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Monday, January 25, 2016

विजय, विराट और 26 जनवरी से जुड़ा दिलचस्प आंकड़ा

    भारत का गणतंत्र दिवस यानि 26 जनवरी। भारत के दो बल्लेबाजों ने 26 जनवरी के दिन टेस्ट मैचों में शतक लगाये थे। दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों आंकड़ों में बहुत अधिक समानता है। आपको बता दूं कि 26 जनवरी को टेस्ट मैचों में शतक पूरे करने वाले इन दोनों क्रिकेटरों के नाम अंग्रेजी के अक्षर 'वी' से शुरू होते हैं। इन दोनों ने एक देश आस्ट्रेलिया के खिलाफ यह शतक लगाया। मैदान भी एक ही था एडिलेड ओवल। दोनों ने टेस्ट मैच के तीसरे दिन शतक पूरा किया। यह इन दोनों का टेस्ट मैचों में पहला शतक था। और इससे भी बढ़कर दोनों ने एक समान 116 रन बनाये। दोनों ने भारत की पहली पारी में यह स्कोर बनाया। एडिलेड ओवल में दोनों बार श्रृंखला का चौथा टेस्ट मैच खेला गया था। भारत 64 साल के अंतराल में खेले गये इन दोनों मैचों में बड़े अंतर से हार गया था।
  दिलचस्पी बढ़ गयी तो अब आपको उन दोनों क्रिकेटरों के बारे में भी बता देता हूं। ये क्रिकेटर हैं अपने जमाने के बेहतरीन बल्लेबाज विजय हजारे और वर्तमान समय में भारतीय क्रिकेट की धड़कन विराट कोहली। संयोग से हजारे 26 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतक पूरा करने वाले दुनिया के पहले बल्लेबाज थे। उन्होंने भारत के गणतंत्र बनने से दो साल पहले यानि 1948 को अपने टेस्ट करियर का पहला शतक पूरा किया था। आस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी करते हुए अपनी पारी सात विकेट पर 674 रन बनाकर समाप्त घोषित की थी। महान डान ब्रैडमैन ने 201 रन की पारी खेली थी। भारत की पहली पारी 24 जनवरी को शुरू हो गयी थी, लेकिन 25 जनवरी विश्राम का दिन था और इस तरह से हजारे मैच के तीसरे दिन यानि 26 जनवरी को क्रीज पर उतरे और दिन के आखिर में 108 रन बनाकर नाबाद रहे। वह आखिर में 116 रन बनाकर पगबाधा आउट हुए। यह हजारे का टेस्ट मैचों में पहला शतक था। इससे पहले उनका उच्चतम स्कोर 44 रन था। दत्तू फडकर ने भी 123 रन बनाये लेकिन उन्होंने अपना शतक 27 जनवरी को पूरा किया था। भारतीय टीम इसके बावजूद 381 रन ही बना सकी और उसे फालोआन करना पड़ा। हजारे ने दूसरी पारी में भी 145 रन बनाये थे लेकिन वह भारत को पारी और 16 रन से हारने से नहीं बचा पाये थे।
   अब चर्चा करते हैं विराट कोहली के शतक। कोहली ने 26 जनवरी 2012 को अपने टेस्ट करियर का पहला शतक लगाया था। आस्ट्रेलिया ने 1948 वाले मैच की तरह टास जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए अपनी पहली पारी सात विकेट पर 604 रन बनाकर समाप्त घोषित की। रिकी पोंटिंग और माइकल क्लार्क दोनों ने दोहरे शतक लगाये। अब टेस्ट मैचों में विश्राम का दिन नहीं होता लेकिन मैच 24 जनवरी से शुरू हुआ था इसलिए कोहली को मैच के तीसरे दिन यानि 26 जनवरी को क्रीज पर उतरने का मौका मिला। कोहली आखिर में 116 रन बनाकर पगबाधा आउट हुए। इससे पहले कोहली का टेस्ट मैचों में उच्चतम स्कोर 75 रन था। भारत का कोई भी अन्य बल्लेबाज नहीं चला और पूरी टीम 272 रन पर लुढक गयी। आस्ट्रेलिया ने इस बार फालोआन नहीं दिया लेकिन आखिर में वह 298 रन के बड़े अंतर से जीत दर्ज करने में सफल रहा। ये था भारतीय बल्लेबाजों के 26 जनवरी को लगाये गये टेस्ट शतकों का किस्सा।
    हजारे के शतक से लेकर कोहली के शतक तक 26 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट (टेस्ट, वनडे और टी20) में कुल 21 शतक पूरे किये गये। इनमें महिला क्रिकेट में लगे दो शतक भी शामिल हैं। आस्ट्रेलिया के मैथ्यू हेडन अकेले ऐसे बल्लेबाज हैं जिन्होंने 26 जनवरी को दो बार शतक पूरे किये। हेडन ने 1997 में वेस्टइंडीज और 2008 में भारत के खिलाफ इस दिन टेस्ट शतक पूरे किये थे। संयोग से हेडन ने वेस्टइंडीज के खिलाफ शतक एडिलेड ओवल में ही लगाया था और उनका यह टेस्ट मैचों में पहला शतक भी था। एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों की बात करें तो जिम्बाब्वे के ग्रीम फ्लावर और आस्ट्रेलिया के एडम गिलक्रिस्ट ने अपने करियर का पहला वनडे शतक 26 जनवरी को ही लगाया था। आस्ट्रेलिया के मार्क वॉ ने 26 जनवरी 2000 को भारत के खिलाफ एडिलेड ओवल में 116 रन बनाये थे। महिला क्रिकेट में आस्ट्रेलिया की दिग्गज बल्लेबाज बेलिंडा क्लार्क ने 26 जनवरी को ही अपना पहला टेस्ट शतक लगाया था। भारत के खिलाफ नार्थ सिडनी ओवल में 1991 को खेला गया यह मैच क्लार्क का पदार्पण टेस्ट भी था। दक्षिण अफ्रीका की महिला क्रिकेटर जोमारी लोगटनबर्ग ने भी वनडे में अपना पहला शतक 26 जनवरी को लगाया था।
       अगर आपको यह जानकारी दिलचस्प लगी तो एक टिप्पणी बनती है नीचे के कालम में। आपका धर्मेन्द्र पंत 

Sunday, August 16, 2015

विराट के नाम खुला खत

प्रिय विराट,
    मुझे आपसे सहानुभूति है। इसलिए नहीं कि गाले टेस्ट मैच में टीम जीत की स्थिति में होने के बावजूद हार गयी। इसके कुछ और कारण हैं। पहली वजह आपसे ही जुड़ी हुई है। आपको अभी टेस्ट टीम का कप्तान बने हुए कुछ महीने हुए हैं लेकिन आपने स्पष्ट संकेत दे दिये कि आप टीम पर से 'धौनी प्रभाव' समाप्त करने के लिये आमादा हो। परि​वर्तन प्रकृति का नियम है लेकिन वह शनै: शनै: होता है। कोई भी कप्तान अपने मनपसंद की टीम गठित करके अपने हिसाब से उसका संचालन करना चाहता है। इसमें मुझे आपत्ति नहीं लेकिन दूध को भी दही बनने में थोड़ा समय लगता है भाई। जिस टीम को महेंद्र सिंह धोनी ने पिछले छह वर्षों से एक ढांचे में ढाल रखा था उसे आप एकदम से दूसरे ढांचे में फिट करना चाहते हो। इसके नकारात्मक परिणाम आपके सामने हैं। आप यह क्यों भूल गये कि टेस्ट मैच जीतने के लिये यदि 20 विकेट लेने होते हैं तो 20 विकेट बचाने भी होते हैं। धीरे . धीरे और परिस्थितियों का आकलन करके प्रयोग करते तो बेहतर होता भाई।  एक कप्तान अपने पहले चार टेस्ट मैचों में चार शतक लगाता है और उनमें से किसी में भी टीम को जीत नहीं मिलती है तो उस कप्तान से सहानुभूति होना स्वाभाविक है। मुझे आपसे सहानुभूति है विराट।
    मुझे आपसे इसलिए भी सहानुभूति है क्योंकि आपके साथ रवि शास्त्री जुड़े हुए हैं। धौनी की ​'विराट छत्रछाया' में उनकी कुछ खास नहीं चली लेकिन अब लगता है कि विराट के साये में उन्हें अपनी बात रखने का मौका मिल गया है। अगर अंतिम एकादश के चयन में उनकी दखलदांजी है, जैसा कि उनकी तल्ख टिप्पणियों से लगा, तो फिर यही आभास होता है भाई कि उन्हें टीम की नहीं मुंबई की चिंता है। वह मुंबई का कर्ज उतारना चाहते है। आपको शायद याद नहीं हो लेकिन एक समय भारतीय क्रिकेट पर मुंबई लॉबी हावी थी। टीम में मुंबई के खिलाड़ियों की भरमार हुआ करती थी। सुनील गावस्कर टीम लेकर न्यूजीलैंड गये हुए थे। सौराष्ट्र के दिलीप दोषी उन्हें पसंद नहीं थे। वह अनफिट हो गये और गावस्कर को मौका मिल गया। उन्होंने मुंबई के अपने एक साथी को एसओएस भेजकर बुलवा दिया। यह साथी कोई और नहीं शास्त्री थे जिन्होंने तब तक केवल सात प्रथमश्रेणी मैच खेले थे। अब इतिहास दोहराया जा रहा है। मुंबई के एक खिलाड़ी (रोहित शर्मा) के लिये सौराष्ट्र के एक खिलाड़ी (चेतेश्वर पुजारा) की बलि दी जा रही है। अफसोस कि इसमें आप खुलकर शास्त्री का साथ दे रहे हैं। यह भूल रहे हैं कि पुजारा वास्तव में टेस्ट विशेषज्ञ हैं और लंबी अवधि के प्रारूप में रोहित से बेहतर बल्लेबाज हैं। यहां पर यदि मैं यह साबित करने के लिये आंकड़ों की बिसात बिछांऊ तो अच्छा नहीं लगेगा। शास्त्री को समझाओ भाई कि अब मुंबई का पहले जैसा दबदबा नहीं रहा और अंजिक्य रहाणे खेल तो रहा है। कभी संजय बांगड़ और भरत अरूण को भी अलग में ले जाकर उनकी राय पूछ लिया करो।
    सहानुभूति का एक कारण यह भी है कि धौनी के संन्यास लेने के बाद आपकी कप्तानी की राह तो आसान हो गयी लेकिन टीम ने एक मंझा हुआ विकेटकीपर बल्लेबाज खो दिया। आपके पास रिद्धिमान साहा है जो इसलिए टीम में है क्योंकि बीसीसीआई में बंगाल लॉबी ऐसा चाहती है। कुछ और भी विकेटकीपर हैं जो बेहतर विकल्प हो सकते हैं। गाले में विकेट के पीछे साहा के प्रदर्शन से तो आप भी संतुष्ट नहीं होंगे लेकिन आपने उन पर छठे नंबर के बल्लेबाज के रूप में कैसे विश्वास कर लिया। एडम गिलक्रिस्ट के नाम और उनके बल्लेबाजी कौशल से तो आप परिचित होंगे। उनकी मौजूदगी के बावजूद आस्ट्रेलिया छह बल्लेबाजों के साथ उतरता था। आस्ट्रेलिया की उस टीम से सीख लेकर अपना गेंदबाजी आक्रमण मजबूत करो। साहा जैसे विकेटकीपरों के रहते आपकी पांच बल्लेबाजों की थ्योरी कारगर साबित होगी, मुझे संदेह है। 
     और हां कप्तानी में अभी नये हो, चाटुकारों से बचना। कोई भी जो आपको माराडोना या पेले बता रहा है उससे दूर ही रहना है। सफलता हासिल करनी हो तो हिन्दी के मुहावरे 'निंदक नियरे राखिये' पर भी गौर कर लेना। ​
     श्रीलंका के खिलाफ बाकी दो टेस्ट मैचों में सकारात्मक परिणाम के लिये शुभकामनाएं।
                                                           एक क्रिकेट प्रेमी
    

Wednesday, March 4, 2015

अब तो सुधर जाओ विराट

      मेरे सामने विश्व क्रिकेट के सफल कप्तानों की सूची पड़ी है। इनमें वे कप्तान शामिल हैं जिन्हें या तो मैंने खेलते हुए देखा या फिर तब वे क्रिकेट खेल रहे थे जबसे मैंने इस खेल को समझना शुरू किया था। क्लाइव लायड, माइक ब्रेयरली, विव रिचर्ड्स, सुनील गावस्कर, एलन बोर्डर, इमरान खान, अर्जुन रणतुंगा, मार्क टेलर, स्टीव वॉ, हैन्सी क्रोन्ये, स्टीफन फ्लेमिंग, नासिर हुसैन, सौरव गांगुली, ग्रीम स्मिथ, रिकी पोंटिंग, महेंद्र सिंह धोनी ....। इन सभी ने अपनी कप्तानी की किसी न किसी तरह से सकारात्मक छाप छोड़ी। इनमें से कोई भी ऐसा नहीं था जिसका मैदान या उससे बाहर व्यवहार खराब रहा हो और जिसके कारण उसे लताड़ पड़ी हो या माफी मांगनी पड़ी हो। इनमें से अधिकतर आक्रामक कप्तान थे लेकिन उनकी यह आक्रामकता सकारात्मक थी, जो उनके आम जीवन के व्यवहार को भी प्रभावित नहीं करती थी।
     यह सारी भूमिका मुझे विराट कोहली के संदर्भ में बांधनी पड़ी जो अपने खराब व्यवहार के कारण चर्चा में हैं। इस बार वह एक पत्रकार को गाली देने को लेकर चर्चा में हैं। उन्होंने मां से लेकर बहन तक सभी गालियां अपने मुंह से निकाली। कोहली को भारत का भावी कप्तान माना जाता है लेकिन भले ही वह एक बल्लेबाज के रूप में परिपक्व हो गये हों लेकिन उनका व्यवहार दिखाता है कि आम जीवन में वह अब भी 'बिगड़ैल लड़का' हैं। भारत में यदि क्रिकेट धर्म है और क्रिकेटरों को ऊंचा दर्जा दे दिया जाता है तो उनसे अच्छे व्यवहार की उम्मीद भी की जाती है, लेकिन अफसोस है कि एक शांतचित कोच के संरक्षण में क्रिकेट का ककहरा सीखकर शिखर पर पहुंचने वाला कोहली इस मानदंड पर खरा नहीं उतर रहा है।
      कोहली को टेस्ट कप्तानी सौंप दी गयी ​है कि और हो सकता है कि जल्द ही उन्हें तीनों प्रारूपों में कप्तान बना दिया जाए लेकिन इस देश का कोई भी क्रिकेट प्रेमी नहीं चाहेगा कि उनका कप्तान नकारात्मक आक्रामकता अपनायें। फिलहाल कोहली में सकारात्मक के साथ नकारात्मक आक्रामकता भी भरी हुई है और यदि वह अपने अंदर इसे बनाये रखते हैं तो भविष्य में इससे उन्हें ही परेशानी हो सकती है। यदि एक कप्तान किसी पत्रकार के लिये सार्वजनिक रूप से मां बहन की गाली निकाल सकता है तो उससे ड्रेसिंग रूम में अच्छे व्यवहार की उम्मीद कैसे की जा सकती है। दुख इस बात का है कि सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण जैसे खिलाड़ियों के साथ खेलने के बावजूद भी कोहली उनसे महानता के गुण नहीं सीख पाये।  वह अपने कप्तान महेंद्र सिंह धौनी से भी कुछ नहीं सीख रहे हैं जिन्हें 'कैप्टेन कूल' कहा जाता है। मुझे नहीं लगता कि कोहली की इस हरकत से उनकी मां या कोच में से किसी को खुशी हुई होगी। वे भी दुखी होंगे। आखिर कोई मां बाप नहीं चाहता कि उनका बेटा अपनी जुबान से अपशब्द निकाले। देश के लिये न सही अपने प्रशंसकों, अपने परिजनों और कोच के लिये तो कोहली को सुधरना चाहिए। आखिर जब वह क्रिकेट में शुरू में रन बना रहे थे तब उनसे जुड़े लोग ही पत्रकारों से अखबार के एक कोने में कोहली को भी जगह देने का आग्रह करते थे।
     किसी भी क्रिकेटर को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसको आगे बढ़ाने में मीडिया की भूमिका भी अहम होती है। कोहली लगता है कि सफलता के मद में चूर होते जा रहे हैं। उन्हें खुद के लिये, अपने प्रशंसकों के लिये, देश के लिये और क्रिकेट के लिये सुधरना होगा। 

Monday, February 2, 2015

भारत की विश्व कप टीम में मध्यक्रम के महारथी

भारतीय टीम के नये 'मिस्टर भरोसेमंद' विराट कोहली
  
वह दिसंबर 2006 की सर्द रात थी जब तड़के तीन बजे दिल्ली के 18 वर्षीय बल्लेबाज विराट कोहली के पास घर से फोन आता है कि उसके पिता इस दुनिया में नहीं रहे। कर्नाटक के खिलाफ रणजी मैच में दिल्ली पर फालोआन का संकट मंडरा रहा था और कोहली पिछले दिन 40 रन बनाकर खेल रहे थे। वह अपनी पारी आगे बढ़ाये या नहीं इसके लिये कोहली आस्ट्रेलिया दौरे पर गये अपने कोच राजकुमार शर्मा को फोन करता है और उनकी सलाह पर बल्लेबाजी जारी रखने का फैसला करता है। कोहली 90 रन बनाकर दिल्ली को फालोआन से बचाता है और उसके बाद सीधे अपने पिता की अंत्येष्टि में शामिल होने के लिये चला जाता है। कोहली की मां के शब्दों में, ''विराट उस दिन के बाद कुछ बदल गया। रातों रात वह परिपक्व बन गया। वह प्रत्येक मैच को गंभीरता से लेना लगा। उसे बेंच पर बैठना कतई पसंद नहीं था।''
     कोहली यानि वह शख्स जो आक्रामक क्रिकेट खेलना पसंद करता है। मैदान पर अपनी भावनाओं को खुलकर इजहार करने के कारण आलोचकों के निशाने पर रहता है और जिस पर दंभी होने के आरोप भी लगते रहते हैं लेकिन इन सबसे बढ़कर वह एक बेहतरीन बल्लेबाज है जो हर तरह का शाट खेलने में माहिर है और किसी भी तरह के आक्रमण के सामने और कैसी भी परिस्थितियों में रन बनाना जानता है। दबाव में अच्छा प्रदर्शन करने में कोहली का सानी नहीं। लेग साइड पर उनके शाट देखने लायक होते हैं। इसलिए तो वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में दनादन शतक ठोक रहे हैं और रनों का अंबार लगा रहे हैं। कोहली अभी केवल 25 साल के हैं और उनके नाम पर वनडे में 150 मैचों में 6232 रन दर्ज हैं। कोहली ने ये रन 51.50 की औसत से बनाये हैं जिसमें 21 शतक और 33 अर्धशतक शामिल हैं। वह वनडे में सबसे तेज 6000 रन पूरे करने वाले बल्लेबाज हैं।
     यही कोहली आज भारतीय​ क्रिकेट का अहम अंग है। यहां तक महेंद्र सिंह धौनी के टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद वह टेस्ट टीम के कप्तान बन चुके हैं और आने वाले समय में उन्हें तीनों प्रारूपों की कप्तानी सौंपी जा सकती है। कोहली के नेतृत्व में भारत ने 2008 में अंडर . 19 विश्व कप जीता और 2011 में भारत को वनडे का विश्व चैंपियन​ बनाने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभायी। कोहली ने भारत के पहले मैच में ही शतक जड़ा और फिर फाइनल में भी 35 रन की महत्वपूर्ण पारी खेली थी। इसके बाद आस्ट्रेलियाई दौरे में जब भारत के कई दिग्गज बल्लेबाज रन बनाने के लिये जूझ रहे थे तब उन्होंने एडिलेड में 116 रन की जोरदार पारी खेलकर टेस्ट मैचों में अपना स्थान पक्का किया था। इसके बाद उन्होंने त्रिकोणीय श्रृंखला में भी शानदार खेल दिखाया। हाल में आस्ट्रेलिया के खिलाफ चार टेस्ट मैचों की श्रृंखला में कोहली ने चार शतकों की मदद से 692 रन बनाये। इसके बाद त्रिकोणीय श्रृंखला में उनका बल्लेबाजी क्रम बदलना भारत का महंगा पड़ा और वह अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाये लेकिन यह तय है कि विश्व कप में भारतीय बल्लेबाजी का दारोमदार उन पर ही टिका रहेगा। कोहली पिछली बार की विश्व कप विजेता टीम के सदस्य थे। कोहली ने विश्व कप 2011 में सभी नौ मैच खेले थे जिसमें उन्होंने 35.25 की औसत से 282 रन बनाये थे। इसमें एक शतक और एक अर्धशतक शामिल है।

सुरेश रैना : आस्ट्रेलिया में सुधारना होगा रिकार्ड 
      
पिछले लगभग दस साल से भारतीय एकदिवसीय टीम के अहम अंग रहे हैं सुरेश रैना। भारतीय टीम के पूर्व कोच ग्रेग चैपल उन्हें बेहद प्रतिभाशाली मानते थे लेकिन बायें हाथ का यह बल्लेबाज शुरूआती वर्षों में अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया। यह कह सकते हैं कि 2005 में पदार्पण के बाद अगले तीन चार वर्ष तक बड़ी पारी खेलने के लिये तरसते रहे।
       रैना के बारे में शुरू से कहा जाता रहा कि वह शार्ट पिच गेंदों को सही तरह से नहीं खेल पाते लेकिन इसके बावजूद अपने जज्बे, धाराप्रवाह बल्लेबाजी करने की कला और चपल क्षेत्ररक्षण के कारण उन्होंने भारतीय टीम में अपनी जगह बनाये रखी। सुविधाओं के लिये तरसते उत्तर प्रदेश के स्पोर्ट्स हास्टल से निकले बायें हाथ का यह बल्लेबाज हालांकि खाली स्थानों से गेंद निकालकर रन बनाने में माहिर है। पाकिस्तान में 2008 में खेले गये एशिया कप में रैना ने दो शतक जड़कर बड़ी पारियां खेलने की शुरूआत की थी। उन्हें 2010 में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण का मौका मिला और पहले मैच में ही शतक बनाने में सफल रहे लेकिन यहां भी वह अपनी फार्म को बनाये रखने में नाकाम रहे और पिछले साढ़े चार साल में उनके नाम पर केवल 18 टेस्ट मैच दर्ज हैं।
            रैना के साथ भी अभी फार्म की दिक्कत जुड़ गयी है। आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला में उन्हें केवल एक टेस्ट मैच खेलने का मौका मिला जिसकी दोनों पारियों में वह खाता नहीं खोल पाये। इसके बाद त्रिकोणीय श्रृंखला के शुरू में उन्होंने मेलबर्न में 51 रन की पारी खेली लेकिन अगली दो पारियों में वह एक . एक रन ही बना पाये। मध्यक्रम में कोहली के बाद रैना को सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज माना जा रहा है लेकिन यदि पिछले कुछ मैचों की तरह इनाम में अपने विकेट देते रहे तो भारत की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। रैना को संयम बरतकर खेलने की जरूरत है, क्योंकि यह सभी जानते हैं कि जब वह क्रीज पर टिक जाते हैं और उनका बल्ला चलने लगता है तो फिर गेंद लगातार सीमा रेखा के दर्शन करती है।
      उत्तर प्रदेश के यह बल्लेबाज विश्व कप 2011 की चैंपियन टीम ​का हिस्सा था। हालांकि तब उन्हें केवल चार मैच खेलने का मौका मिला था जिसमें उन्होंने 74 रन बनाये थे। रैना ने विश्व कप से पहले तक कुल 207 वनडे मैच खेले हैं जिसमें उन्होंने 35.44 की औसत से 5104 रन बनाये हैं। उनके नाम पर चार शतक और 33 अर्धशतक दर्ज हैं। इस 28 वर्षीय बल्लेबाज का हालांकि आस्ट्रेलिया में रिकार्ड आकर्षक नहीं है जहां उन्होंने 12 मैचों में 23.50 की औसत से 235 रन बनाये हैं।

अंबाती रायुडु : चयन सही साबित करने की चुनौती 
  
वीवीएस लक्ष्मण और हरभजन सिंह की नजर में अंबाती रायुडु विशेष प्रतिभा का धनी है लेकिन वह अभी तक अपनी प्रतिभा के साथ पूरी तरह न्याय नहीं कर पाये हैं। उन्होंने शुरू से बहुत जल्दी परिणाम हासिल करने के प्रयास में अपना करियर भी दांव पर लगा दिया था। अपने करियर के शुरू में कभी कोच तो कभी अंपायरों के साथ मतभेदों के कारण वह परेशानी में पड़े और ऐसे में जिस बल्लेबाज को प्रतिभाशाली माना जाता था उसका करियर दांव पर लग गया। इंडियन क्रिकेट लीग ने रही सही कसर पूरी कर दी। रायुडु इससे जुड़ गये और इससे उनका राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने का सपना भी टूटता हुआ दिखने लगा। आखिर में बीसीसीआई ने आईसीएल से जुड़े खिलाड़ियों को राहत दी और उन्हें वापसी का मौका दिया। रायुडु ने हैदराबाद के बजाय बड़ौदा से खेलना शुरू कर दिया।

    अपनी प्रवाहमय बल्लेबाजी और स्ट्रोक लगाने में कुशलता के कारण रायुडु को आखिर 2013 में जिम्बाब्वे दौरे में भारत की तरफ से खेलने का मौका मिल गया। उन्होंने अपने पहले मैच में ही अर्धशतक जड़कर शानदार आगाज किया लेकिन इसके बाद अंदर बाहर होते रहे। पिछले साल श्रीलंका के खिलाफ अहमदाबाद में नाबाद 121 रन बनाकर उन्होंने विश्व कप टीम में अपनी जगह सुनिश्चित की। आस्ट्रेलिया में त्रिकोणीय श्रृंखला में वह अवसरों का सही तरह से फायदा उठाने में नाकाम रहे। तीनों मैचों में क्रीज पर समय बिताने के बाद वह 23, 23 और 12 रन बनाकर पवेलियन लौटे। विश्व कप में मध्यक्रम में उन्हें नाजुक मौकों पर बल्लेबाजी करनी पड़ सकती है और 29 वर्षीय रायुडु को इसके लिये तैयार रहना चाहिए। रायुडु विकेटकीपिंग भी कर लेते हैं और यदि किसी मैच में धौनी नहीं खेल पाते हैं कि तो उन्हें विकेट के आगे ही नहीं विकेट के पीछे भी अपना कौशल दिखाना होगा। जिम्मेदारियां काफी हैं देखना है कि रायुडु उस पर खरा उतर पाते हैं या नहीं। वह पहली बार विश्व कप में खेलेंगे। उन्हें अब तक केवल 27 वनडे मैच खेलने का मौका मिला जिसमें उन्होंने 41.27 की औसत से 743 रन बनाये हैं। रायुडु के नाम पर एक शतक और पांच अर्धशतक भी दर्ज हैं। 
                                                                                  धर्मेन्द्र मोहन पंत 

Monday, January 26, 2015

गजब की समानता है कि 26 जनवरी को बने दो टेस्ट शतकों में

                                                                 धर्मेन्द्र मोहन पंत
           भारत का गणतंत्र दिवस यानि 26 जनवरी। भारत 1950 में गणतंत्र बना लेकिन यहां पर केवल 26 जनवरी को ध्यान में रखकर एक रोचक और दिलचस्प आंकड़े का जिक्र किया जाएगा। 'सचिन के सौ शतक' किताब लिखने के बाद मेरा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों के प्रति कुछ ज्यादा ही प्यार जाग गया और मैंने इन पर अध्ययन करना शुरू किया। अब जब 26 जनवरी की ही बात करें। इस दिन भारत के केवल दो बल्लेबाजों ने टेस्ट मैचों में शतक लगाया लेकिन इन दोनों शतकों में गजब की समानता है।
           26 जनवरी को टेस्ट मैचों में शतक पूरे करने वाले इन दोनों खिलाड़ियों के नाम अंग्रेजी के अक्षर 'वी' से शुरू होते हैं। इन दोनों ने एक देश आस्ट्रेलिया के खिलाफ यह शतक लगाया। मैदान भी एक ही था एडिलेड ओवल। दोनों ने टेस्ट मैच के तीसरे दिन शतक पूरा किया। यह इन दोनों का टेस्ट मैचों में पहला शतक था। और इससे भी बढ़कर दोनों ने एक समान 116 रन बनाये। दोनों ने भारत की पहली पारी में यह स्कोर बनाया। एडिलेड ओवल में दोनों बार श्रृंखला का चौथा टेस्ट मैच खेला गया था। भारत 64 साल के अंतराल में खेले गये इन दोनों मैचों में बड़े अंतर से हार गया था।
विजय हजारे और विराट कोहली : 26 जनवरी को टेस्ट शतक लगाने वाले भारतीय
          ये क्रिकेटर हैं अपने जमाने के बेहतरीन बल्लेबाज विजय हजारे और वर्तमान समय में भारतीय क्रिकेट की धड़कन विराट कोहली। संयोग से हजारे 26 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतक पूरा करने वाले दुनिया के पहले बल्लेबाज थे। उन्होंने भारत के गणतंत्र बनने से दो साल पहले यानि 1948 को अपने टेस्ट करियर का पहला शतक पूरा किया था। आस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी करते हुए अपनी पारी सात विकेट पर 674 रन बनाकर समाप्त घोषित की थी। महान डान ब्रैडमैन ने 201 रन की पारी खेली थी। भारत की पहली पारी 24 जनवरी को शुरू हो गयी थी, लेकिन 25 जनवरी विश्राम का दिन था और इस तरह से हजारे मैच के तीसरे दिन यानि 26 जनवरी को क्रीज पर उतरे और दिन के आखिर में 108 रन बनाकर नाबाद रहे। वह आखिर में 116 रन बनाकर पगबाधा आउट हुए। यह हजारे का टेस्ट मैचों में पहला शतक था। इससे पहले उनका उच्चतम स्कोर 44 रन था। दत्तू फडकर ने भी 123 रन बनाये लेकिन उन्होंने अपना शतक 27 जनवरी को पूरा किया था। भारतीय टीम इसके बावजूद 381 रन ही बना सकी और उसे फालोआन करना पड़ा। हजारे ने दूसरी पारी में भी 145 रन बनाये थे लेकिन वह भारत को पारी और 16 रन से हारने से नहीं बचा पाये थे।
        अब चर्चा करते हैं विराट कोहली के शतक। कोहली ने 26 जनवरी 2012 को अपने टेस्ट करियर का पहला शतक लगाया था। आस्ट्रेलिया ने 1948 वाले मैच की तरह टास जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए अपनी पहली पारी सात विकेट पर 604 रन बनाकर समाप्त घोषित की। रिकी पोंटिंग और माइकल क्लार्क दोनों ने दोहरे शतक लगाये। अब टेस्ट मैचों में विश्राम का दिन नहीं होता लेकिन मैच 24 जनवरी से शुरू हुआ था इसलिए कोहली को मैच के तीसरे दिन यानि 26 जनवरी को क्रीज पर उतरने का मौका मिला। कोहली आखिर में 116 रन बनाकर पगबाधा आउट हुए। इससे पहले कोहली का टेस्ट मैचों में उच्चतम स्कोर 75 रन था। भारत का कोई भी अन्य बल्लेबाज नहीं चला और पूरी टीम 272 रन पर लुढक गयी। आस्ट्रेलिया ने इस बार फालोआन नहीं दिया लेकिन आखिर में वह 298 रन के बड़े अंतर से जीत दर्ज करने में सफल रहा। ये था भारतीय बल्लेबाजों के 26 जनवरी को लगाये गये टेस्ट शतकों का किस्सा।
         हजारे के शतक से लेकर कोहली के शतक तक 26 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट (टेस्ट, वनडे और टी20) में कुल 21 शतक पूरे किये गये। इनमें महिला क्रिकेट में लगे दो शतक भी शामिल हैं। आस्ट्रेलिया के मैथ्यू हेडन अकेले ऐसे बल्लेबाज हैं जिन्होंने 26 जनवरी को दो बार शतक पूरे किये। हेडन ने 1997 में वेस्टइंडीज और 2008 में भारत के खिलाफ इस दिन टेस्ट शतक पूरे किये थे। संयोग से हेडन ने वेस्टइंडीज के खिलाफ शतक एडिलेड ओवल में ही लगाया था और उनका यह टेस्ट मैचों में पहला शतक भी था। एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों की बात करें तो जिम्बाब्वे के ग्रीम फ्लावर और आस्ट्रेलिया के एडम गिलक्रिस्ट ने अपने करियर का पहला वनडे शतक 26 जनवरी को ही लगाया था। आस्ट्रेलिया के मार्क वॉ ने 26 जनवरी 2000 को भारत के खिलाफ एडिलेड ओवल में 116 रन बनाये थे। महिला क्रिकेट में आस्ट्रेलिया की दिग्गज बल्लेबाज बेलिंडा क्लार्क ने 26 जनवरी को ही अपना पहला टेस्ट शतक लगाया था। भारत के खिलाफ नार्थ सिडनी ओवल में 1991 को खेला गया यह मैच क्लार्क का पदार्पण टेस्ट भी था। दक्षिण अफ्रीका की महिला क्रिकेटर जोमारी लोगटनबर्ग ने भी वनडे में अपना पहला शतक 26 जनवरी को लगाया था।

Monday, January 12, 2015

डाउन अंडर में विश्व कप के भारतीय बल्लेबाज

                                                                                       धर्मेन्द्र 
     विश्व कप के लिये भारत ने जो टीम चुनी है उसकी बल्लेबाजी मजबूत मानी जा रही है। गेंदबाजी कमजोर पक्ष है लेकिन हम यहां पर केवल बल्लेबाजों तथा आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में उनके प्रदर्शन पर गौर करेंगे। यह आंकड़ों की बिसात है जो समय, परिस्थितियों और फार्म के हिसाब से बदल भी सकती है लेकिन भारतीय बल्लेबाजों के लिये 'डाउन अंडर' यानि आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सरजमीं हमेशा चुनौती रही है और आंकड़ों पर गौर करने से भी साबित हो जाता है कि विशेषकर एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट यानि वनडे में कप्तान महेंद्र सिंह धौनी और विराट कोहली को छोड़कर विश्व कप टीम के बाकी बल्लेबाज 'डाउन अंडर' में रन बनाने के लिये जूझते रहे हैं। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की पिचें तेज होती हैं और उनमें पर्याप्त उछाल रहती है। भारत के सुरेश रैना और रोहित शर्मा जैसे बल्लेबाजों को इस तरह की पिचें रास नहीं आती हैं। यदि भारत को विश्व कप का खिताब बरकरार रखना है तो इन बल्लेबाजों को खुद को साबित करना होगा और अपने पिछले रिकार्ड में सुधार करना होगा।
रिकार्ड में सुधार करना होगा धवन, रोहित और रैना को 
     
       चलिये अब आंकड़ों की जुबानी कहानी आगे बढ़ाते हैं। बल्लेबाजी क्रम से ही आगे बढ़ते हैं। भारत के लिये अभी शिखर धवन और रोहित शर्मा वनडे में पारी का आगाज कर रहे हैं। इन दोनों ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ हाल में समाप्त हुई टेस्ट श्रृंखला में निराशाजनक प्रदर्शन किया था और 'डाउन अंडर में उनका ओवरआल रिकार्ड भी प्रभावशाली नहीं है।  आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला की छह पारियों में केवल 167 रन बनाने वाले धवन ने विश्व कप के मेजबान देशों यानि आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में अब तक केवल कीवियों की धरती पर चार वनडे खेले हैं जिनमें वह बुरी तरह नाकाम रहे। इन चार मैचों में उन्होंने 20.25 की औसत से 81 रन बनाये जिसमें उनका उच्चतम स्कोर 32 रन रहा। उनके साथी सलामी बल्लेबाज रोहित को जरूर 22 वनडे खेलने का मौका मिला है जिनमें उन्होंने 29.52 की औसत से 502 रन बनाये हैं। वनडे में दो दोहरे शतक लगाने वाले रोहित को 'डाउन अंडर' में अब भी पहले शतक का इंतजार है। भारत को लीग चरण में आस्ट्रेलिया में चार और न्यूजीलैंड में दो मैच खेले हैं। इसका जिक्र इसलिए किया जा रहा है क्योंकि रोहित ने आस्ट्रेलिया में जो 15 वनडे खेले हैं उनमें वह केवल 26.16 की औसत से ही रन बना पाये हैं।
        अब बात करते हैं विराट कोहली की जिन्होंने आस्ट्रेलिया के खिलाफ चार टेस्ट मैचों में 692 रन बनाकर साबित कर दिया कि उन पर परिस्थितियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह दुनिया के किसी भी तरह की पिच पर रन बनाने में सक्षम हैं। कोहली हर तरह के प्रारूप में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी उतने ही सफल रहे हैं जितने की भारत में। भारत की टेस्ट टीम के नये कप्तान ने 'डाउन अंडर' में तीनों प्रारूपों में मिलकर 1923 रन बनाये हैं और उनका औसत 58.27 है। वनडे में उन्होंने दोनों देशों में अब तक जो 13 मैच खेले हैं उनमें 55.33 की औसत से 664 रन बनाये हैं। कोहली ने इन दोनों देशों की सरजमीं पर अब तक वनडे में एक एक शतक लगाया है।
     
कोहली और धौनी : आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में भी खूब चला है बल्ला
       कोहली यदि नंबर तीन पर उतरेंगे तो संभवत: नंबर चार की जिम्मेदारी अजिंक्य रहाणे संभालेंगे जो अच्छी फार्म में चल रहे हैं। वह अच्छे तकनीक वाले बल्लेबाज हैं और आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला में 399 रन बनाकर उन्होंने इसे साबित भी कर दिया है। रहाणे का  'डाउन अंडर' में वनडे रिकार्ड हालांकि बहुत खराब है और वह इसमें जरूर सुधार करने की कोशिश करेंगे। रहाणे ने अब तक आस्ट्रेलिया में कोई वनडे नहीं खेला है। उन्होंने पांच मैच न्यूजीलैंड की सरजमीं पर खेले जिसकी पांच पारियों में वह केवल 51 रन बना पाये। इनमें से चार पारियों में वह दोहरे अंक में भी नहीं पहुंच पाये थे जबकि एक बार उन्होंने 36 रन की पारी खेली थी।    
          बल्लेबाजी क्रम में नंबर पांच सुरेश रैना के लिये सुरक्षित है जिन्हें हाल में सिडनी में पहली बार 'डाउन अंडर' में पहला टेस्ट मैच खेलने का मौका मिला और वह दोनों पारियों में कुल चार गेंद का सामना कर पाये और खाता खोलने में भी नाकाम रहे। रैना ने इन दोनों मेजबान देशों में अब तक कुल 16 वनडे मैच खेले हैं जिनमें 32.58 की औसत से 391 रन बनाये हैं। वह इन 16 मैचों की 15 पारियों में केवल एक बार 50 रन के पार पहुंच पाये। आस्ट्रेलिया की सरजमीं पर तो वह आठ पारियों में केवल 182 रन ही बना पाये हैं और उनका उच्चतम स्कोर नाबाद 40 रन है। मतलब यदि रैना आस्ट्रेलिया में त्रिकोणीय श्रृंखला या विश्व कप में अर्धशतक जड़ते हैं तो यह उनका आस्ट्रेलियाई धरती पर पहला पचासा होगा। मध्यक्रम के किसी बल्लेबाज या रहाणे के शीर्ष क्रम में खेलने की स्थिति में अंबाती रायुडु को मौका मिल सकता है। रायुडु ने अब तक आस्ट्रेलिया में अब तक कोई मैच नहीं खेला है। न्यूजीलैंड में उन्हें दो वनडे खेलने का मौका मिला जिसमें उन्होंने 57 रन बनाये हैं।
       विकेटकीपर बल्लेबाज और टीम के कप्तान धौनी आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सरजमीं पर टेस्ट मैचों में भले ही अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाये लेकिन वनडे में उन्होंने वहां भी अपना जलवा जमकर बिखेरा है। रिकार्ड के लिये बतादें कि टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके धौनी ने लंबी अवधि के प्रारूप में इन दोनों देशों में 13 टेस्ट मैच की 24 पारियों में 27.76 की औसत से 583 रन बनाये। जिसमें उनका उच्चतम स्कोर 68 रन है। वनडे की कहानी इसके ठीक उलट है हालांकि इस प्रारूप में भी धौनी को अभी 'डाउन अंडर' में पहले शतक का इंतजार है। असल में धौनी अब तक इन दोनों देशों में किसी भी प्रारूप में शतक नहीं जड़ पाये हैं। वनडे की बात करें तो धौनी ने अब तक विश्व कप के मेजबान देशों की धरती पर 27 मैच खेले हैं जिनमें उन्होंने 67.20 के प्रभावशाली औसत से 1008 रन बनाये हैं। इनमें नौ अर्धशतक शामिल हैं। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दोनों में उनका वनडे औसत 60 से ऊपर है।
         भारतीय टीम में चुने गये दो आलराउंडरों की चर्चा किये बिना भारतीय बल्लेबाजों के आंकड़ों की यह
बिन्नी और जडेजा को सही साबित करना होगा चयन 
कहानी अधूरी रहेगी। रविंद्र जडेजा ने इन दोनों देशों में 13 वनडे की 12 पारियों में 27.33 की औसत से 246 रन बनाये हैं। न्यूजीलैंड की सरजमीं पर उन्होंने ठीकठाक प्रदर्शन (पांच मैचों में 145 रन) किया है लेकिन आस्ट्रेलिया की धरती पर उनका बल्ला अभी तक नहीं चल पाया है। जडेजा ने आस्ट्रेलिया में जो आठ वनडे मैच खेले हैं उनमें वह केवल 101 रन बना पाये हैं और उनका औसत 16.83 है। यहां उनका उच्चतम स्कोर नाबाद 24 रन है। भारत के दूसरे आलराउंडर स्टुअर्ट बिन्नी ने अब तक अंतरराष्ट्रीय मैचों में आस्ट्रेलियाई पिचों का स्वाद नहीं चखा है। न्यूजीलैंड में उन्होंने एक वनडे खेला है जिसमें उन्हें बल्लेबाजी का मौका नहीं मिला। पिछले साल हैमिल्टन में खेले गये इस मैच में धौनी ने उनके बजाय आर अश्विन को पहले बल्लेबाजी के लिये भेज दिया था। इसके बाद बिन्नी से केवल एक ओवर की गेंदबाजी करवायी गयी जिसमें उन्होंने आठ रन दिये थे। इसके उलट रायुडु को तीन ओवर दिये गये थे। आप इसका कुछ भी मतलब निकाल सकते हैं। मैं तो आंकड़ों से खेलता हूं और मेरा इस पारी में प्रदर्शन कैसा रहा इसका फैसला आप पर छोड़ता हूं। इच्छा करे तो प्रतिक्रिया जरूर दें।
     (सभी आंकड़े 12 जनवरी 2015 तक के हैं)

Sunday, January 4, 2015

हर गेंदबाज पर हावी रहा है कोहली

                                                                                                              धर्मेन्द्र 
       
विराट कोहली का व्यवहार कैसा है और वह मैदान पर कैसा पेश आता है। बड़ी चर्चा चल रही है इस पर। मुझे तो लगता है कि भारतीय टीम में कोई तो ऐसा है जो आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को उनके अंदाज में जवाब दे सकता है। आस्ट्रेलियाई इसको पचा नहीं पा रहे हैं और इसलिए वे तिलमिला उठे हैं। आखिर विराट ने उनकी सारी रणनीति का कचूमर जो निकाल दिया। कोहली पर चारों तरफ से आक्रमण करना आस्ट्रेलिया की रणनीति का हिस्सा था। उनका मानना था कि यदि कोहली को परेशान किया गया तो वह अपना नैसर्गिक खेल नहीं दिखा पाएगा और असफल रहेगा लेकिन हुआ इसके उलटा। कोहली ने सीधा और सपाट रवैया अपनाया ''तुम मुझ पर तंज कसो और मैं जवाब दूंगा, बल्ले से और मुंह से भी। '' सही भी है यदि छींटाकशी वर्तमान क्रिकेट की रणनीति का हिस्सा है और उससे बल्लेबाज का ध्यान भंग करने की कोशिश की जाती है तो फिर आप कब तक आदर्श बनकर रह सकते हो।
     पिछले तीन टेस्ट मैचों में कोहली के प्रदर्शन को देखकर लगता है कि उन्होंने चुन चुनकर आस्ट्रेलियाई गेंदबाजों की खबर ली। अब मिशेल जानसन को ही ले लीजिए। उन्हें कोहली पर फिकरे कसने की जिम्मेदारी सौंपी गयी और भारतीय बल्लेबाज ने उसकी गेंदों को विशेष रूप से निशाना बनाया। जब भी जानसन गेंदबाजी के लिये आये तब कोहली उन पर हावी हो गया। तीसरे टेस्ट मैच तक कोहली ने जानसन की 157 गेंदों का सामना किया था और इसमें उन्होंने 145 रन बनाये। मतलब जानसन के खिलाफ कोहली का स्ट्राइक रेट 92.4 है। इसे बेहतरीन कहा जा सकता है। यह अलग बात है कि तीन अवसरों पर वह जानसन की गेंद पर आउट भी हुए।
          आस्ट्रेलिया नाथन लियोन को अपना तुरूप का इक्का मानकर चल रहा था लेकिन वह कोहली पर अपनी बलखाती गेंदों का प्रभाव नहीं छोड़ पाये। लियोन अब तक कोहली को 238 गेंदें कर चुका है और भारतीय बल्लेबाज ने इनमें 151 रन बनाये हैं। लियोन ने एक बार कोहली को आउट किया। जानसन और लियोन की कोहली के सामने असफलता के इन आंकड़ों से ही लगता है कि आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी बौखला गये हैं। आस्ट्रेलिया के कप्तान स्टीवन स्मिथ ने जोश हेजलवुड से बड़ी उम्मीद रखी थी। यह तेज गेंदबाज कोहली के सामने कुछ हद तक अपने कप्तान की अपेक्षाओं पर खरा भी उतरा। हेजलवुड ने कोहली को जो 72 गेंद की उनमें 38 रन दिये और दो बार विकेट हासिल किया।
          कोहली का आस्ट्रेलिया के अन्य गेंदबाजों के सामने प्रदर्शन पर गौर करें तो कोई भी ऐसा गेंदबाज नहीं दिखेगा जो उन पर प्रभाव छोड़ने में सफल रहा हो। रेयान हैरिस ने अब तक कोहली को 119 गेंद की हैं जिसमें उन्होंने 49 रन दिये। कोहली ने इसके अलावा शेन वाटसन की 84 गेंदों पर 45, पीटर सिडल की 31 गेंदों पर 21, मिशेल मार्श की 33 गेंदों पर 20, स्टीवन स्मिथ की 22 गेंदों पर 20 और मिशेल स्टार्क की 12 गेंदों पर 10 रन बनाये हैं। इस तरह से उन्होंने छह पारियों में अब तक 768 गेंद खेलकर 499 रन बनाये हैं और उनका स्ट्राइक रेट 65.00 है। कोहली के नाम पर तीन शतक और एक अर्धशतक दर्ज है। यह कोहली का किसी टेस्ट श्रृंखला में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। इससे पहले उन्होंने आस्ट्रेलिया के खिलाफ 2011.12 में 300 रन बनाये थे। 

Sunday, December 21, 2014

धवन की चोट, कोहली और नंबर चार


                                                                                            धर्मेन्द्र मोहन पंत 

        स्थान : ब्रिस्बेन वूललुंगाबा, जो गाबा के नाम से लोकप्रिय है। भारतीय टीम चौथे दिन अपनी दूसरी पारी आगे बढ़ाने की तैयारियों में हैं। खेल शुरू होने में केवल दस मिनट बचे हैं। पिछले दिन के अविजित बल्लेबाज चेतेश्वर पुजारा तैयार हैं लेकिन उनके साथ तीसरे दिन स्टंप के समय अविजित रहे शिखर धवन अभ्यास के दौरान कलाई में लगी चोट से परेशान हैं। ऐसे में चौथे नंबर पर बल्लेबाजी के लिये उतरने वाले विराट कोहली को कहा जाता है कि वह पुजारा के साथ क्रीज पर उतरे। मामला गरमा जाता है। आखिर खेल से दस मिनट पहले यह क्यों तय किया गया कि कौन बल्लेबाजी के लिये उतरेगा? धवन तो पहले ही चोटिल हो गये थे और अभ्यास पिच को छोड़कर जल्द ही ड्रेसिंग रूम में भी लौट आये थे। असल में धवन ने कप्तान को अपनी स्थिति बताने में देर की। वह कप्तान को पहले ही बता देते तो संभवत: यह स्थिति पैदा ही नहीं होती। वह खेल शुरू होने से दस मिनट पहले आकर बताते हैं कि वह बल्लेबाजी के लिये नहीं उतर पाएंगे।

        कोहली खेलने के लिये तैयार हो गये लेकिन ड्रेसिंग रूम की गरमागर्म बहस का असर ​पिच पर दिखता है। मिशेल जानसन की गेंद को कोहली विकेट पर खेलकर तुरंत ही ड्रेसिंग रूम में लौट आते हैं। भारतीय पारी ताश के पत्तों की तरह बिखर गयी और शिखर धवन को ठीक एक घंटे पांच मिनट के बाद क्रीज पर उतरना पड़ा। स्वाभाविक था कि इतनी जल्दी उनकी कलाई ठीक नहीं हुई थी इसलिए उनके साहसिक फैसले की सराहना करनी होगी। लेकिन यदि वह पहले ही यह जोखिम ले लेते तो फिर बखेड़ा खड़ा नहीं होता। धवन ने अपनी पारी वहीं से आगे बढ़ायी जहां पर उन्होंने पहले दिन छोड़ी थी। मतलब उन्होंने उसी अंदाज में बल्लेबाजी की। कुछ करारे ड्राइव लगाये और एक दो दर्शनीय पुल भी किये। साफ लग रहा था कि उनकी कलाई की चोट गंभीर नहीं है। बस इसके कारण मामला गंभीर बन गया था। 
        अब नंबर चार के बल्लेबाज कोहली बात करते हैं। अब कोई बल्लेबाज स्वयं कह रहा हो कि वह क्रीज पर उतरने की स्थिति में नहीं है तो कप्तान या कोच उस पर दबाव भी नहीं बना सकते। कप्तान के पास यही विकल्प बचता है कि वह बल्लेबाजी लाइन अप में अगले नंबर के बल्लेबाज को तैयार होने के लिये कहे और महेंद्र सिंह धोनी ने भी यही किया। यह तो सचिन तेंदुलकर के संन्यास लेने के बाद ही तय हो गया था कि वर्षों तक जिस नंबर चार पर उनका आधिपत्य रहा उसके अगले उत्तराधिकारी विराट कोहली होंगे। कोहली ने भी इस नंबर की ​गरिमा को कम नहीं होने दिया। वह अब तक चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करते हुए 21 पारियों में 858 रन बना चुके हैं जिसमें चार शतक भी शामिल हैं। तेंदुलकर ने भी नंबर चार पर खेलते हुए पहली 21 पारियों में पांच शतक लगाये थे और कोहली उनसे ज्यादा पीछे नहीं हैं। यह अलग बात है कि तेंदुलकर ने किसी भी परिस्थिति में इस नंबर पर उतरने से कभी मना नहीं किया। अपने करियर में 329 में से 275 पारियां आखिर उन्होंने इस नंबर पर यूं ही नहीं खेली। 
        बल्लेबाजी लाइनअप में वनडाउन यानि नंबर तीन सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। कभी कभी तो उसे पहले ओवर में ही नयी गेंद का सामना करने के लिये आना पड़ता है। चौथे नंबर की भी कमो​बेश यही स्थिति है। उसे पारी को संवारना होता है और इसलिए इस नंबर पर खेलने वाले बल्लेबाज का धैर्यवान और अनुशासित होना जरूरी है। तेंदुलकर ने चार नंबर को नयी और सम्मानित पहचान दी है। माहेला जयवर्धने, जाक कैलिस, ब्रायन लारा, जावेद मियादाद, मार्क वॉ जैसे बल्लेबाज इस नंबर पर यूं ही सफल नहीं हुए। भारत की तरफ से कभी अपनी कलात्मक बल्लेबाजी के लिये मशहूर गुंडप्पा विश्वनाथ ने इस नंबर की शोभा बढ़ायी थी। उन्होंने भारत की तरफ से तेंदुलकर के बाद इस नंबर पर सर्वाधिक 124 पारियां खेली हैं, 5000 से अधिक रन बनाये और 12 शतक जड़े। मतलब कोहली को बड़ी जिम्मेदारी निभानी है। 
       कोहली जिस तरह के बल्लेबाज हैं उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि तेंदुलकर ने नंबर चार को जो नयी पहचान दी है वह उसमें चार चांद लगाएंगे। वह हर तरह की चुनौती के लिये हमेशा तैयार दिखते हैं। फिर किसी भी तरह की बहस, भले ही वह क्षणिक हो, का नुकसान कोहली को ही होगा। उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वह भारत के भावी कप्तान हैं और अगले साल किसी भी समय उनके हाथों स्थायी तौर पर टीम की कमान दी जा सकती है। ऐसे में उन्हें भी कप्तान रहते हुई विषम परिस्थितियों में कुछ ऐसे फैसले करने पड़ सकते हैं जो किसी खिलाड़ी या टीम को नागवार गुजरे। प्रत्येक टीम गेम में ऐसा होता है। उम्मीद है कोहली इसे समझेंगे।