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Saturday, March 21, 2015

वनडे में अब दोहरे नहीं तिहरे शतक का इंतजार

                                                                                 धर्मेन्द्र पंत 
   कदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पहला दोहरा शतक लगने में 39 साल से भी अधिक समय तक इंतजार करना पड़ा और अब आलम यह है कि एक महीने के अंदर दो दोहरे शतक लग गये। पिछले चार दशकों में 'पाजामा क्रिकेट' का रंग रूप, स्वरूप सब बदल गया है। इसमें विकेट गिरते हैं लेकिन रन ज्यादा बरसते हैं। आईसीसी खुश है और अब एसीबी (अब क्रिकेट आस्ट्रेलिया) भी इसे पाजामा क्रिकेट नहीं कहता है। बहरहाल यह अलग विषय है। हम तो वनडे में बड़ी व्यक्तिगत पारियों और शतकों की बात कर रहे थे। 
     पांच जनवरी 1971 को इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया के बीच पहला एकदिवसीय मैच खेला गया था। इस मैच में इंग्लैंड के बायें हाथ के बल्लेबाज जान एल्ड्रिच ने 82 रन बनाये और इस तरह से वनडे में पहला बड़ा स्कोर का रिकार्ड उनके नाम पर दर्ज हो गया। यह रिकार्ड पूरे डेढ़ साल बना रहा क्योंकि इसके बाद अगला वनडे 24 अगस्त 1972 को खेला गया था जिसमें इंग्लैंड के ही डेनिस एमिस ने इस प्रारूप का पहला शतक जड़ा था। उन्होंने 103 रन बनाये। एक साल बाद रिकार्ड बायें हाथ के एक अन्य बल्लेबाज राय फ्रेडरिक्स के नाम पर दर्ज हो गया। उन्होंने वेस्टइंडीज की तरफ से इंग्लैंड के खिलाफ ओवल में 105 रन बनाये। इंग्लैंड के डेविड लायड ने इसे अगले साल यानि अगस्त 1974 में नाबाद 116 रन बनाये जबकि 1975 में खेले गये पहले विश्व कप में न्यूजीलैंड के ग्लेन टर्नर ने नाबाद 171 रन तक पहुंचा दिया। 
        पहली बार किसी बल्लेबाज ने वनडे में 150 रन के स्कोर को पार किया था। तब यह माना जा रहा था कि इस रिकार्ड तक पहुंचना मुश्किल होगा, क्योंकि मैच भी कम खेले जाते थे और शतक भी कम लगते थे। एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के जन्म के बाद से लेकर पहले दशक यानि सत्तर के दशक में नौ साल में केवल 24 शतक लगे। इनमें से सर्वाधिक दस शतक इंग्लैंड के बल्लेबाजों ने लगाये। भारत का तो कोई बल्लेबाज तिहरे अंक में भी नहीं पहुंच पाया था लेकिन अगला विश्व रिकार्ड एक भारतीय ने ही बनाया था। वह 18 जून 1983 का दिन था जबकि कपिल देव ने टन ब्रिज वेल्स में जिम्बाब्वे के खिलाफ विश्व कप मैच में नाबाद 175 रन की ऐतिहासिक पारी खेली थी। 
    अब मैच ज्यादा खेले जाने लगे थे और शतक भी बनने लगे थे। अस्सी के दशक में वनडे में कुल 134 सैकड़े बनाये गये। वेस्टइंडीज ने सर्वाधिक 39 जबकि आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान ने 25.25 शतक लगाये थे। भारत की तरफ से भी 17 शतक लगे। सत्तर के दशक में जहां 150 से अधिक का केवल एक स्कोर बना वहीं अस्सी के दशक में ऐसे स्कोर की संख्या पांच पहुंच गयी। वेस्टइंडीज के विव रिचडर्स ने  एक साल में ही कपिल का रिकार्ड अपने नाम कर दिया था। उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ मैनचेस्टर में नाबाद 189 रन बनाये लेकिन दोहरे शतक तक नहीं पहुंच पाये। रिचर्ड्स ने इसके अलावा 181 रन की एक अन्य पारी खेली थी। उनके देश के डेसमंड हेन्स और इंग्लैंड के डेविड गावर भी 150 रन की संख्या को छूने में सफल रहे थे। 

बनने लगे बड़े स्कोर, टूटने लगे रिकार्ड 

       रिचर्ड्स ​के नाम पर 13 साल तक रिकार्ड बना रहा और आखिर में नब्बे के दशक में पाकिस्तान के सईद अनवर ने इसे तोड़ दिया। अनवर 21 मई 1997 को भारत के खिलाफ चेन्नई में जब दोहरे शतक से एक शाट दूर थे तब सचिन तेंदुलकर ने उन्हें आउट कर दिया। शायद भगवान ने भी पहला दोहरा शतक बनाने का रिकार्ड क्रिकेट के भगवान के नाम पर लिखा था। बहरहाल नब्बे के दशक में वनडे में कुल 315 शतक लगे जिनमें 15 स्कोर 150 रन या इससे अधिक के बने थे। दक्षिण अफ्रीका के गैरी कर्स्टन भी विश्व कप 1996 के एक मैच में नाबाद 188 रन तक पहुंचे थे। इस दशक में तेंदुलकर ने सर्वाधिक 24 जबकि अनवर ने 17 शतक लगाये थे। 
    अनवर का 194 रन के रिकार्ड तक पहुंचना बल्लेबाजों के लिये चुनौती बना रहा। नयी सदी के पहले दशक में यह रिकार्ड नहीं टूटा। इस दौरान 465 वनडे मैचों में 565 शतक लगे। 150 रन या इससे अधिक के 35 स्कोर बने। भारत ने 88, आस्ट्रेलिया ने 82, श्रीलंका ने 64, पाकिस्तान ने 62 और दक्षिण अफ्रीका की तरफ से 60 शतक लगे। रिकी पोंटिंग 23, सनथ जयसूर्या और तेंदुलकर 21.21 तथा क्रिस गेल और हर्शल गिब्स 19.19 शतक लगाने में सफल रहे लेकिन अनवर के रिकार्ड तक जिम्बाब्वे के चार्ल्स कावेंट्री ही पहुंच पाये। कावेंट्री ने असल में बांग्लादेश के खिलाफ बुलावायो में 16 अगस्त 2009 में नाबाद 194 रन बनाकर इसकी बराबरी की थी। अनवर ने राहत की सांस ली लेकिन नयी सदी के दूसरे दशक के शुरू में ही यानि 24 फरवरी 2010 को तेंदुलकर दोहरे शतक तक पहुंचने वाले बल्लेबाज बन गये। 
         तेंदुलकर ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ ग्वालियर में नाबाद 200 रन बनाये थे लेकिन यह तय था कि उनका यह रिकार्ड ज्यादा समय तक नहीं टिक पाएगा क्योंकि ​एकदिवसीय मैचों के नियम बल्लेबाजों के अनुकूल बना दिये गये। बाउंड्रीज अपेक्षाकृत छोटी बन गयी और बल्ले में भी इतना दमखम भर दिया गया कि छक्के जड़ना पहले की तरह मुश्किल नहीं रहा। तिस पर क्रिकेट का सबसे छोटा बेटा टी20 भी पैदा हो गया। वह अपने बड़ों को सिखाने लगा कि तेजी से रन कैसे बनाये जाते हैं। टेस्ट मैचों में परिणाम ज्यादा आने लगे तो वनडे को इससे सबसे ज्यादा फायदा हुआ। यहां रन बरसने लगे। अब आप ही देख लीजिए की पिछले लगभग पांच वर्षों में 289 मैचों में 385 शतक बन चुके हैं। इनमें 200 या इससे अधिक छह स्कोर शामिल हैं। मतलब पांच साल में छह दोहरे शतक। जिस 150 रन को कभी बल्लेबाज लक्ष्य लेकर चलते थे उस पांच वर्ष में 22 बल्लेबाजों ने 31 बार हासिल कर लिया है। भारत ने पिछले पांच साल में 60, दक्षिण अफ्रीका ने 58, श्रीलंका की तरफ से 55 शतक लग चुके हैं। विराट कोहली 21, हाशिम अमला 19, तिलकरत्ने दिलशान 17, एबी डिविलियर्स 16 और कुमार संगकारा ने 15 शतक लगाये हैं।
     इसलिए अब कहा जा रहा है कि वनडे में तिहरा शतक लगाना भी संभव है यह रोहित शर्मा भी जानते है कि उनका 264 रन का रिकार्ड किसी भी दिन टूट सकता है। रोहित से पहले वीरेंद्र सहवाग ने आठ दिसंबर 2011 को इंदौर में 219 रन बनाकर तेंदुलकर का रिकार्ड तोड़ा था। रोहित ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ दो नवंबर 2013 को बेंगलूर में 209 रन बनाये लेकिन आखिर में वह इसके एक साल बाद 13 नवंबर 2014 को कोलकाता में सहवाग का रिकार्ड तोड़ने में सफल रहे। मार्टिन गुप्टिल ने नाबाद 237 रन बना दिये हैं। यह तय है कि कल कोई उनसे आगे निकलकर रोहित को पीछे छोड़ने की कोशिश करेगा और फिर 300 के लक्ष्य तक पहुंचना चाहेगा। जिस तरह से रन बरस रहे हैं उससे लगता है कि वनडे में तिहरा शतक भी इसी दशक में बन सकता है। 

Tuesday, February 24, 2015

पांच साल, 651 मैचों में बने पांच दोहरे शतक

                                                                    धर्मेन्द्र पंत 


पांच साल, पांच दोहरे शतक और चेहरों से झलकती खुशी
      कदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पहले दोहरे शतक के लिये 39 साल और 50 दिन तथा 2962 मैचों का इंतजार करना पड़ा लेकिन इसके बाद पिछले पांच वर्ष और 651 मैचों के अंदर क्रिकेट के इस प्रारूप में पांच दोहरे शतक लग चुके हैं। यह भी संयोग है कि पहले चार दोहरे शतक भारतीय बल्लेबाजों ने लगाये। रोहित शर्मा दो बार ऐसा कारनामा कर चुके हैं जबकि अब क्रिस गेल पहले गैर भारतीय बल्लेबाज हैं जो इस सूची में शामिल हुए हैं। गेल ने विश्व कप में दोहरा शतक जड़ा और वह इस टूर्नामेंट में यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले बल्लेबाज हैं। 
       पहला एकदिवसीय मैच पांच जनवरी 1971 को खेला गया था और वनडे में पहला शतक 24 अगस्त 1972 को डेनिस एमिस ने लगाया था। इसके बाद तेंदुलकर के दोहरे शतक बनाने तक वनडे में 1051 शतक लगे लेकिन इनमें कोई भी दोहरा शतक नहीं था। दो बल्लेबाज ऐसे थे जो एक छक्का जड़ने पर 200 रन पर पहुंच जाते लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। पाकिस्तान के सईद अनवर 1997 में भारत के खिलाफ 194 रन बनाकर आउट हो गये जबकि 2009 में जिम्बाब्वे चार्ल्स कावेंट्री बांग्लादेश के खिलाफ इसी स्कोर पर नाबाद रहे थे। इस बीच वनडे क्रिकेट में कई धुरंधर बल्लेबाज देखे गये। मसलन वि​व रिचर्ड्स, सनथ जयसूर्या, मैथ्यू हेडन, कपिल देव, वीरेंद्र सहवाग, एडम गिलक्रिस्ट आदि। ये सभी 170 रन की संख्या के पार भी पहुंचे लेकिन दोहरे शतक से महरूम रहे। यहां तक कि तेंदुलकर ने जब पहला दोहरा शतक लगाया तो यही कहा गया कि उन्होंने इस मुकाम पर पहुंचने में देर लगायी। आखिर तब तक भारत की तरफ 172, आस्ट्रेलिया की तरफ से 152, पाकिस्तान की तरफ से 142, वेस्टइंडीज की तरफ से 130, श्रीलंका की तरफ से 106, इंग्लैंड की तरफ से 91, दक्षिण अफ्रीका की तरफ से 88 और न्यूजीलैंड की तरफ से 71 शतक वनडे क्रिकेट में लग चुके थे। तेंदुलकर ने यह मुकाम अपने 37वें जन्मदिन से दो महीने  पहले किया। 
    यह भी संयोग है कि तेंदुलकर ने 24 फरवरी 2010 को वनडे का पहला दोहरा शतक लगाया था और अब गेल ने इसके ठीक पांच साल बाद 24 फरवरी 2015 का विश्व कप का पहला और वनडे का पांचवां दोहरा शतक जड़ दिया। इन पांच वर्षों में वनडे में कुल 345 शतक लगे जिनमें पांच दोहरे शतक शामिल है। जाहिर है इस बीच मैचों की संख्या बढ़ी और उसी अनुपात में शतकों की संख्या में भी इजाफा हुआ। दक्षिण अफ्रीका ने इन पांच वर्षों में सर्वाधिक 55, भारत ने 54, श्रीलंका ने 44, आस्ट्रेलिया ने 33, इंग्लैंड ने 31, न्यूजीलैंड ने 29, वेस्टइंडीज ने 27 और पाकिस्तान ने 24 शतक लगाये। बांग्लादेश ने 11 और आयरलैंड ने 10 शतक लगाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी लेकिन भारत के तीन बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर (200 नाबाद), वीरेंद्र सहवाग (219) और रोहित शर्मा (209 और 264) चार दोहरे शतक जमाने में सफल रहे। 
        सल में जिस दोहरे शतक को कभी वनडे में मुश्किल मुकाम माना जा रहा था, टी20 क्रिकेट के आगमन के बाद वह कुछ आसान बन गया। इस बीच बल्लेबाजों के पक्ष में बने क्षेत्ररक्षण और बाउंसर के नियमों ने भी मदद पहुंचायी। बल्ले के निचले भाग की मोटाई विशेषकर 'स्वीट स्पॉट' में भी ताकत भर दी गयी। इससे बड़े शाट खेलने में मदद मिली। गेल सरीखों से तो बहुत पहले से उम्मीद की जा रही थी लेकिन उनके बारे में भी यही कहा जाएगा कि वह देर से इस मुकाम तक पहुंचे। वैसे सिर्फ मददगार परिस्थितियों के दम पर ही दोहरे शतक तक नहीं पहुंचा जा सकता। इसके लिये संयम की भी जरूरत पड़ती है। जैसे कि आज गेल ने दिखाया। उन्होंने अपने पहले 50 रन 51 गेंदों और फिर शतक 105 गेंदों में पूरा किया। मतलब उन्होंने अगले 50 रन के लिये 54 गेंद खेली। वह 100 से 150 रन तक 21 गेंदों में और फिर 150 से 200 रन तक केवल 12 गेंद में पहुंचे। दोहरा शतक इसी तरह से पूरा किया जा सकता है। 
    तेंदुलकर ने भी जब पहला दोहरा शतक लगाया था तो उन्होंने पहले 100 रन 90 गेंद पर बनाये लेकिन अगले 100 रन के लिये उन्होंने केवल 57 गेंदें खेली थी। सहवाग ने अपनी लय एक जैसी बनाये रखी थी। उन्होंने शतक 69 गेंदों में पूरा किया जबकि अगले 100 रन बनाने के लिये भी 71 गेंदों का सामना किया था। रोहित ने जब 2013 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ अपना पहला दोहरा शतक लगाया था तो उन्होंने बेहद धीमी शुरूआत की थी और पहले 100 रन के लिये 114 गेंद खेल ली थी लेकिन इसके बाद उन्होंने मौके की नजाकत को भांपते हुए तेजी दिखायी और अगली 42 गेंदों पर 200 रन पर पहुंच गये। उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ 264 रन की रिकार्ड पारी के दौरान भी यही रणनी​ति अपनायी। रोहित ने तब शतक 100 गेंद पर पूरा किया लेकिन उनका दोहरा शतक 151 गेंदों पर बना। मतलब अगले शतक के लिये उन्होंने केवल 51 गेंदे खेली थी। 
         और हां अंत में ..... 24 फरवरी को वनडे में दो दोहरे शतक लग चुके हैं। क्या आप जानते हैं कि इस दिन पहला वनडे शतक किस बल्लेबाज ने बनाया था? आस्ट्रेलिया के रिकी ​पोंटिंग ने 2008 में भारत के खिलाफ सिडनी में। बाद में गौतम गंभीर ने भी इस मैच में सैकड़ा जड़ा था। संयोग देखिये कि इससे ठीक 100 साल पहले 24 फरवरी को टेस्ट मैचों में पहला शतक पूरा किया गया था। यह शतक 1908 में इंग्लैंड के जार्ज गुन ने बनाया था। 
     तो कैसी लगी आपको यह जानकारी। टिप्पणी जरूर करें। 

Sunday, February 1, 2015

विश्व कप में शीर्ष क्रम के तीन नायक


साहसी लेकिन फार्म से जूझ रहे शिखर धवन

   
भारतीय क्रिकेट टीम में जब दिल्ली के दो धुरंधर सलामी बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग और गौतम गंभीर का डंका बजता था तब दिल्ली का ही एक और ओपनर शिखर धवन घरेलू क्रिकेट और आईपीएल में अपना जलवा दिखा रहा था। लेकिन राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं होने के कारण एक समय लग रहा था कि उनका करियर भी घरेलू क्रिकेट में सिमट जाएगा। आखिर में नौ साल घरेलू क्रिकेट खेलने और प्रथम श्रेणी मैचों में 5000 से अधिक रन बनाने के बाद धवन को मार्च 2013 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ मोहाली में पहला टेस्ट मैच खेलने का मौका मिलता है और उन्होंने 187 रन ठोककर शानदार आगाज किया। इस बीच धवन ने 85 गेंदों पर शतक लगाकर पदार्पण टेस्ट में सबसे तेज सैकड़े का नया रिकार्ड बनाया।
        सहवाग और गंभीर फार्म से जूझ रहे थे और धवन ने इसका पूरा फायदा उठाया। उन्हें इंग्लैंड में चैंपियन्स ट्राफी में खेलने का मौका मिला जहां उन्होंने रोहित शर्मा के साथ कामयाब सलामी जोड़ी बना डाली। धवन ने दक्षिण अफ्रीका और वेस्टइंडीज के खिलाफ शतक भी जमाये। चैंपियन्स ट्राफी में उन्होंने 90.75 की औसत से 363 रन बनाये। वह भारतीय क्रिकेट टीम के अहम अंग बन गये। न्यूजीलैंड की सरजमीं पर टेस्ट मैचों में उन्होंने 115 और 98 रन की दो पारियां खेलकर दिखा दिया कि वह किसी भी तरह की परिस्थितियों में रन बना सकते हैं।
         लेकिन विश्व कप से पहले भारतीय टीम की सबसे बड़ी चिंता धवन बन गया है क्योंकि आस्ट्रेलियाई दौरे में उनका बल्ला कुंद पड़ा रहा। टेस्ट श्रृंखला में वह 81 रन की एक अच्छी पारी खेल पाये जबकि त्रिकोणीय श्रृंखला के चार मैचों में उनका स्कोर 2, 1, 8 और 38 रन रहा। उनकी इस फार्म को देखकर महान सुनील गावस्कर ने उनके बजाय रविचंद्रन अश्विन से पारी का आगाज कराने का सुझाव तक दे डाला। बहरहाल में वह अब भी धौनी की 'गुडबुक' में हैं और देखना होगा कि विश्व कप में मौका मिलने पर वह अपनी मूंछों पर फिर से ताव दे पाते हैं या नहीं। रिकार्ड के लिये बता दें कि धवन ने अब तक 53 वनडे मैचों में 42.75 की औसत से 2095 रन बनाये हैं जिसमें छह शतक और 11 अर्धशतक शामिल हैं। धवन का यह पहला विश्व कप होगा।

भारत का नया सलामी बल्लेबाज रोहित शर्मा 

   
कौशल से परिपूर्ण कलात्मक बल्लेबाज जिसकी तकनीक पर किसी को संदेह नहीं लेकिन यदि रोहित शर्मा के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के पहले छह साल पर गौर करें तो पता चल जाता है कि वह अवसरों का अच्छी तरह से फायदा उठाने में नाकाम रहे। यही वजह थी कि जिस रोहित को अगली पीढ़ी का बल्लेबाज माना जा रहा था वह टीम से अंदर बाहर होता रहा। इस बीच हालांकि घरेलू क्रिकेट में उन्होंने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया। चाहे 2008.09 के रणजी फाइनल की दोनों पारियों में शतक हों या फिर आईपीएल में डेक्कन चार्जर्स और बाद में मुंबई इंडियन्स की तरफ से कई शानदार पारियां। रोहित राष्ट्रीय टीम में वापसी का मार्ग प्रशस्त करते लेकिन फिर कुछ अवसरों पर सफल होते और कुछ पर नाकाम। निरंतर एक जैसा प्रदर्शन नहीं कर पाने के कारण उनका करियर उतार चढ़ाव वाला बन गया।
   इंग्लैंड में चैंपियन्स ट्राफी के दौरान सलामी बल्लेबाज के नये अवतार में उतरना रोहित के लिये वरदान साबित हुआ। उन्होंने पांच मैचों में केवल 177 रन बनाये लेकिन इस बीच शिखर धवन के साथ मिलकर टीम को अच्छी शुरूआत दिलायी। रोहित ने अक्तूबर . नवंबर 2013 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ जयपुर में नाबाद 141 रन बनाये और फिर बेंगलूर में 209 रन बनाकर वनडे में ​दोहरा शतक जड़ने वाले तीसरे बल्लेबाज बने। उनसे पहले सचिन तेंदुलकर और वीरेंद्र सहवाग ही यह कारनामा कर पाये थे। रोहित यहीं पर नहीं रूके। पिछले साल श्रीलंका के खिलाफ ईडन गार्डन्स पर वह 264 रन ठोककर वनडे में व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ पारी को उस मुकाम पर लेग गये जहां तक पहुंचना किसी भी बल्लेबाज के लिये आसान नहीं होगा।
     लेकिन रोहित की चोट भारतीय टीम के लिये बड़ा सरदर्द बनी हुई है। उन्होंने आस्ट्रेलिया में त्रिकोणीय श्रृंखला के पहले मैच में मेलबर्न में 138 रन की शानदार पारी खेली लेकिन इसके बाद चोट के कारण आगे के मैचों में नहीं खेल पाये। भारत को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा और वह इस सीरीज में एक भी मैच नहीं जीत पाया। अच्छी शुरूआत नहीं मिलने के कारण भारत की मजबूत बल्लेबाजी की पोल खुल गयी। इसलिए रोहित​ विश्व कप के भारतीय अभियान के लिये बेहद महत्वपूर्ण हैं। रोहित अब तक विश्व कप में नहीं खेले हैं लेकिन उन्हें कुल 127 वनडे मैच खेलने का अनुभव है जिसमें उनके नाम पर 3890 रन दर्ज हैं। रोहित ने छह शतक और 23 अर्धशतक भी लगाये हैं।

बल्लेबाजी में हर क्रम पर फिट अजिंक्य रहाणे 


लंबे समय तक साथी खिलाड़ियों के लिये मैदान पर पानी पहुंचाने का काम करने के बाद अजिंक्य रहाणे को मार्च 2013 में जब टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण का मौका मिला तो वह आस्ट्रेलियाई आक्रमण के सामने सात और एक रन ही बना पाये। चर्चा होने लगी कि क्या बेमिसाल और  नैसर्गिक प्रतिभा का धनी बल्लेबाज का करियर शुरू में खत्म हो जाएगा लेकिन रहाणे ने अपने काम पर ध्यान दिया। उन्होंने मुंबई की तरफ से रणजी ट्राफी और राजस्थान रायल्स की तरफ से आईपीएल में अपना अच्छा प्रदर्शन जारी रखा और जल्द ही न सिर्फ टेस्ट टीम में वापसी की बल्कि एकदिवसीय टीम के भी अहम अंग बन गये। वेलिंगटन में मुश्किल परिस्थितियों में लगाया गया शतक या फिर लाडर्स पर खेली गयी शतकीय पारी से रहाणे ने दिखाया कि उनके पास कई किताबी शाट हैं जो संकटपूर्ण स्थितियों में उन्हें सफल बनाते हैं। आस्ट्रेलिया के खिलाफ हाल में समाप्त हुई श्रृंखला में भी कोहली के अलावा किसी अन्य बल्लेबाजों ने गेंदबाजों का डटकर सामना किया तो वह रहाणे थे। मेलबर्न में उन्होंने 147 रन की दर्शनीय पारी खेली थी।
      रहाणे कई आयु वर्ग के टूर्नामेंटों में खेलते रहे हैं और यह कहा जा सकता है कि कोहली की तरह वह भी अब मंझे हुए बल्लेबाज बन गये हैं। विश्व कप में भारतीय बल्लेबाजी का काफी दारोमदार रहाणे के कंधों पर भी रहेगा। वह ऊपरी क्रम के बल्लेबाज हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्होंने मध्यक्रम में भी अच्छी बल्लेबाजी की है। यदि रोहित शर्मा फिट नहीं होते या शिखर धवन की खराब फार्म बरकरार रहती है तो फिर यह तय है कि रहाणे ही पारी का आगाज करेंगे। उन पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी पारी संवारने की रहेगी। रहाणे की विशेषता यह है कि वह पारी संवारने के साथ साथ रन गति भी अच्छी बनाये रखते हैं। जरूरत पड़ने पर लप्पेबाजी भी कर सकते हैं और अपनी रक्षात्मक तकनीक की तो अच्छी मिसाल पेश कर चुके हैं। अभी यह कहा जा सकता है कि भारतीय टीम में सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज यदि कोई है तो वह रहाणे हैं।
      रहाणे भी पहली बार विश्व कप में भाग लेंगे। यदि वनडे मैचों की बात करें तो इस 26 वर्षीय बल्लेबाज ने अब तक जो 46 मैच खेले हैं उनमें उन्होंने 1376 रन बनाये हैं। रहाणे का औसत 30.57 है जो कि उनकी क्षमता वाले बल्लेबाज के अनुकूल नहीं है। मुंबई का यह बल्लेबाज विश्व कप में निश्चित तौर पर इसमें सुधार करके भारतीय बल्लेबाजी का आधार स्तंभ बनना चाहेगा। रहाणे ने अब तक वनडे में दो शतक और आठ अर्धशतक भी लगाये हैं। 
                                                                                                                  धर्मेन्द्र मोहन पंत 


Monday, January 12, 2015

डाउन अंडर में विश्व कप के भारतीय बल्लेबाज

                                                                                       धर्मेन्द्र 
     विश्व कप के लिये भारत ने जो टीम चुनी है उसकी बल्लेबाजी मजबूत मानी जा रही है। गेंदबाजी कमजोर पक्ष है लेकिन हम यहां पर केवल बल्लेबाजों तथा आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में उनके प्रदर्शन पर गौर करेंगे। यह आंकड़ों की बिसात है जो समय, परिस्थितियों और फार्म के हिसाब से बदल भी सकती है लेकिन भारतीय बल्लेबाजों के लिये 'डाउन अंडर' यानि आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सरजमीं हमेशा चुनौती रही है और आंकड़ों पर गौर करने से भी साबित हो जाता है कि विशेषकर एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट यानि वनडे में कप्तान महेंद्र सिंह धौनी और विराट कोहली को छोड़कर विश्व कप टीम के बाकी बल्लेबाज 'डाउन अंडर' में रन बनाने के लिये जूझते रहे हैं। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की पिचें तेज होती हैं और उनमें पर्याप्त उछाल रहती है। भारत के सुरेश रैना और रोहित शर्मा जैसे बल्लेबाजों को इस तरह की पिचें रास नहीं आती हैं। यदि भारत को विश्व कप का खिताब बरकरार रखना है तो इन बल्लेबाजों को खुद को साबित करना होगा और अपने पिछले रिकार्ड में सुधार करना होगा।
रिकार्ड में सुधार करना होगा धवन, रोहित और रैना को 
     
       चलिये अब आंकड़ों की जुबानी कहानी आगे बढ़ाते हैं। बल्लेबाजी क्रम से ही आगे बढ़ते हैं। भारत के लिये अभी शिखर धवन और रोहित शर्मा वनडे में पारी का आगाज कर रहे हैं। इन दोनों ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ हाल में समाप्त हुई टेस्ट श्रृंखला में निराशाजनक प्रदर्शन किया था और 'डाउन अंडर में उनका ओवरआल रिकार्ड भी प्रभावशाली नहीं है।  आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला की छह पारियों में केवल 167 रन बनाने वाले धवन ने विश्व कप के मेजबान देशों यानि आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में अब तक केवल कीवियों की धरती पर चार वनडे खेले हैं जिनमें वह बुरी तरह नाकाम रहे। इन चार मैचों में उन्होंने 20.25 की औसत से 81 रन बनाये जिसमें उनका उच्चतम स्कोर 32 रन रहा। उनके साथी सलामी बल्लेबाज रोहित को जरूर 22 वनडे खेलने का मौका मिला है जिनमें उन्होंने 29.52 की औसत से 502 रन बनाये हैं। वनडे में दो दोहरे शतक लगाने वाले रोहित को 'डाउन अंडर' में अब भी पहले शतक का इंतजार है। भारत को लीग चरण में आस्ट्रेलिया में चार और न्यूजीलैंड में दो मैच खेले हैं। इसका जिक्र इसलिए किया जा रहा है क्योंकि रोहित ने आस्ट्रेलिया में जो 15 वनडे खेले हैं उनमें वह केवल 26.16 की औसत से ही रन बना पाये हैं।
        ब बात करते हैं विराट कोहली की जिन्होंने आस्ट्रेलिया के खिलाफ चार टेस्ट मैचों में 692 रन बनाकर साबित कर दिया कि उन पर परिस्थितियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह दुनिया के किसी भी तरह की पिच पर रन बनाने में सक्षम हैं। कोहली हर तरह के प्रारूप में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी उतने ही सफल रहे हैं जितने की भारत में। भारत की टेस्ट टीम के नये कप्तान ने 'डाउन अंडर' में तीनों प्रारूपों में मिलकर 1923 रन बनाये हैं और उनका औसत 58.27 है। वनडे में उन्होंने दोनों देशों में अब तक जो 13 मैच खेले हैं उनमें 55.33 की औसत से 664 रन बनाये हैं। कोहली ने इन दोनों देशों की सरजमीं पर अब तक वनडे में एक एक शतक लगाया है।
     
कोहली और धौनी : आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में भी खूब चला है बल्ला
       कोहली यदि नंबर तीन पर उतरेंगे तो संभवत: नंबर चार की जिम्मेदारी अजिंक्य रहाणे संभालेंगे जो अच्छी फार्म में चल रहे हैं। वह अच्छे तकनीक वाले बल्लेबाज हैं और आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला में 399 रन बनाकर उन्होंने इसे साबित भी कर दिया है। रहाणे का  'डाउन अंडर' में वनडे रिकार्ड हालांकि बहुत खराब है और वह इसमें जरूर सुधार करने की कोशिश करेंगे। रहाणे ने अब तक आस्ट्रेलिया में कोई वनडे नहीं खेला है। उन्होंने पांच मैच न्यूजीलैंड की सरजमीं पर खेले जिसकी पांच पारियों में वह केवल 51 रन बना पाये। इनमें से चार पारियों में वह दोहरे अंक में भी नहीं पहुंच पाये थे जबकि एक बार उन्होंने 36 रन की पारी खेली थी।    
          बल्लेबाजी क्रम में नंबर पांच सुरेश रैना के लिये सुरक्षित है जिन्हें हाल में सिडनी में पहली बार 'डाउन अंडर' में पहला टेस्ट मैच खेलने का मौका मिला और वह दोनों पारियों में कुल चार गेंद का सामना कर पाये और खाता खोलने में भी नाकाम रहे। रैना ने इन दोनों मेजबान देशों में अब तक कुल 16 वनडे मैच खेले हैं जिनमें 32.58 की औसत से 391 रन बनाये हैं। वह इन 16 मैचों की 15 पारियों में केवल एक बार 50 रन के पार पहुंच पाये। आस्ट्रेलिया की सरजमीं पर तो वह आठ पारियों में केवल 182 रन ही बना पाये हैं और उनका उच्चतम स्कोर नाबाद 40 रन है। मतलब यदि रैना आस्ट्रेलिया में त्रिकोणीय श्रृंखला या विश्व कप में अर्धशतक जड़ते हैं तो यह उनका आस्ट्रेलियाई धरती पर पहला पचासा होगा। मध्यक्रम के किसी बल्लेबाज या रहाणे के शीर्ष क्रम में खेलने की स्थिति में अंबाती रायुडु को मौका मिल सकता है। रायुडु ने अब तक आस्ट्रेलिया में अब तक कोई मैच नहीं खेला है। न्यूजीलैंड में उन्हें दो वनडे खेलने का मौका मिला जिसमें उन्होंने 57 रन बनाये हैं।
       विकेटकीपर बल्लेबाज और टीम के कप्तान धौनी आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सरजमीं पर टेस्ट मैचों में भले ही अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाये लेकिन वनडे में उन्होंने वहां भी अपना जलवा जमकर बिखेरा है। रिकार्ड के लिये बतादें कि टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके धौनी ने लंबी अवधि के प्रारूप में इन दोनों देशों में 13 टेस्ट मैच की 24 पारियों में 27.76 की औसत से 583 रन बनाये। जिसमें उनका उच्चतम स्कोर 68 रन है। वनडे की कहानी इसके ठीक उलट है हालांकि इस प्रारूप में भी धौनी को अभी 'डाउन अंडर' में पहले शतक का इंतजार है। असल में धौनी अब तक इन दोनों देशों में किसी भी प्रारूप में शतक नहीं जड़ पाये हैं। वनडे की बात करें तो धौनी ने अब तक विश्व कप के मेजबान देशों की धरती पर 27 मैच खेले हैं जिनमें उन्होंने 67.20 के प्रभावशाली औसत से 1008 रन बनाये हैं। इनमें नौ अर्धशतक शामिल हैं। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दोनों में उनका वनडे औसत 60 से ऊपर है।
         भारतीय टीम में चुने गये दो आलराउंडरों की चर्चा किये बिना भारतीय बल्लेबाजों के आंकड़ों की यह
बिन्नी और जडेजा को सही साबित करना होगा चयन 
कहानी अधूरी रहेगी। रविंद्र जडेजा ने इन दोनों देशों में 13 वनडे की 12 पारियों में 27.33 की औसत से 246 रन बनाये हैं। न्यूजीलैंड की सरजमीं पर उन्होंने ठीकठाक प्रदर्शन (पांच मैचों में 145 रन) किया है लेकिन आस्ट्रेलिया की धरती पर उनका बल्ला अभी तक नहीं चल पाया है। जडेजा ने आस्ट्रेलिया में जो आठ वनडे मैच खेले हैं उनमें वह केवल 101 रन बना पाये हैं और उनका औसत 16.83 है। यहां उनका उच्चतम स्कोर नाबाद 24 रन है। भारत के दूसरे आलराउंडर स्टुअर्ट बिन्नी ने अब तक अंतरराष्ट्रीय मैचों में आस्ट्रेलियाई पिचों का स्वाद नहीं चखा है। न्यूजीलैंड में उन्होंने एक वनडे खेला है जिसमें उन्हें बल्लेबाजी का मौका नहीं मिला। पिछले साल हैमिल्टन में खेले गये इस मैच में धौनी ने उनके बजाय आर अश्विन को पहले बल्लेबाजी के लिये भेज दिया था। इसके बाद बिन्नी से केवल एक ओवर की गेंदबाजी करवायी गयी जिसमें उन्होंने आठ रन दिये थे। इसके उलट रायुडु को तीन ओवर दिये गये थे। आप इसका कुछ भी मतलब निकाल सकते हैं। मैं तो आंकड़ों से खेलता हूं और मेरा इस पारी में प्रदर्शन कैसा रहा इसका फैसला आप पर छोड़ता हूं। इच्छा करे तो प्रतिक्रिया जरूर दें।
     (सभी आंकड़े 12 जनवरी 2015 तक के हैं)