाई परिस्थितियों में कारगर साबित हो सकती है। जडेजा बायें हाथ के स्पिनर हैं और निचले क्रम में विशेषकर सातवें नंबर पर अच्छी बल्लेबाजी कर सकते हैं। बिन्नी और जडेजा के बीच इस स्थान के लिये स्वस्थ प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी।

     भारत की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी गेंदबाजी मानी जा रही है क्योंकि आस्ट्रेलियाई दौरे में गेंदबाजों ने जब तब निराश किया। वनडे के बदले हुए नियमों में भारतीय गेंदबाजों को विश्व कप के दौरान कड़ी परीक्षा से गुजरना होगा। तेज गेंदबाजों में इशांत शर्मा सबसे अधिक अनुभवी हैं और उन्हें आस्ट्रेलिया की पिचों का अच्छी तरह से उपयोग करना भी आता है। भारत के विश्व कप अभियान के लिये इशांत का फिट रहना भी जरूरी है। भुवनेश्वर कुमार और मोहम्मद शमी समय समय पर विकेट निकालने में माहिर हैं लेकिन उमेश यादव अपनी गेंदों पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं। शमी भी कई बार लाइन और लेंथ भूल जाते हैं और यदि ये दोनों विश्व कप में ऐसी गलती करते हैं तो वह भारत को भारी पड़ सकती हैं। स्पिन विभाग का जिम्मा रविचंद्रन अश्विन पर रहेगा। यह आफ स्पिनर चतुराई भरी गेंदबाजी करता है और बल्लेबाज का मन पढ़कर गेंदबाजी करता है लेकिन पिचों से उन्हें मदद मिलेगी इसमें संदेह है। उनके साथ बायें हाथ के स्पिनर अक्षर पटेल हैं जिन्होंने अब तक अवसरों का अच्छा फायदा उठाया है। उम्मीद है कि गुजरात का यह 21 वर्षीय स्पिनर विश्व कप में अच्छा प्रदर्शन करके ​भारत की वनडे टीम में अपनी जगह पक्की करने की कोशिश करेगा। अश्विन और अक्षर दोनों निचले क्रम में कुछ उपयोगी रन भी बनाने में सक्षम हैं।

                     विश्व कप में भारत के मैचों का कार्यक्रम (भारतीय समयानुसार)
        रविवार, 15 फरवरी .. भारत बनाम पाकिस्तान, एडिलेड, सुबह नौ बजे से। 
        रविवार, 22 फरवरी .. भारत बनाम दक्षिण अफ्रीका, मेलबर्न, सुबह नौ बजे से। 
        शनिवार, 28 फरवरी .. भारत बनाम संयुक्त अरब अमीरात, पर्थ, दोपहर 12 बजे से। 
        शुक्रवार, 06 मार्च .. भारत बनाम वेस्टइंडीज, पर्थ, दोपहर 12 बजे से। 
        मंगलवार, 10 मार्च .. भारत बनाम आयरलैंड, हैमिल्टन, सुबह छह बजकर 30 मिनट से। 
        शनिवार, 14 मार्च .. भारत बनाम जिम्बाब्वे, आकलैंड, सुबह छह बजकर 30 मिनट से। 





Monday, January 26, 2015

गजब की समानता है कि 26 जनवरी को बने दो टेस्ट शतकों में

                                                                 धर्मेन्द्र मोहन पंत
           भारत का गणतंत्र दिवस यानि 26 जनवरी। भारत 1950 में गणतंत्र बना लेकिन यहां पर केवल 26 जनवरी को ध्यान में रखकर एक रोचक और दिलचस्प आंकड़े का जिक्र किया जाएगा। 'सचिन के सौ शतक' किताब लिखने के बाद मेरा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों के प्रति कुछ ज्यादा ही प्यार जाग गया और मैंने इन पर अध्ययन करना शुरू किया। अब जब 26 जनवरी की ही बात करें। इस दिन भारत के केवल दो बल्लेबाजों ने टेस्ट मैचों में शतक लगाया लेकिन इन दोनों शतकों में गजब की समानता है।
           26 जनवरी को टेस्ट मैचों में शतक पूरे करने वाले इन दोनों खिलाड़ियों के नाम अंग्रेजी के अक्षर 'वी' से शुरू होते हैं। इन दोनों ने एक देश आस्ट्रेलिया के खिलाफ यह शतक लगाया। मैदान भी एक ही था एडिलेड ओवल। दोनों ने टेस्ट मैच के तीसरे दिन शतक पूरा किया। यह इन दोनों का टेस्ट मैचों में पहला शतक था। और इससे भी बढ़कर दोनों ने एक समान 116 रन बनाये। दोनों ने भारत की पहली पारी में यह स्कोर बनाया। एडिलेड ओवल में दोनों बार श्रृंखला का चौथा टेस्ट मैच खेला गया था। भारत 64 साल के अंतराल में खेले गये इन दोनों मैचों में बड़े अंतर से हार गया था।
विजय हजारे और विराट कोहली : 26 जनवरी को टेस्ट शतक लगाने वाले भारतीय
          ये क्रिकेटर हैं अपने जमाने के बेहतरीन बल्लेबाज विजय हजारे और वर्तमान समय में भारतीय क्रिकेट की धड़कन विराट कोहली। संयोग से हजारे 26 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतक पूरा करने वाले दुनिया के पहले बल्लेबाज थे। उन्होंने भारत के गणतंत्र बनने से दो साल पहले यानि 1948 को अपने टेस्ट करियर का पहला शतक पूरा किया था। आस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी करते हुए अपनी पारी सात विकेट पर 674 रन बनाकर समाप्त घोषित की थी। महान डान ब्रैडमैन ने 201 रन की पारी खेली थी। भारत की पहली पारी 24 जनवरी को शुरू हो गयी थी, लेकिन 25 जनवरी विश्राम का दिन था और इस तरह से हजारे मैच के तीसरे दिन यानि 26 जनवरी को क्रीज पर उतरे और दिन के आखिर में 108 रन बनाकर नाबाद रहे। वह आखिर में 116 रन बनाकर पगबाधा आउट हुए। यह हजारे का टेस्ट मैचों में पहला शतक था। इससे पहले उनका उच्चतम स्कोर 44 रन था। दत्तू फडकर ने भी 123 रन बनाये लेकिन उन्होंने अपना शतक 27 जनवरी को पूरा किया था। भारतीय टीम इसके बावजूद 381 रन ही बना सकी और उसे फालोआन करना पड़ा। हजारे ने दूसरी पारी में भी 145 रन बनाये थे लेकिन वह भारत को पारी और 16 रन से हारने से नहीं बचा पाये थे।
        अब चर्चा करते हैं विराट कोहली के शतक। कोहली ने 26 जनवरी 2012 को अपने टेस्ट करियर का पहला शतक लगाया था। आस्ट्रेलिया ने 1948 वाले मैच की तरह टास जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए अपनी पहली पारी सात विकेट पर 604 रन बनाकर समाप्त घोषित की। रिकी पोंटिंग और माइकल क्लार्क दोनों ने दोहरे शतक लगाये। अब टेस्ट मैचों में विश्राम का दिन नहीं होता लेकिन मैच 24 जनवरी से शुरू हुआ था इसलिए कोहली को मैच के तीसरे दिन यानि 26 जनवरी को क्रीज पर उतरने का मौका मिला। कोहली आखिर में 116 रन बनाकर पगबाधा आउट हुए। इससे पहले कोहली का टेस्ट मैचों में उच्चतम स्कोर 75 रन था। भारत का कोई भी अन्य बल्लेबाज नहीं चला और पूरी टीम 272 रन पर लुढक गयी। आस्ट्रेलिया ने इस बार फालोआन नहीं दिया लेकिन आखिर में वह 298 रन के बड़े अंतर से जीत दर्ज करने में सफल रहा। ये था भारतीय बल्लेबाजों के 26 जनवरी को लगाये गये टेस्ट शतकों का किस्सा।
         जारे के शतक से लेकर कोहली के शतक तक 26 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट (टेस्ट, वनडे और टी20) में कुल 21 शतक पूरे किये गये। इनमें महिला क्रिकेट में लगे दो शतक भी शामिल हैं। आस्ट्रेलिया के मैथ्यू हेडन अकेले ऐसे बल्लेबाज हैं जिन्होंने 26 जनवरी को दो बार शतक पूरे किये। हेडन ने 1997 में वेस्टइंडीज और 2008 में भारत के खिलाफ इस दिन टेस्ट शतक पूरे किये थे। संयोग से हेडन ने वेस्टइंडीज के खिलाफ शतक एडिलेड ओवल में ही लगाया था और उनका यह टेस्ट मैचों में पहला शतक भी था। एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों की बात करें तो जिम्बाब्वे के ग्रीम फ्लावर और आस्ट्रेलिया के एडम गिलक्रिस्ट ने अपने करियर का पहला वनडे शतक 26 जनवरी को ही लगाया था। आस्ट्रेलिया के मार्क वॉ ने 26 जनवरी 2000 को भारत के खिलाफ एडिलेड ओवल में 116 रन बनाये थे। महिला क्रिकेट में आस्ट्रेलिया की दिग्गज बल्लेबाज बेलिंडा क्लार्क ने 26 जनवरी को ही अपना पहला टेस्ट शतक लगाया था। भारत के खिलाफ नार्थ सिडनी ओवल में 1991 को खेला गया यह मैच क्लार्क का पदार्पण टेस्ट भी था। दक्षिण अफ्रीका की महिला क्रिकेटर जोमारी लोगटनबर्ग ने भी वनडे में अपना पहला शतक 26 जनवरी को लगाया था।