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Saturday, March 14, 2015

अब विशाल नहीं कहलाता 300

                                                            धर्मेन्द्र पंत 
       ईसीसी ने विश्व कप से पहले कहा था कि वह बल्ले और गेंद के बीच संतुलन पैदा करना चाहती है। उसने सीमा रेखा बढ़ाने का तर्क दिया ताकि आम शाट छक्के में तब्दील नहीं हो पाये। फिर भी रन बन रहे हैं और छक्के लग रहे हैं। अब तक जिन 39 मैचों में खेल संभव हो पाया उनमें से 25 में 300 से अधिक स्कोर बन गया है। तीन बार तो स्कोर 400 रन के पार भी पहुंच गया। रन आगे भी बनते रहेंगे क्योंकि जब नियम बल्लेबाजों के पक्ष में रहेंगे तब तक संतुलन नहीं साधा जा सकता है। पांच क्षेत्ररक्षकों को हर समय 30 गज के घेरे के अंदर रखने से नियम के चलते गेंदबाजों के साथ न्याय करने की बात नहीं की जा सकती है। इसके अलावा बल्ले इस तरह से तैयार किये जा रहे हैं उनके 'स्वीट स्पाट' की शक्ति चार गुनी बढ़ गयी है। ट्वेंटी . 20 क्रिकेट के आगमन से बल्लेबाजों के रवैये में भी बदलाव हुआ। वे अधिक आक्रामक बन गये। तिस पर नियमों और बल्ले ने भी उन्हें पूरी मदद पहुंचायी।
       मैं पिछले 23 साल से खेल पत्रकारिता कर रहा हूं। एक जमाना था जब हम एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 200 के आसपास के स्कोर को चुनौतीपूर्ण लिखते थे। 250 या 260 रन का स्कोर बड़ा हो जाता था और 300 रन, उसके लिये तो 'रनों का एवरेस्ट' खड़ा कर दिया लिखने में भी हमें गुरेज नहीं थी। लेकिन अब 400 रन के स्कोर के लिये भी इस शब्द का उपयोग करने में हिचकिचाहट होती है। आखिर विरोधी टीम भी नियमों का सहारा लेकर यहां तक पहुंच सकती है। पिछले कुछ वर्षों में यह बदलाव आया है क्योंकि 2002 में नेटवेस्ट सीरीज में भारत ने जब 326 रन का लक्ष्य हासिल किया था तो हमने यही लिखा था कि 'भारत ने इंग्लैंड के रन एवरेस्ट को बौना कर दिया।'

कभी एवरेस्ट कहलाता था 300 का स्कोर 

      ब विश्व कप में ही देख लीजिए। पहले तीन विश्व कप में प्रत्येक पारी 60 ओवर की होती थी लेकिन तब भी 250 या 300 रन तक पहुंचना मुश्किल होता था। पहले तीनों विश्व कप इंग्लैंड में खेले गये। इनमें से पहले विश्व कप में चार बार 300 रन से अधिक का स्कोर बना। इंग्लैंड ने तब भारत के खिलाफ लार्ड्स में चार विकेट पर 334 रन बनाये थे और उसका यह रिकार्ड 1983 में पाकिस्तान ने श्रीलंका के खिलाफ स्वान्सी में पांच विकेट पर 338 रन बनाकर तोड़ा था। इससे पहले 1979 विश्व कप में तो कोई भी टीम 300 रन के स्कोर तक नहीं पहुंच पायी थी। उस टूर्नामेंट का उच्चतम स्कोर छह विकेट पर 293 रन था जो वेस्टइंडीज ने पाकिस्तान के खिलाफ ओवल में बनाया था। आलम यह था कि 250 या उससे अधिक रन के केवल चार स्कोर बने थे और 19 बार टीमों ने 200 से भी कम का स्कोर बनाया था। इसके चार साल बाद 1983 में हालांकि 15 बार टीमों ने 250 या इससे अधिक रन बनाये। चार बार 300 से अधिक का स्कोर बना।
     पहली बार विश्व कप 1987 में इंग्लैंड से बाहर निकला। अब ओवरों की संख्या घटकर 50 रह गयी थी लेकिन बल्लेबाज तेजी से रन बनाना सीख रहे थे। भारत और पाकिस्तान में खेले गये विश्व कप 1987 में केवल एक बार 300 से अधिक का स्कोर बना। वेस्टइंडीज ने श्रीलंका के खिलाफ कराची में चार विकेट पर 360 रन का विशाल स्कोर खड़ा कर दिया था। वैसे इस टूर्नामेंट में 250 रन से अधिक 16 स्कोर बने थे। 
        आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने इससे पहले 1992 में विश्व कप की मेजबानी की थी लेकिन तब भी रनों की बारिश नहीं हुई थी। केवल दस पारियों में 250 रन से अधिक का स्कोर बना था। सिर्फ दो टीमें 300 रन के 'पहाड़' को पार कर पायी थी और दिलचस्प तथ्य ये है कि ये दोनों स्कोर एक ही मैच में बने थे। जिम्बाब्वे ने न्यू प्लाईमाउथ में श्रीलंका के खिलाफ चार विकेट पर 312 रन बनाये। यह एंडी फ्लावर का पहला वनडे थे जिसमें उन्होंने 115 रन बनाये और एंडी वालेर ने 45 गेंदों पर 83 रन ठोके थे। श्रीलंका ने हालांकि सात विकेट पर 313 रन बनाकर जिम्बाब्वे के रनों के एवरेस्ट को छोटा कर दिया था। भारत की बात करें तो तब मोहम्मद अजहरूद्दीन की अगुवाई वाली टीम का सर्वोच्च स्कोर था 234 रन। उसने आस्ट्रेलिया के खिलाफ ब्रिस्बेन में 47 ओवरों में यह स्कोर बनाया था। 
        भारतीय उपमहाद्वीप में 1996 में जब दूसरी बार विश्व कप का आयोजन हुआ तो तब रिकार्ड पांच बार 300 से अधिक रन का स्कोर बना था। श्रीलंका ने केन्या के खिलाफ कैंडी में पांच विकेट पर 398 रन का रिकार्ड स्कोर खड़ा कर दिया था। कुल 18 पारियों में स्कोर 250 रन के पार पहुंचा। दक्षिण अफ्रीका ने दो बार 300 रन की संख्या को पार किया लेकिन भारत के लिये यह तब भी दूर की कौड़ी बनी रही। उसका उच्चतम स्कोर आठ विकेट पर 287 रन था जो उसने पाकिस्तान के खिलाफ बेंगलूर में क्वार्टर फाइनल में बनाया था। भारत 1999 में पहली बार विश्व कप में 300 रन की संख्या को पार करने में सफल रहा था। इंग्लैंड में खेले गये टूर्नामेंट में उसने श्रीलंका के खिलाफ टांटन में छह विकेट पर 373 रन बनाये और फिर केन्या के खिलाफ ब्रिस्टल में दो विकेट पर 329 रन ठोके। भारत के ​अलावा केवल आस्ट्रेलिया एक बार (303/4 बनाम जिम्बाब्वे बर्मिंघम) 300 रन की संख्या छू पाया था। वैसे इस टूर्नामेंट कुल 19 स्कोर 250 रन से अधिक के थे।

नयी सदी में छोटा बन गया 300

           स्ट्रेलिया ने 2003 में अफ्रीकी महाद्वीप में खेले गये विश्व कप में भारत के खिलाफ जोहानिसबर्ग में खेले गये फाइनल में दो विकेट पर 359 रन बना दिये थे। भारत ​लगातार आठ मैच जीतकर फाइनल में पहुंचा था लेकिन रनों के इस पहाड़ के सामने उसकी हार पहले से ही तय मानी जाने लगी थी। वैसे विश्व कप 2003 में 300 रन से अधिक स्कोर का नया रिकार्ड बना था। कुल नौ बार 300 या इससे अधिक के स्कोर बने। यही नहीं 26 बार टीमों ने 250 रन की संख्या को छुआ। भारत का उच्चतम स्कोर दो विकेट पर 311 रन था जो उसने नामीबिया के खिलाफ पीटरमैरित्जबर्ग में बनाया था। इसके चार साल बाद वेस्टइंडीज में खेले गये विश्व कप में बल्लेबाजों ने बाउंड्री छोटी होने का पूरा फायदा उठाया और 16 बार 300 रन का आंकड़ा स्पर्श किया गया। भारत भले ही तब पहले दौर में बाहर हो गया था लेकिन उसने बरमुडा को क्रिकेट का ककहरा सिखाकर पांच विकेट पर 413 रन बना दिये थे। चैंपियन आस्ट्रेलिया ने पांच बार 300 से अधिक का स्कोर बनाया। उप विजेता श्रीलंका तीन, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका दो . दो जबकि भारत, इंगलैंड, पाकिस्तान और वेस्टइंडीज एक एक बार 300 रन तक पहुंचे थे। नियम बल्लेबाजों के अनुकूल बनने लगे थे और सभी टीमों ने इसका फायदा उठाया। कुल 25 बार टीमें 250 रन या इससे अधिक का स्कोर खड़ा करने में सफल रही थी।  
           रनों का अंबार लगना शुरू हो गया था और 2011 विश्व कप में भारतीय उपमहाद्वीप की सपाट पिचों पर 17 बार 300 या इससे अधिक का स्कोर का नया रिकार्ड बन गया। अब समय आ गया था जबकि 250 और 300 के बीच के लक्ष्य को बड़ा कहना इस शब्द के प्रति अन्याय लगने लगा था। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि 37 बार टीमों ने 250 रन या इससे अधिक रन बनाये थे। भारत ने बांग्लादेश के खिलाफ ढाका में चार विकेट पर 370 रन बनाये। इस मैच में तो वह जीत गया था लेकिन इंग्लैंड के खिलाफ बेंगलूर में 338 रन का स्कोर भी बड़ा नहीं बन पाया। इंग्लैंड ने इसकी बराबरी करके मैच टाई करवा दिया था। 
    और अब विश्व कप 2015 में वेस्टइंडीज 300 रन से अधिक का स्कोर बनाकर अपनी जीत मानकर चलने लग जाता है लेकिन आयरलैंड लक्ष्य हासिल कर लेता है। यह सभी टीमों के लिये साफ संकेत था कि वे 300 रन के स्कोर को बड़ा नहीं माने। अब 300 रन को मैं विशाल स्कोर नहीं लिखता और अगर 39 मैचों में 40 बार टीमें 250 रन या इससे अधिक स्कोर बना लेती हैं तो 250 से अधिक और 300 रन से कम के स्कोर को चुनौतीपूर्ण लिखने में भी झिझक लगती है। 
                     (सभी आंकड़े 14 मार्च 2015 तक के हैं।)
                                                                                     


Wednesday, March 11, 2015

संगा भाई अभी अलविदा न कहना

     
    अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शतकों के अपने आंकड़ों को सहेजने के लिये थोड़ा मशक्कत तो लाजिमी है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से इसका आनंद कुछ और बढ़ गया। आखिर जब आप क्रिकेट के किसी असली विद्यार्थी का अच्छे प्रदर्शन के लिये बराबर जिक्र करते हैं तो तब आनंद की अनुभूति होना स्वाभाविक है। कुमार संगकारा मुझे ही नहीं मेरे जैसे लाखों क्रिकेट प्रेमियों को बराबर यह अनुभूति करा रहे हैं और अब तो वह एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लगातार चार मैचों में शतक जड़ने वाले पहले बल्लेबाज भी बन गये हैं। किसी एक विश्व कप में भी पहली बार किसी बल्लेबाज ने चार शतक ठोके। आंकड़ों की बात आगे करेंगे। 
         कुमार संगकारा जब इस शख्स का नाम जेहन में आता है तो विकेटों के आगे और विकेटों के पीछे खड़े एक ऐसे शख्स की तस्वीर सामने आ जाती है जो सही मायनों में क्रिकेट के लिये बना है। जो पिछले डेढ़ दशक से विश्व क्रिकेट के चोटी के बल्लेबाजों में शामिल रहा है। जो हौले से मुस्काराता है लेकिन उससे अधिक अपने कवर ड्राइव और पुल से लोगों को दीवाना बनाता है। जो बिना किसी लाग लपेट के रन बनाता है, क्योंकि टीम उसके लिये सर्वोपरि है। एक ऐसा शख्स जिसके नाम पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 27 हजार से अधिक रन दर्ज हैं लेकिन उसे विश्व क्रिकेट में वह दर्जा नहीं मिला जिसका वास्तव में वह हकदार है। अंग्रेजी में ऐसे लोगों के लिये एक शब्द है, ''अनसंग हीरो''।  संगकारा विश्व क्रिकेट के ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्हें इस खेल की दो महत्वपूर्ण विधाओं बल्लेबाजी और विकेटकीपिंग में माहिर होने के बावजूद कभी सचिन तेंदुलकर, ब्रायन लारा या रिकी पोंटिंग जैसी प्रसिद्धि नहीं मिली। क्यों? इसका जवाब दुनिया के लाखों करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों को देना चाहिए।
          जब संगकारा के लिये 'अनसंग हीरो' की बात आती है तो जेहन में जाक कैलिस का नाम भी आ जाता है। अफसोस की दोनों आलराउंडर रहे हैं। एक विकेट के आगे और पीछे अपने कौशल का कमाल दिखाता है तो दूसरा बल्लेबाजी में टीम का भार उठाने के बाद गेंदबाजी में भी अपने साथियों की मदद करता है। जब दुनिया के चोटी के बल्लेबाजों के आंकड़ों पर नजर पड़ती है तो उनका नाम भी उनमें शामिल होता है। फिर भी इन दोनों महानायकों को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे वास्तविक हकदार थे। यह खेल की नियति है। इसे स्वीकार भी करना होगा। मेरे लिये तो हमेशा यह सवाल अनुत्तरित ही रहेगा कि विश्व क्रिकेट में लगभग एक साथ खेलने वाले सचिन तेंदुलकर, ब्रायन लारा, रिकी पोंटिंग, जाक कैलिस, राहुल द्रविड़, कुमार संगकारा में पहला, दूसरा या तीसरा नंबर किसे दिया जाए? असल में इस तरह के नंबर इनके लिये नहीं बने हैं। इनके लिये तो वे नंबर बने हैं जिन्हें हम क्रिकेट की भाषा में रन कहते हैं। 
       र जब रन के इन नंबरों यानि आंकड़ों की बात चल पड़ी है तो आपको बता दूं कि पिछले पांच साल यानि एक मार्च 2010 से लेकर अब तक क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में मिलकर जिस बल्लेबाज ने सर्वाधिक रन बनाये हैं उसका नाम कुमार संगकारा है। श्रीलंका के बायें हाथ के इस बल्लेबाज ने इन पांच वर्षों में तीनों प्रारूपों में 214 मैच खेले और उनमें 53.99 की औसत से 11501 रन बनाये हैं। इनमें 32 शतक भी शामिल हैं। उनके बाद दूसरे नंबर पर भारत के विराट कोहली हैं जिन्होंने संगकारा से लगभग ढाई हजार रन कम बनाये हैं। बात लंबी अवधि के मैचों की हो या सीमित ओवरों की सभी में संगकारा अव्वल हैं। आप खुद ही देख लीजिए। टेस्ट क्रिकेट में संगकारा ने 42 मैचों में 65.54 की औसत से 4654 रन बनाये। इस बीच उन्होंने 17 शतक भी लगाये। इंग्लैंड के एलिस्टेयर कुक (4627) उनसे ज्यादा दूर नहीं हैं लेकिन कुक ने संगकारा की तुलना में 22 पारियां अधिक खेली हैं। वनडे में संगकारा ने पिछले पांच वर्षों में 136 मैचों में 6037 रन बनाये हैं जिसमें 15 शतक शामिल हैं। उनका औसत 52.49 रहा है। कोहली 5648 रन के साथ दूसरे स्थान पर हैं लेकिन संगकारा ने इस भारतीय बल्लेबाज की तुलना में केवल दो पारियां अधिक खेली हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि संगकारा अब 37 साल के हो गये हैं और बायें हाथ के इस बल्लेबाज के अनुसार अब ''शरीर के जोड़ चरमराने लगे हैं।''
           क्या आपको वास्तव में ऐसा लगता है? जब संगकारा बड़ी कुशलता से ड्राइव या फ्लिक करते हैं या फिर डाइव लगाकर कैच लेते हैं या फिर तेजी से रन चुराते हैं तो कहीं ऐसा नहीं लगता है। बहरहाल वह अपने शरीर के बारे में बेहतर जानते हैं। लेकिन एक सच्चा क्रिकेट प्रेमी होने के कारण मुझे यह खबर बार बार कचोट रही है कि संगकारा विश्व कप के बाद वनडे क्रिकेट नहीं खेलेंगे और अगस्त के बाद टेस्ट ​क्रिकेट को भी अलविदा कह देंगे। अभी तो लग रहा है कि संगकारा दो साल और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल सकते हैं। संन्यास लेना किसी खिलाड़ी का एकाधिकार होता है लेकिन एक क्रिकेट प्रेमी होने के नाते मैं इतना आग्रह करने का अधिकार तो रखता हूं कि 'संगा भाई अभी अलविदा न कहना।'  
                                                                                         धर्मेन्द्र पंत 


Monday, March 9, 2015

भारत . बांग्लादेश में हो सकता है क्वार्टर फाइनल

   
जीत का जश्न। बांग्लादेश इसका हकदार है। फोटो सौजन्य : बीसीबी 
 इंग्लैंड विश्व कप के पहले दौर से बाहर हो गया। तीन बार के उपविजेता का इस तरह दर्दनाक पराजयों का बोझ लिये विदा होना अच्छा नहीं लगा। लेकिन साथ ही खुशी भी हुई। बांग्लादेश ने पहली बार अपना दम दिखाया है। अब तक उसे पुछल्ली टीम ही कहा जाता था जो यदाकदा ही जीत दर्ज कर पाती थी। उसकी हार पहले ही तय मान ली जाती थी और इसलिए जब आईसीसी ने क्वार्टर फाइनल के लिये कार्यक्रम तय किया तो उसने मेलबर्न में इंग्लैंड का मैच रखा था। अब वहां बांग्लादेश खेलेगा। यह दूसरा क्वार्टर फाइनल 19 मार्च को होगा और पूरी संभावना है कि यह मैच भारत और बांग्लादेश के बीच खेला जाएगा। 
      बांग्लादेश को ग्रुप ए में अपना आखिरी लीग मैच न्यूजीलैंड से खेलना है जो अब तक अजेय है और जिसने अधिकतर एकतरफा जीत दर्ज की। बांग्लादेश उलटफेर का माद्दा रखता है लेकिन फिर इस मैच में जीत का प्रबल दावेदार न्यूजीलैंड ही रहेगा। बांग्लादेश अभी ग्रुप ए में तीसरे स्थान पर है लेकिन चौथे स्थान पर काबिज श्रीलंका को अपना अंतिम मैच में स्काटलैंड से खेलना है। उसमें उसकी जीत भी तय मानी जा रही है। आस्ट्रेलिया के भी सात अंक हैं लेकिन उसे भी आखिरी मैच में स्काटलैंड से भिड़ना है जिसने अब तक एक भी मैच नहीं जीता है। यदि न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया और श्रीलंका अपने अपने आखिरी मैच जीत जाते हैं तो ग्रुप ए में वे पहले तीन स्थान पर काबिज हो जाएंगे। बांग्लादेश चौथे स्थान पर खिसक जाएगा। 
     यह तय हो चुका है कि बांग्लादेश को मेलबर्न में अपना क्वार्टर फाइनल मैच खेलना है। यदि वह ग्रुप ए से चौथे स्थान पर रहता तो उसका सामना ग्रुप बी से पहले स्थान पर रहने वाली टीम से होगा। ग्रुप बी से भारत का पहला स्थान तय है। ऐसे में ये दोनों पड़ोसी देश आमने सामने होंगे। भारत इस मैच में 2007 जैसी गलती से बचना चाहेगा और जिस तरह की फार्म में अभी वह है उसके लिये जीत दर्ज करना आसान होगा। अभी के हिसाब से श्रीलंका का सामना दक्षिण अफ्रीका से हो सकता है। 
     ब जरा इंग्लैंड की बात कर लें। उसकी हार के लिये उसके बोर्ड यानि ईसीबी के कुछ अजीबोगरीब फैसले भी जिम्मेदार रहे। वह आखिर तक तय नहीं कर पाया कि टीम का कप्तान कौन होगा। एलिस्टेयर कुक को आनन फानन में हटाकर इयोन मोर्गन को कप्तानी सौंपने का फैसला बुद्धिमतापूर्ण नहीं था। बेहतर होता कि कुक को टीम में भी बनाये रखा जाता। मोर्गन कप्तानी का दबाव नहीं झेल पा रहे हैं और उनके प्रदर्शन में साफ तौर पर इसकी छाप दिख रही है। उनकी कप्तानी में अपरिपक्वता भी साफ नजर आयी। 
        दूसरी बात इंग्लैंड की टीम में कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं था जिसका नाम ही विरोधी गेंदबाजों के दिलो दिमाग में खौफ पैदा कर दे। उसके पास फिलहाल केविन पीटरसन ही ऐसा खिलाड़ी था लेकिन ईसीबी और पीटरसन दोनों ने अपनी टीम, क्रिकेट और विश्व कप के बजाय अपने अहं को अधिक तवज्जो दी और नतीजा सामने है। पीटरसन अब भी ऐसा खिलाड़ी है जो अकेले दम पर मैच का पासा पलट सकता है। इंग्लैंड की वर्तमान टीम में कोई भी अन्य खिलाड़ी ऐसा नजर नहीं आता है। उसे अपनी गेंदबाजी पर भरोसा था लेकिन विश्व कप में भी यह साबित हो गया कि जेम्स एंडरसन और स्टुअर्ट ब्राड जैसे गेंदबाज टेस्ट क्रिकेट में कहर बरपा सकते हैं लेकिन एकदिवसीय क्रिकेट अलग तरह का खेल है और यहां उनकी तूती नहीं बोलती। 
    ​बहरहाल अभी बांग्लादेश के लिये ताली बजाइये। इस बार वह किसी अगर मगर के बिना क्वार्टर फाइनल में पहुंचा है। विश्व कप में पहली बार एशिया की चार टीमों को हम क्वार्टर फाइनल में देख सकते हैं। यह एशियाई क्रिकेट के लिये भी खुशी की बात है।  यह उसके लिये बड़ी जीत है। इंग्लैंड को तो पिछले कुछ विश्व कप से शुरूआती दौर में बाहर आने की आदत पड़ चुकी है। उम्मीद है कि इस बार वह घर जाकर 2019 के बारे में विचार करेगा। आखिर तब उसे अपनी पिचों पर विश्व कप खेलना है और उसके दर्शक नहीं चाहेंगे कि उनकी टीम उनके सामने बुजदिलों जैसा प्रदर्शन करे।

Tuesday, March 3, 2015

जब पूरी भारतीय पारी में लगे केवल दो चौके

     भारतीय टीम ने लगभग 48 ओवर बल्लेबाजी की लेकिन इस दौरान वह केवल दो बार गेंद को सीमा रेखा के पार भेज पायी। भारतीय टीम की तरफ से ये दोनों चौके भी एक बल्लेबाज ने लगाये थे। यह दिलचस्प नजारा आज से लगभग 14 साल पहले छह दिसंबर 1991 को पर्थ के वाका मैदान पर देखने को मिला था। बेंसन एंड हेजस विश्व सीरीज के इस मैच में भारत के सामने वेस्टइंडीज था। ये दोनों टीमें अर्से बाद फिर से वाका पर छह मार्च यानि होली के दिन विश्व कप मैच के लिये आमने सामने होंगी और उस दिन इतना तय है कि भारतीय पारी में केवल दो चौके नहीं पड़ेंगे। 
     भारत और वेस्टइंडीज के बीच इससे पहले पर्थ में खेला गया एकमात्र मैच कई मायनों में खास था। इस मैच में दोनों टीमों ने 40 से अधिक ओवर खेले लेकिन बल्लेबाज वाका की तेज और उछाल वाली पिच से सामंजस्य नहीं बिठा पाये और कम स्कोर का यह मैच टाई रहा था। 
रवि शास्त्री के बल्ले से निकले थे दोनों चौके
    भारत को पहले बल्लेबाजी का न्यौता मिला और उसकी पूरी टीम 47.4 ओवर में 126 रन पर सिमट गयी। भारतीय पारी की खासियत यह रही कि इसमें केवल दो चौके लगे। ये दोनों चौके भी सलामी बल्लेबाज रवि शास्त्री ने लगाये जो निदेशक के रूप में वर्तमान टीम के साथ अभी पर्थ में मौजूद हैं। शास्त्री ने तब टीम की तरफ से सर्वाधिक 33 रन भी बनाये थे। उनके बाद दूसरा बड़ा स्कोर अतिरिक्त रनों (24 रन) का था। प्रवीण आमरे (20 रन), संजय मांजरेकर (15 रन) और मनोज प्रभाकर (13 रन) भी दोहरे अंक में पहुंचे लेकिन कोई भी गेंद को सीमा रेखा पार नहीं पहुंचा पाया था। कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन, सचिन तेंदुलकर, के श्रीकांत, कपिल देव जैसे धुरंधर दोहरे अंक में नहीं पहुंच पाये थे। 
       अभी वेस्टइंडीज टीम से कोच के रूप में जुड़े कर्टली एंब्रोस ने तब 8.4 ओवर में केवल नौ रन देकर दो विकेट लिये थे और बाद में उन्हें मैन आफ द मैच भी चुना गया था। एंब्रोस ने बाद में बल्लेबाजी करते हुए 17 रन भी बनाये थे और मैच का एकमात्र छक्का भी लगाया था।
      लेकिन यह क्या वेस्टइंडीज के बल्लेबाजों ने फिर से 1983 के विश्व कप फाइनल की कहानी दोहरा दी जबकि कैरेबियाई टीम के लिये भारत का 183 रन का स्कोर पहाड़ जैसा बन गया था। यहां तो लक्ष्य 127 रन था और वेस्टइंडीज की टीम में कप्तान रिची रिचर्डसन, ब्रायन लारा, डेसमंड हेन्स, कार्ल हूपर जैसे बल्लेबाज थे। 
      कपिल ने पहली गेंद पर हेन्स को आउट कर दिया। इसके बाद फिलो वालेस, रिचर्डसन, लारा और हूपर दोहरे अंक में पहुंचे लेकिन इनमें से कोई भी 14 रन से आगे नहीं बढ़ा। वेस्टइंडीज के आठ विकेट 76 रन  पर निकल गये और उस पर हार का खतरा मंडराने लगा। एंब्रोस और दसवें नंबर के बल्लेबाज एंडरसन कमिन्स (24 रन) ने आखिरी क्षणों में मैच रोमांचक बना दिया। वेस्टइंडीज को जब छह रन और भारत को एक विकेट की दरकार थी तब तेंदुलकर ने गेंद संभाली। उनकी पहली पांच गेंदों पर पांच रन बने लेकिन आखिरी गेंद पर वह कमिन्स को आउट करने में सफल रहे। अजहर ने स्लिप में बेहतरीन कैच लपका।  वेस्टइंडीज की टीम 41 ओवर में 126 रन पर आउट हो गयी और मैच टाई हो गया।  अपना पहला एकदिवसीय मैच खेल रहे सुब्रत बनर्जी ने भारत की तरफ से तीन जबकि कपिल और जवागल श्रीनाथ ने दो . दो विकेट लिये थे। 
       रिकार्ड के लिये बता दें कि भारत ने पर्थ पर कुल 12 मैच (विश्व कप 2015 में यूएई के खिलाफ खेले गये मैच सहित) खेले हैं जिनमें से पांच में उसने जीत दर्ज की है जबकि छह मैचों में उसे हार मिली है। एक मैच टाई रहा है। 

Saturday, February 28, 2015

विश्व कप में 'छोटे' बन गये 'बड़े' मैच

     यरलैंड और यूएई या फिर अफगानिस्तान और स्काटलैंड के मैचों को आईसीसी से लेकर ​मीडिया और क्रिकेट पंडितों ने कोई तवज्जो नहीं दी। इन्हें विश्व कप का 'छोटा मैच' आंका गया लेकिन इन मैचों का अंत इतना रोमांचक था कि क्रिकेट में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखने वाले व्यक्ति को भी अपना टीवी सेट खोलना पड़ा। इसके उलट जिन्हें 'बड़ा मैच' कहकर मीडिया जगत मुंह फाड़ फाड़कर चिल्ला रहा था और क्रिकेट विश्लेषक अपना पांडित्य झाड़ रहे थे, उनमें से अधिकतर एकतरफा और नीरस साबित हुए हैं। मसलन न्यूजीलैंड और श्रीलंका, आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड, भारत और पाकिस्तान, न्यूजीलैंड और इंग्लैंड, पाकिस्तान और वेस्टइंडीज, भारत और दक्षिण अफ्रीका तथा दक्षिण अफ्रीका और वेस्टइंडीज जैसे बड़े मैचों में आखिर में कोई रोमांच नहीं बचा था। इन मैचों में आखिर तक टीवी सेट पर जो लोग चिपके रहे उनमें से अधिकतर पर क्रिकेट नहीं भावनाएं हावी थी।
        भारत और पाकिस्तान मैच को लेकर तो इतना अधिक हाइप बना दिया गया था कि एडिलेड जंग का मैदान बन गया। आखिर में यह मैच एकतरफा साबित हुआ। भारत ने 76 रन से आसानी से जीत दर्ज की। भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच मेलबर्न में खेले गये मैच की कहानी भी ऐसी ही थी। भारत ने दक्षिण अफ्रीका को 130 रन से पीटा और सुनील गावस्कर जैसे दिग्गजों को कहना पड़ा कि उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैच इस कदर एकतरफा होगा।
     ये दो मैच ही क्यों। विश्व कप के उदघाटन मैच में न्यूजीलैंड ने श्रीलंका को 98 रन से हराया तो दो चिर प्रतिद्वंद्वियों के बीच मुकाबले में आस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को 111 रन से रौंदकर इसे एकतरफा बना दिया। जब न्यूजीलैंड का मुकाबला इंग्लैंड से हुआ तो तब किसी भी समय ऐसा नहीं लगा कि दुनिया की चोटी की आठ टीमों में शामिल दो टीमें आमने सामने हैं। इंग्लैंड की टीम 123 रन पर ढेर हो गयी और न्यूजीलैंड ने केवल 12.2 ओवर में दो विकेट खोकर लक्ष्य हासिल कर दिया। मतलब 226 गेंदें खेली जानी बाकी थी। वेस्टइंडीज ने पाकिस्तान को 150 रन से हराकर विशुद्ध क्रिकेट प्रेमियों को निराश ही किया। क्रिस गेल के दोहरे शतक से वेस्टइंडीज ने जिम्बाब्वे को भी आसानी से हराया। इसके बाद उम्मीद लगायी जा रही थी कि क्रिस गेल एंड कंपनी और डेल स्टेन एंड कंपनी के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। गेल बनाम स्टेन मुकाबले को लेकर बड़ी बड़ी बातें की गयी लेकिन आखिर में हुआ क्या। दक्षिण अफ्रीका ने पांच विकेट पर 408 रन बनाये और वेस्टइंडीज 151 रनों पर ढेर हो गया। पूरी तरह से एकतरफा मैच। ​मैच को देखने के लिये स्टेडियम में पहुंचे दर्शकों के लिये दिलासा देने वाली बात यही थी कि उन्होंने एबी डिविलियर्स की धांसू पारी अपने सामने देखी।
          ब आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड मैच की बात करें। ये दोनों पड़ोसी पिछले विश्व कप के बाद केवल एक बार एक दूसरे से भिड़े थे और उस मैच का भी परिणाम नहीं निकल पाया था। इस तरह से ये दोनों टीमें 2011 के बाद पहली बार किसी ऐसे मैच में खेली जिसका परिणाम निकला। दोनों देशों ही नहीं क्रिकेट खेलने वाले अन्य देशों में भी इस मैच को लेकर बड़ी बड़ी बातें की गयी लेकिन टिम साउथी, ट्रेंट बोल्ट और डेनियल विटोरी की गेंदबाजी त्रिमूर्ति  के सामने चार बार की चैंपियन आस्ट्रेलिया की टीम 151 रन पर ढेर हो गयी। ब्रैंडन मैकुलम ने फिर तूफानी अर्धशतक बनाया लेकिन आस्ट्रेलिया ने भी अपनी गेंदबाजी पावर का जलवा दिखाया, जिससे मैच आखिर में रोमांचक बन गया। अब भावनाओं से ओतप्रोत ही नहीं आम क्रिकेट प्रेमी भी मैच से जुड़ गया था। पहली बार किसी बड़े मैच में खिलाड़ियों के चेहरों पर तनाव दिख रहा था। केन विलियमसन ने आखिर में छक्का जड़कर न्यूजीलैंड को क्वार्टर फाइनल में पहुंचाने के साथ चैपल . हैडली ट्राफी भी दिला दी। यह ट्राफी इन दोनों टीमों के बीच वनडे मैच के विजेता को दी जाती है। न्यूजीलैंड ने 23.1 ओवर में जीत हासिल कर ली थी। लेकिन उसका केवल एक विकेट बचा था। विश्व कप में यह छठा अवसर था जबकि कोई टीम एक विकेट से जीती जिससे पता चलता है कि आखिरी क्षणों में मैच रोमांचक बन गया था। पहली बार कोई बड़ा मैच रोमांच पैदा कर ​गया लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि न्यूजीलैंड ने 161 गेंद शेष रहते हुए जीत दर्ज की। इससे उसका नेट रन रेट भी सुधरा होगा।
        लेकिन छोटे मैचों में आयरलैंड ने यूएई को जब दो विकेट से हराया तब केवल चार गेंद बची हुई थी। अफगानिस्तान ने भी स्काटलैंड को आखिरी ओवर में एक विकेट से हराया। विश्व कप में अब तक केवल ये ही दो मैच ऐसे हुए हैं जिन्होंने आखिरी क्षणों तक क्रिकेट प्रेमियों की सांसें थाम रखी थी। इसके अलावा जब एक बड़ी और एक छोटी टीम आमने सामने थी तब भी मैच में कुछ रोमांच देखने को मिला। आयरलैंड ने तो वेस्टइंडीज को हराकर उलटफेर भी किया। जिम्बाब्वे ने दक्षिण अफ्रीका को परेशान किया। यूएई और जिम्बाब्वे का मैच आखिर पलों तक रोमांचक बना रहा। अफगानिस्तान ने भी श्रीलंका को 49वें ओवर तक मैच खींचने के लिये मजबूर किया। जिस न्यूजीलैंड ने श्रीलंका, इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया को करारी शिकस्त दी उसे ही स्काटलैंड के खिलाफ जीत के लिये संघर्ष करना पड़ा। अब आप ही बताईये कि कौन मैच 'बड़ा' था और कौन 'छोटा'। छोटी टीमों का बेहतर प्रदर्शन क्रिकेट के लिये अच्छा संकेत है। आईसीसी इंग्लैंड में होने वाले अगले विश्व कप में इस टूर्नामेंट का प्रारूप बदलने और इसे दस टीमों तक सीमित करने पर विचार कर रही है लेकिन इन मैचों से उसका फैसला प्रभावित हो सकता है।

Monday, February 23, 2015

फिर बदलेगा विश्व कप का प्रारूप

                                                                                            धर्मेन्द्र पंत 
    बात विश्व कप 2007 की है। बांग्लादेश ने पहले दौर में भारत को हराकर उलटफेर कर दिया और एक अन्य ग्रुप में आयरलैंड ने पाकिस्तान को पीट दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि उपमहाद्वीप की ये दोनों टीमें पहले दौर से आगे नहीं बढ़ पायी। यह भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट प्रेमियों के लिये ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद यानि आईसीसी के लिये भी झटका था। आईसीसी का यह नंबर एक टूर्नामेंट है और इससे उसे मोटी कमाई होती है लेकिन विशेषकर भारतीय टीम के जल्दी स्वदेश लौटने के कारण विश्व कप की लोकप्रियता का ग्राफ अचानक ही नीचे गिर गया। आईसीसी की उम्मीद के मुताबिक कमाई भी नहीं हुई और तब क्रिकेट की इस सर्वोच्च संस्था को भारत का महत्व पता चल गया। अब ऐसा प्रारूप तैयार किया जाने लगा जिससे भारत कम से कम नाकआउट तक पहुंच पाये। उसके बाद मैच कितने ही बचते हैं और फिर सेमीफाइनल, फाइनल में तो सभी की दिलचस्पी बनी ही रहती है।
        इसलिए 2011 से टीमों को चार नहीं दो ग्रुप में बांट दिया गया। प्रत्येक ग्रुप में सात टीमें रखी गयी और चार टीमों के क्वार्टर फाइनल में पहुंचने का प्रावधान रखा गया। आईसीसी जो चाहता था वही हुआ। चोटी की आठ टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंची और भारत तो अपनी सरजमीं पर चैंपियन भी बन गया। इस बार आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में चल रहे विश्व कप में भी प्रारूप नहीं बदला गया। बांग्लादेश और जिम्बाब्वे जैसे टेस्ट खेलने वाले देशों सहित दोनों ग्रुप में तीन . तीन ऐसी टीमों को शामिल किया गया है जिन्हें कमजोर माना जा रहा है।
         आईसीसी फिर से चाहती  है कि आस्ट्रेलिया, भारत, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, इंग्लैंड, श्रीलंका और वेस्टइंडीज क्वार्टर फाइनल में पहुंचे। यदि ये थोड़ा सा अच्छा प्रदर्शन करें तो इनके लिये यह काम मुश्किल भी नहीं होगा। मसलन इंग्लैंड को ही लीजिए। वह अपने ग्रुप की दो मजबूत टीमों आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से बुरी तरह हार गया लेकिन अब स्काटलैंड को हराकर दौड़ में शामिल है। उसके ग्रुप में बांग्लादेश और अफगानिस्तान भी है और लग रहा है कि वह इनको हरा देगा। लेकिन एक उलटफेर होने पर आईसीसी के समीकरण बदल सकते हैं। जैसे कि आयरलैंड ने वेस्टइंडीज को हरा दिया और ऐसे में यदि वह बाकी तीन मजबूत टीमों से हार जाता और दूसरी तरफ आयरिश टीम दो अन्य कमजोर टीमों को हरा देती तो मामला गड़बड़ा जाता। इसके अलावा कई पूर्व क्रिकेटरों ने इस प्रारूप की आलोचना भी की। दर्शक भी केवल बड़े मैचों में दिलचस्पी ले रहे हैं। इसलिए अब आईसीसी को लगने लगा है कि यदि वह इस प्रारूप के साथ आगे बढ़ी तो टूर्नामेंट की लोकप्रियता पर असर पड़ सकता है।
         ईसीसी अब इंग्लैंड में 2019 में होने वाले विश्व कप के प्रारूप में बदलाव पर गंभीरता से विचार कर रही है। क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिये उसने इस टूर्नामेंट में एसोसिएट देशों को भी पर्याप्त जगह दी लेकिन ऐसे अधिकतर मुकाबले में एकतरफा रहे। इसलिए अब यह तय लग रहा है कि अगले विश्व कप में यह प्रारूप नहीं अपनाया जाएगा। आईसीसी फिर से पुरार्ने ढर्रे पर लौटने की सोच रही है। इससे पहले 1992 में जो प्रारूप था उसे दोबारा अपनाया जा सकता है। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में ही 1992 में खेले गये विश्व कप में नौ टीमों ने हिस्सा लिया। कोई ग्रुप नहीं था और सभी टीमें राउंड रोबिन आधार पर एक दूसरे से भिड़ीं और फिर जिन चार टीमों के सबसे अधिक अंक थे वे सेमीफाइनल में पहुंच गयी। भारत और आस्ट्रेलिया इन चार टीमों में शामिल नहीं थे।
            आईसीसी अब टूर्नामेंट में अधिक टीमों को शामिल करना चाहती थी और इसलिए 1996 में यह प्रारूप बदल दिया गया। छह छह टीमों के दो ग्रुप बनाये गये और प्रत्येक ग्रुप से चोटी पर रहने वाली चार टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंची। इंग्लैंड में 1999 में हुए विश्व कप में इसमें सीधे क्वार्टर फाइनल के बजाय सुपर सिक्स जोड़ दिया गया जिससे मैचों की संख्या बढ़ी। चार साल बाद 2003 में भी यही प्रारूप अपनाया गया लेकिन इस बार टीमों की संख्या बढ़कर 14 हो गयी थी यानि सात . सात टीमों के दो ग्रुप। यहां पर बड़ी टीमों के जल्द बाहर होने की संभावना बन गयी। मेजबान दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, पाकिस्तान, वेस्टइंडीज सुपर सिक्स में नहीं पहुंच पायी। इसके अलावा अंक आगे ले जाने की व्यवस्था के कारण भी यह प्रारूप जमा नहीं। इस प्रारूप को 2003 में ही विदाई दे दी गयी।  प्रारूप फिर बदल दिया गया। इस बार टीमों की संख्या भी 16 हो गयी और इसलिए चार चार टीमों के चार प्रारूप बन गये लेकिन भारत और पाकिस्तान के पहले दौर में बाहर होने से सारे योजनाएं धरी की धरी रह गयीं। तब प्रत्येक ग्रुप से दो टीमें सुपर आठ में पहुंची थी।
              अब फिर से प्रारूप बदलने जा रहा है। आईसीसी को पता चल गया है कि अधिक टीमों को शामिल करने से विश्व कप की लोकप्रियता या रोमांच नहीं बढ़ेगा। इसके उलट इन दोनों के स्तर में कमी आ रही है। इसलिए अब वह 2019 में दस टीमों को राउंड रोबिन आधार पर एक दूसरे से भिड़ाने की तैयारी कर रही है। सभी प्रारूपों पर गौर करने पर लगता है कि यह सही भी है। किसी टीम को किसी तरह का गिला शिकवा भी नहीं रहेगा। हां बारिश के कारण यदि कोई मैच रद्द होता है तो तब कुछ समीकरण गड़बड़ा सकते हैं लेकिन कुछ ऐसी चीजें होती हैं जिन पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता है और फिलहाल क्रिकेट में बारिश इन चीजों में शामिल है। जहां तक कमजोर टीमों का सवाल है तो उनके लिये टी20 विश्व चैंपियनशिप सबसे बढ़िया विकल्प है। क्रिकेट इस प्रारूप के जरिये ही दुनिया के तमाम देशों में फैलाया जा सकता है।
                                        
      

Sunday, February 15, 2015

भारत 6, पाकिस्तान 0

        भारत ने फिर 'बड़ी जीत' दर्ज की है। पाकिस्तान के लिये यह सबसे बड़ी हार है। इमरान खान ने 1992 में पाकिस्तान को विश्व कप दिलाया था लेकिन यही वह साल था जब ​क्रिकेट महाकुंभ में भारत ने पहली बार अपने इस चिर प्रतिद्वंद्वी को हराया था और तब यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। छह मैच और सभी में जीत, महज संयोग नहीं है। महेंद्र सिंह धौनी भले ही कह रहे थे कि पिछले रिकार्ड मायने नहीं रखते लेकिन पाकिस्तान के मामले में वह भी पिछले आंकड़ों का महत्व समझते होंगे। पाकिस्तान पर बहुत बड़ा बोझ है इन आंकड़ों का। अगर ऐसा नहीं होता तो उसके खिलाड़ी हर बार विश्व कप मैच से पहले इन आंकड़ों और इन्हें पलट देने की बात नहीं करते। असल में उसके खिलाड़ी मैच से पहले ही इन आंकड़ों के बोझ तले दबे होते हैं और भारत को इसका पूरा लाभ मिलता है। 
            पाकिस्तान और वहां ​के क्रिकेट प्रेमियों की हालत ऐसी हो गयी है कि यदि मिसबाह उल हक की टीम इस बार जीत जाती तो वह मिसबाह को इमरान से बड़ा हीरो बना देती। भारत की स्थिति भी इससे हटकर नहीं है। आप तमाम सोसल साइट्स पर पिछले दिनों की पोस्ट देख लीजिए। लबोलुबाब एक ही था। भारत विश्व कप का खिताब नहीं जीत पाये गम नहीं लेकिन वह पाकिस्तान से नहीं हारना चाहिए। भारत जीता तो हर तरफ पटाखों की गूंज थी। इस विश्व कप के दौरान शायद ये पटाखे अब भारत के फिर से विश्व कप जीतने पर ही सुनने को मिलें। भारत और पाकिस्तान की इस आपसी जंग को आईसीसी से लेकर बीसीसीआई तक सभी भुनाते हैं। क्रिकेट प्रशासन से जुड़ा हर शख्स चाहता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में खटास बनी रहे क्योंकि ​इस तरह के मैचों में रिश्तों की यही खटास उन्हें मोटा माल दिला देती है। आईसीसी को जितना फायदा भारत और पाकिस्तान के मैच से होती है उतनी किसी अन्य मैच से नहीं। मैच के प्रसारक भी मालामाल हो जाते हैं, इसलिए वह मैच से पहले ऐसे विज्ञापन तैयार करता है जिनमें खटास साफ नजर आती है। ऐसे में यह कहना कि क्रिकेट भारत और पाकिस्तान के दिलों को जोड़ता है या करीब लाता है, बेमानी हो जाता है। असलियत तो यह है कि जब भारत और पाकिस्तान क्रिकेट मैदान पर आमने सामने होते हैं तब सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच कटुता अधिक बढ़ जाती है। इसलिए रवि शास्त्री ने एक बार कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच के मैच किसी जंग से कम नहीं।

           र भारत ने फिर से जंग जीत ​ली है। पहली बार उसका पाकिस्तान की ऐसी टीम से मुकाबला था जो असल में मुकाबले में दिख ही नहीं रही थी। उनके हाव भाव से किसी भी समय ऐसा नहीं लगा कि यह वास्तव में पाकिस्तान की वही टीम है जिसके खिलाड़ियों को भारतीय दुश्मन नजर आते थे। भारतीयों के हाव भाव भी बदले हुए थे। अंतर इतना था कि भारतीय खिलाड़ियों में जीत की ललक थी। यह अच्छा संकेत है। यदि खिलाड़ी खेल भावना से खेलते हैं और इसे जंग के बजाय एक आम क्रिकेट मैच की तरह लेकर चलते हैं तो संभवत: प्रशंसक भी इस बात को समझेंगे।
    मैच की बात करें तो यह सभी जानते हैं कि पाकिस्तान के बल्लेबाज नहीं चले लेकिन मैच में सबसे बड़ा अंतर क्षेत्ररक्षकों ने पैदा किया। पाकिस्तानी क्षेत्ररक्षकों ने शुरू से कैच टपकाये जबकि भारत की तरफ से कुछ मुश्किल कैच लपके गये। उन्होंने फिर से 'लपको कैच, जीतो मैच' को सही साबित किया। भारतीय गेंदबाजों को इस प्रदर्शन से फूल कर कुप्पा होने की जरूरत भी नहीं क्योंकि उनकी असली परीक्षा नहीं हुई। उनकी अग्निपरीक्षा तो अगले रविवार को होगी जबकि दक्षिण अफ्रीका के दमदार बल्लेबाज उनके सामने होंगे। जयहिन्द।। 

                                                                                         धर्मेन्द्र पंत 

Sunday, February 8, 2015

अबकी बार, छक्कों की नहीं होगी भरमार

                                                                 धर्मेन्द्र मोहन पंत 
         किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल दोनों को छह छक्कों की जरूरत है। नहीं . नहीं गलत मत समझिये। मेरे कहने का मतलब है कि जिसकी तरफ से छह छक्के पड़ गये उसका बेड़ा पार। छह छक्के मतलब 36 और मैंने सुना है कि दिल्ली में बहुमत के लिये इसी संख्या की जरूरत है। इसलिए आजकल किरण और केजरीवाल छह छक्कों के लिये दुआ कर रहे होंगे। ये छक्के होते बड़े दिलचस्प हैं। किसी को छक्का कह दो तो वह आप पर छक्का जमाने आ जाएगा। कोई छक्का पड़ने पर दुखी होता है तो कोई छक्का जड़ने पर फूल कर कुप्पा हो जाता है। फटाफट क्रिकेट जिसे कभी पाजामा क्रिकेट कहते थे उसने छक्कों का महत्व बहुत बढ़ा दिया है। अब देखिये विश्व कप नजदीक है और वहां प्रत्येक बल्लेबाज चाहेगा कि वह छक्का जड़े। लेकिन भाईयों और बहनों इस बार छक्का लगाना इतना आसान नहीं होगा। यह भारत, पाकिस्तान या वेस्टइंडीज के छुटभैये मैदान नहीं आस्ट्रेलिया के मोटे ताजे मैदान हैं और फिर आईसीसी भी बल्लेबाजों पर नकेल कसने की तैयारी कर रही है। विश्व कप में छक्कों की दास्तान भी बड़ी रोचक रही है। बस आगे पढ़ते रहिये। 
गेल और अफरीदी ... सिक्सर किंग
    कहा जाता है कि आस्ट्रेलिया के एडेन ब्लिजार्ड ने एक बार विक्टोरिया की तरफ से घरेलू मैच में सबसे लंबा छक्का जड़ा था। शाहिद अफरीदी और क्रिस गेल ने भी कुछ अवसरों पर पर गेंद को स्टेडियम के बाहर भेजी है लेकिन ऐसे शाट इक्के दुक्के ही देखने को मिलते हैं। आगामी विश्व कप में भी ऐसे कुछ शाट देखने को मिल जाएं क्योंकि इतना तो तय है कि बल्लेबाजों के लिये वेस्टइंडीज या भारतीय उपमहाद्वीप की तरह आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में छक्के जड़ना आसान नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद इस बार जो तैयारियां कर रही है उससे लग रहा है कि विश्व कप 2015 में छक्के जड़ने के लिये बल्लेबाजों को अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। आईसीसी का मानना है कि एकदिवसीय मैचों में संतुलन कुछ हद तक बल्लेबाजों में पक्ष में बन गया है और पलड़ा बराबरी पर लाने की कवायद में वह सीमा रेखा यानि बाउंड्री की दूरी 90 गज तक करने के बारे में सोच रही है। मतलब साफ है कि 2007 में वेस्टइंडीज में खेले गये विश्व कप में एक टूर्नामेंट में सर्वाधिक छक्के का जो रिकार्ड बना था वह कम से कम इस बार तो नहीं टूटने वाला। रिकार्ड के लिये बता दें कि विश्व कप 2007 में 373 छक्के पड़े थे।
          आस्ट्रेलिया के बड़े मैदानों पर छक्के जड़ना आसान काम नहीं है। वेस्टइंडीज और भारतीय उपमहाद्वीप में सीमा रेखाएं अपेक्षाकृत छोटी होती हैं और इसलिए यहां छक्के भी काफी पड़ते हैं। अब आप रिकार्ड उठाकर ही देख लीजिए। वेस्टइंडीज के सेंट कीट्स में विश्व कप के जो छह मैच खेले गये उनमें 70 छक्के पड़े जबकि भारत के बेंगलूर स्थित चिन्नास्वामी स्टेडियम में सात मैचों में 65 छक्के लगे। इसके विपरीत आस्ट्रेलिया की बात करें तो वहां विश्व कप के दौरान सर्वाधिक छक्के ब्रिस्बेन के गाबा मैदान पर लगे हैं और इनकी संख्या केवल आठ है। गाबा में विश्व कप के अब तक तीन मैच खेले गये हैं। न्यूजीलैंड में आकलैंड शीर्ष पर है जिसमें खेले गये विश्व कप के चार मैचों में 17 छक्के लगे हैं। यह अलग बात है कि इन दोनों देशों में आखिरी बार विश्व कप 1992 में खेला गया था। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उससे पहले 1987 में जब भारत और पाकिस्तान ने विश्व कप की संयुक्त मेजबानी की थी तब 126 छक्के लगे थे लेकिन 1992 में यह संख्या 100 पर भी नहीं पहुंच पायी थी।
धौनी और मैक्सवेल ..छक्के जड़ने में माहिर

    दि विभिन्न विश्व कप की बात करें तो वेस्टइंडीज और भारतीय उपमहाद्वीप के देशों में खेले गये टूर्नामेंट में बल्लेबाजों ने छक्के जड़ने में परहेज नहीं की लेकिन इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में उनके लिये यह काम आसान नहीं रहा। अब आप ही देख लीजिए। पहले तीन विश्व कप इंग्लैंड में खेले गये। इनमें क्रमश: 28, 28 और 77 छक्के पड़े। भारत और पाकिस्तान में 1987 में खेले गये विश्व कप में कहानी बदल गयी और पहली बार छक्कों की संख्या 100 को पार कर गयी लेकिन 1992 में लगभग 93 छक्के ही लगे। इसके बाद 1996 में जब विश्व कप फिर से भारतीय उपमहाद्वीप में लौटा तो छक्कों की संख्या 150 के करीब\पहुंच गयी। इंग्लैंड और उनके पड़ोसी देशों में 1999 में खेले गये विश्व कप में 153 छक्के लगे। दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे और कीनिया की मेजबानी में खेले गये विश्व कप में छक्कों की संख्या रिकार्ड 266 पर पहुंच गयी। यह अलग बात है कि वेस्टइंडीज में यह संख्या 373 पर पहुंचने के कारण रिकार्ड जल्द ही टूट गया। भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश की मेजबानी हुए विश्व कप 2011 में कुल 258 छक्के लगे थे।
      यदि देश की बात करें तो विश्व कप में सर्वाधिक छक्के कैरेबियाई देशों में लगे हैं यह हम पहले भी बता चुके हैं। इसके बाद भारत का नंबर आता है जहां केवल 64 मैचों में करीब 343 छक्के पड़े हैं। पाकिस्तान में 26 मैचों में 96 और श्रीलंका में 14 मैचों में 72 छक्के लगे हैं। इसके उलट आस्ट्रेलिया में 25 मैचों में केवल 44 और न्यूजीलैंड में 14 मैचों में करीब 49 छक्के लगे हैं। इंग्लैंड विश्व कप के करीब 276 और दक्षिण अफ्रीका 245 छक्कों का गवाह रहा है।
      आस्ट्रेलिया में भले ही छक्के जड़ना आसान नहीं है लेकिन उसके बल्लेबाज गेंद को सीमा रेखा पार पहुंचाने में माहिर रहे हैं। आस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों ने हर चार साल में होने वाले इस क्रिकेट महाकुंभ में 209 छक्के लगाये हैं। इसके बाद भारत (177), वेस्टइंडीज (176), न्यूजीलैंड (171), दक्षिण अफ्रीका (151), श्रीलंका (132), इंग्लैंड (112), पाकिस्तान (108), जिम्बाब्वे (74) आदि का नंबर आता है।
    यदि बल्लेबाजों की बात करें तो विश्व कप में अब तक सर्वाधिक छक्के रिकी पोंटिंग ने लगाये हैं। आस्ट्रेलिया के इस पूर्व कप्तान के नाम पर 31 छक्के दर्ज हैं। दक्षिण अफ्रीका के हर्शल गिब्स। आपको याद होगा कि उन्होंने विश्व कप 2007 में एक ओवर में छह छक्के लगाने का रिकार्ड बनाया था। गिब्स ने विश्व कप में वैसे कुल 28 छक्के जमाये हैं। भारतीय स्टार सचिन तेंदुलकर और श्रीलंका के सनथ जयसूर्या दोनों ने समान 27 . 27 छक्के लगाये हैं। वनडे में एक मैच में सर्वाधिक छक्के का रिकार्ड 16 है लेकिन विश्व कप में यह रिकार्ड आठ छक्कों का है। यह तीन खिलाड़ियों पोंटिंग, पाकिस्तान के इमरान नजीर और आस्ट्रेलिया के एडम गिलक्रिस्ट के नाम पर दर्ज है।
     तो फिर बताईये कैसे लगी विश्व कप में छक्कों की कहानी। नीचे टिप्पणी करके फीडबैक जरूर दीजिए। 

Wednesday, February 4, 2015

आलराउंडरों की भूमिका होगी अहम

        भारत 1983 में पहली बार विश्व चैंपियन बना और इसका काफी श्रेय टीम के आलराउंडरों को जाता है। कप्तान कपिल देव तब दुनिया के सर्वश्रेष्ठ आलराउंडरों की सूची में शामिल थे। मोहिंदर अमरनाथ ने अपने हरफनमौला कौशल का लाजवाब प्रदर्शन किया तथा सेमीफाइनल और फाइनल में आलराउंड खेल के दम पर मैन आफ द मैच बने। मदनलाल ने गेंदबाजी में तो अच्छा प्रदर्शन किया ही, वह अच्छे बल्लेबाज भी थी। रवि शास्त्री की आलराउंड क्षमता पर किसी को शक नहीं होना चाहिए।  रोजर बिन्नी अच्छे स्विंग गेंदबाज थे लेकिन जरूरत पड़ने पर रन बना सकते थे। टीम में कीर्ति आजाद भी थे जो मुख्य रूप से बल्लेबाज के रूप में लिये गये थे लेकिन उनकी आफ स्पिन भी कुछ अवसरों पर कारगर साबित हुई। इसके 28 साल बाद 2011 में भारत को​ फिर से विश्व कप दिलाने में आलराउंडरों की भूमिका अहम रही। युवराज सिंह ने गेंद और बल्ले से गजब का प्रदर्शन किया तथा मैन आफ द सीरीज बने। उन्होंने 90.50 की औसत 362 रन बनाये और 25.13 की औसत से 15 विकेट लिये थे। युवराज ने तब भारत को आलराउंडर की कमी नहीं खलने दी थी। अब विश्व कप 2015 में यह भूमिका निभाने के लिये रविंद्र जडेजा और स्टुअर्ट बिन्नी को टीम में चुना गया है। विश्व कप में भारतीय खिलाड़ियों से अवगत कराने की अपनी कड़ी में आज हम इन दोनों से आपका परिचय कराते हैं। 
  
रविंद्र जडेजा : फिर बनना होगा रॉकस्टार 
      
आस्ट्रेलिया के महान स्पिनर शेन वार्न ने आईपीएल में राजस्थान रायल्स के लिये कुछ युवा खिलाड़ियों की फौज तैयार की थी। इनमें रविंद्र जडेजा भी शामिल थे जिन्हें अपनी काबिलियत पर इतना भरोसा था कि वार्न ने उन्हें 'रॉकस्टार' नाम दे दिया। अपनी योग्यता पर विश्वास का ही नतीजा था कि उन्हें बीच में आईपीएल से बाहर भी होना पड़ा लेकिन वे एक अपरिपक्व खिलाड़ी का शुरूआती दौर था जो जिंदगी में भी कुछ विषम पलों से गुजर चुका था। इस बीच जडेजा को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण का मौका भी मिल गया। जडेजा 2009 से भारतीय वनडे टीम का अहम हिस्सा रहे, लेकिन विश्व कप 2011 में युवराज सिंह की उपस्थिति के कारण उन्हें टीम में जगह नहीं मिल पायी थी।
       श्रीलंका के खिलाफ अपने दूसरे वनडे में ही नाबाद 60 रन बनाने वाले जडेजा भले ही निरंतर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाये लेकिन अपनी हरफनमौला काबिलियत के कारण वह टीम के लिये उपयोगी बने रहे। यदि वह बल्ले से अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाये तो उन्होंने गेंद से कमाल दिखाया। यही वजह थी कि चेन्नई सुपरकिंग्स ने जडेजा पर 20 लाख डालर खर्च कर दिये थे। रणजी ट्राफी में जडेजा ने लंबी पारियां खेलने की अपनी क्षमता का परिचय तीन तिहरे शतक लगाकर दिया। जडेजा को दिसंबर 2012 में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण का भी मौका मिल गया। बायें हाथ के स्पिनर के रूप में उन्होंने आस्ट्रेलिया के खिलाफ घरेलू श्रृंखला में बेहतरीन प्रदर्शन किया और 17.45 की औसत से 24 विकेट लिये। जडेजा ने इस दौरान स्पिन गेंदबाजी खेने में सक्षम माने जाने वाले माइकल क्लार्क को पांच बार पवेलियन की राह दिखायी। भारत ने यह सीरीज 4—0 से जीती थी।
      इस बीच जडेजा ने वनडे में अपनी गेंदबाजी का कमाल दिखाया और आईसीसी एकदिवसीय रैंकिंग में नंबर एक गेंदबाज बने। वह अनिल कुंबले के बाद दूसरे भारतीय थे जो वनडे गेंदबाजी रैंकिंग में शीर्ष पर पहुंचे थे। जडेजा यदि फार्म में हों तो अपनी आलराउंड क्षमता के कारण किसी भी टीम के लिये उपयोगी साबित हो सकते हैं। यही वजह है कि भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धौनी ने जडेजा के चोटिल होने के बावजूद उन्हें विश्व कप टीम में लेने का दांव खेला। अब जडेजा फिट हैं लेकिन विश्व कप से पहले उन्हें मैच फिट भी होना होगा। उनकी मौजूदगी में भारतीय बल्लेबाजी को मजबूती मिलेगी। उन्हें नंबर सात या आठ पर बल्लेबाजी के लिये उतरना है। इस नंबर के बल्लेबाज को तेजी से रन बनाने पड़ सकते हैं। उन्हें ऐसे में अच्छा फिनिशर बनना होगा। वह लंबे हिट लगाने में सक्षम हैं तथा आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बड़े मैदानों में भी बड़े शाट खेलने में उन्हें दिक्कत नहीं आनी चाहिए। गेंदबाजी में उनकी 'फ्लाइट' बल्लेबाजों को परेशानी में डाल सकती है।
     इंग्लैंड में चैंपियन्स ट्राफी में उनकी गेंदबाजी काफी कारगर साबित हुई थी। जडेजा ने तब पांच मैचों में 12 विकेट हासिल किये थे। वेस्टइंडीज के खिलाफ ओवल में उन्होंने 36 रन देकर पांच विकेट लिये थे जो वनडे में उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी है। सौराष्ट्र के इस 26 वर्षीय क्रिकेटर ने अब तक 111 वनडे मैच खेले हैं जिनमें उन्होंने 33.92 की औसत और दस अर्धशतकों की मदद से 1696 रन बनाये हैं और 32.76 की औसत से 134 विकेट लिये हैं।

स्टुअर्ट बिन्नी : आलोचकों को देना होगा जवाब 
    
विश्व कप के लिये जो 15 सदस्यीय टीम चुनी गयी उसमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम स्टुअर्ट बिन्नी का था। बिन्नी के पिता और पूर्व भारतीय आलराउंडर रोजर बिन्नी चयन समिति के सदस्य ​हैं और यही मान लिया गया कि बेटे के चयन में पिता की भूमिका अहम रही। रोजर ने हालांकि साफ किया था कि जब स्टुअर्ट का नाम चर्चा में आया तो वह बैठक से उठकर बाहर आ गये थे। बिन्नी के चयन पर बहस लाजिमी थी क्योंकि कर्नाटक के इस आलराउंडर ने तब तक केवल छह वनडे मैच खेले थे और जिनमें विशेषकर महेंद्र सिंह धौनी ने कप्तान रहते हुए उनका सही उपयोग नहीं किया था। एक उदाहरण पिछले साल हैमिल्टन में खेले गये वनडे मैच का ले सकते हैं। इस मैच में बिन्नी को बल्लेबाजी का मौका नहीं मिला। धौनी ने उनके बजाय आर अश्विन को पहले बल्लेबाजी के लिये भेज दिया था। इसके बाद बिन्नी से केवल एक ओवर की गेंदबाजी करवायी गयी जिसमें उन्होंने आठ रन दिये थे। इसके उलट अंबाती रायुडु को तीन ओवर दिये गये थे। हाल में त्रिकोणीय श्रृंखला में पर्थ में इंग्लैंड के खिलाफ मैच में बिन्नी भारत के सबसे सफल गेंदबाज रहे लेकिन धौनी ने उनसे ओवर का कोटा पूरा नहीं करवाया। क्या धौनी अब भी उन पर विश्वास नहीं करते। यदि इसका जवाब हां में है तो फिर विश्व कप से पहले यह अच्छे संकेत नहीं हैं। उम्मीद है कि ऐसा नहीं होगा। सुनील गावस्कर के शब्दों में, ''लगता है कि धौनी में आइडियाज की कमी हो गयी है। ''
     गावस्कर पहले पूर्व क्रिकेटर थे जिन्होंने बिन्नी के चयन पर कतई हैरानी नहीं जतायी थी। उनका मानना था कि कर्नाटक के इस आलराउंडर की सीम गेंदबाजी आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की पिचों पर कारगर साबित होगी। इसके अलावा वह निचले क्रम में जरूरत पड़ने पर रन भी बना सकते हैं। त्रिकोणीय श्रृंखला के कुछ मैचों में उनकी यह बात सही साबित भी हुई। इंग्लैंड के खिलााफ ब्रिस्बेन में जब चोटी के बल्लेबाज नहीं चल पाये थे तब बिन्नी ने सर्वाधिक 44 रन बनाये और बाद में भारत की तरफ से एकमात्र विकेट लिया। इसी टीम के खिलाफ पर्थ में उन्होंने गेंदबाजी का आगाज करते हुए आठ ओवर में 33 रन देकर तीन विकेट लिये थे। बिन्नी की खासियत यह है कि वह 'विकेट टु विकेट' गेंदबाजी करते हैं और बल्लेबाज को खुलकर खेलने के लिये जगह नहीं देते हैं। बिन्नी ने खुद को सीमित ओवरों के विशेषज्ञ के तौर पर स्थापित किया है लेकिन बीच में  इंडियन क्रिकेट लीग के जुड़ने के कारण उनका करियर डांवाडोल हो गया था। उन्हें पिछले साल इंग्लैंड में तीन टेस्ट खेलने का मौका भी मिला लेकिन गेंदबाज के रूप में उनका भरपूर उपयोग नहीं किया गया जिसके कारण अब भी बिन्नी को अपने पहले टेस्ट विकेट की दरकार है। 
       बिन्नी 30 वर्ष के हैं लेकिन उन्हें अब तक केवल नौ वनडे खेलने का मौका मिला है। इनमें उन्होंने 18.20 की औसत से 91 रन बनाये हैं और 14.15 की औसत से 13 विकेट लिये हैं। उनका इकोनोमी रेट 4.52 है। जाहिर है कि बल्लेबाजों को उनकी सटीक गेंदबाजी पर रन बनाने में परेशानी होती है। बिन्नी का वनडे में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन चार रन देकर छह विकेट है जो उन्होंने पिछले साल बांग्लादेश के खिलाफ ढाका में किया था। बिन्नी भी पहली बार विश्व कप में भाग लेंगे। उनके पिता रोजर बिन्नी ने 1983 विश्व कप में 17 विकेट लेकर भारत की खिताबी जीत में अहम भूमिका निभायी थी। उम्मीद है कि स्टुअर्ट अपने पिता के इस प्रदर्शन से प्रेरणा लेंगे। वह भारत की तरफ से विश्व कप में खेलने वाली पिता पुत्र की पहली जोड़ी भी होगी।
                                                             धर्मेन्द्र मोहन पंत 

Tuesday, February 3, 2015

तीनों जिम्मेदारियों में खरा उतरना होगा सेनापति धौनी को


 ज से ठीक दस साल पहले 23 दिसंबर 2003 को देश के दो नये नवेले राज्यों उत्तराखंड और झारखंड से ताल्लुकात रखने वाला एक युवा खिलाड़ी बांग्लादेश के चटगांव में पहली बार भारत की तरफ से खेलने के लिये उतरा और पहली गेंद पर ही आउट होकर पवेलियन लौट गया। बात आयी गयी हो गयी। नया खिलाड़ी है। कौन तवज्जो देता है।
     लेकिन यह खिलाड़ी यानि महेंद्र सिंह धौनी हार मानने वाला नहीं था। चार महीने के अंदर देश ही नहीं विदेशी क्रिकेट प्रेमियों की जुबान पर भी उनका नाम चढ़ गया। दिन था पांच अप्रैल 2005 और स्थान था विशाखापट्टनम। भारत और पाकिस्तान आमने सामने थे। धौनी क्रीज पर उतरते हैं और फिर पाकिस्तानी गेंदबाजों को धुन डालते हैं। इस बल्लेबाजी कौशल में ताकत का मिश्रण था। बल्ला बिजली की गति से घूमता और गेंद करारा प्रहार झेलकर बाउंड्री ढूंढने लग जाती। कुल 123 गेंदों पर 148 रन धौनी के बल्ले से निकले जिसमें 15 चौके और पांच छक्के शामिल थे।
    भारत को ऐसे ही विकेटकीपर बल्लेबाज की तलाश थी और धौनी ने भी इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। जयपुर में 31 अक्तूबर 2005 को श्रीलंका के खिलाफ उन्होंने जो 183 रन की पारी खेली थी वह आज भी किसी विकेटकीपर का वनडे में सर्वोच्च स्कोर है। उन्हें पहली बार 2007 में दक्षिण अफ्रीका में खेली गयी पहली विश्व टी20 चैंपियनशिप में टीम की कमान सौंपी गयी। भारत उस टूर्नामेंट में चैंपियन बना।
    इसके एक साल बाद धौनी तीनों प्रारूपों में भारत के कप्तान बन गये और यह कहा जा सकता है कि तब भारतीय क्रिकेट उनके इशारों पर नाचने लगा। इस बीच उन्होंने अच्छे परिणाम भी दिये। भारत को वनडे और टेस्ट क्रिकेट में दुनिया की नंबर एक टीम बनवाया और 2011 में उनकी अगुवाई में भारत 28 साल बाद फिर से विश्व कप जीतने में सफल रहा। इसके दो साल बाद धौनी दुनिया के पहले ऐसे कप्तान बन गये जिनकी अगुवाई में टीम ने टी20 विश्व चैंपियनशिप, वनडे विश्व कप और चैंपियन्स ट्राफी जीती। वह आज भारत के सबसे सफल कप्तान हैं।
    धौनी अब टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं। निश्चित रूप से उन्होंने यह फैसला सीमित ओवरों की क्रिकेट में अधिक ध्यान देने के लिये किया। उनकी असली परीक्षा हालांकि विश्व कप में होगी जहां उनके पास ऐसी टीम है जिसके खिलाड़ी प्रतिभाशाली तो हैं लेकिन उनमें अनुभव की कमी है। धौनी को फिर से अपनी तीन भूमिकाओं कप्तान, विकेटकीपर और बल्लेबाज के रूप में खरा उतरना होगा। उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फिनिशर में से एक माना जाता है और निचले क्रम में बल्लेबाजी का दारोमदार उन पर ही रहेगा।
    धौनी ने अब तक 254 वनडे मैचों में 52.29 की औसत से 8262 रन बनाये हैं, जिसमें नौ शतक और 56 अर्धशतक शामिल हैं। उनके नाम पर विकेटकीपर के रूप में 229 कैच और 85 स्टंप शामिल हैं। इससे पहले धौनी 2007 और 2011 विश्व कप में भाग ले चुके हैं जिनके 12 मैचों में उन्होंने 33.75 की औसत से 270 रन बनाये और उनका उच्चतम स्कोर नाबाद 91 रन है। यह विश्व कप में धौनी की 50 से अधिक रनों की एकमात्र पारी है।  
                                                          धर्मेन्द्र मोहन पंत

Monday, February 2, 2015

भारत की विश्व कप टीम में मध्यक्रम के महारथी

भारतीय टीम के नये 'मिस्टर भरोसेमंद' विराट कोहली
  
ह दिसंबर 2006 की सर्द रात थी जब तड़के तीन बजे दिल्ली के 18 वर्षीय बल्लेबाज विराट कोहली के पास घर से फोन आता है कि उसके पिता इस दुनिया में नहीं रहे। कर्नाटक के खिलाफ रणजी मैच में दिल्ली पर फालोआन का संकट मंडरा रहा था और कोहली पिछले दिन 40 रन बनाकर खेल रहे थे। वह अपनी पारी आगे बढ़ाये या नहीं इसके लिये कोहली आस्ट्रेलिया दौरे पर गये अपने कोच राजकुमार शर्मा को फोन करता है और उनकी सलाह पर बल्लेबाजी जारी रखने का फैसला करता है। कोहली 90 रन बनाकर दिल्ली को फालोआन से बचाता है और उसके बाद सीधे अपने पिता की अंत्येष्टि में शामिल होने के लिये चला जाता है। कोहली की मां के शब्दों में, ''विराट उस दिन के बाद कुछ बदल गया। रातों रात वह परिपक्व बन गया। वह प्रत्येक मैच को गंभीरता से लेना लगा। उसे बेंच पर बैठना कतई पसंद नहीं था।''
     कोहली यानि वह शख्स जो आक्रामक क्रिकेट खेलना पसंद करता है। मैदान पर अपनी भावनाओं को खुलकर इजहार करने के कारण आलोचकों के निशाने पर रहता है और जिस पर दंभी होने के आरोप भी लगते रहते हैं लेकिन इन सबसे बढ़कर वह एक बेहतरीन बल्लेबाज है जो हर तरह का शाट खेलने में माहिर है और किसी भी तरह के आक्रमण के सामने और कैसी भी परिस्थितियों में रन बनाना जानता है। दबाव में अच्छा प्रदर्शन करने में कोहली का सानी नहीं। लेग साइड पर उनके शाट देखने लायक होते हैं। इसलिए तो वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में दनादन शतक ठोक रहे हैं और रनों का अंबार लगा रहे हैं। कोहली अभी केवल 25 साल के हैं और उनके नाम पर वनडे में 150 मैचों में 6232 रन दर्ज हैं। कोहली ने ये रन 51.50 की औसत से बनाये हैं जिसमें 21 शतक और 33 अर्धशतक शामिल हैं। वह वनडे में सबसे तेज 6000 रन पूरे करने वाले बल्लेबाज हैं।
     यही कोहली आज भारतीय​ क्रिकेट का अहम अंग है। यहां तक महेंद्र सिंह धौनी के टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद वह टेस्ट टीम के कप्तान बन चुके हैं और आने वाले समय में उन्हें तीनों प्रारूपों की कप्तानी सौंपी जा सकती है। कोहली के नेतृत्व में भारत ने 2008 में अंडर . 19 विश्व कप जीता और 2011 में भारत को वनडे का विश्व चैंपियन​ बनाने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभायी। कोहली ने भारत के पहले मैच में ही शतक जड़ा और फिर फाइनल में भी 35 रन की महत्वपूर्ण पारी खेली थी। इसके बाद आस्ट्रेलियाई दौरे में जब भारत के कई दिग्गज बल्लेबाज रन बनाने के लिये जूझ रहे थे तब उन्होंने एडिलेड में 116 रन की जोरदार पारी खेलकर टेस्ट मैचों में अपना स्थान पक्का किया था। इसके बाद उन्होंने त्रिकोणीय श्रृंखला में भी शानदार खेल दिखाया। हाल में आस्ट्रेलिया के खिलाफ चार टेस्ट मैचों की श्रृंखला में कोहली ने चार शतकों की मदद से 692 रन बनाये। इसके बाद त्रिकोणीय श्रृंखला में उनका बल्लेबाजी क्रम बदलना भारत का महंगा पड़ा और वह अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाये लेकिन यह तय है कि विश्व कप में भारतीय बल्लेबाजी का दारोमदार उन पर ही टिका रहेगा। कोहली पिछली बार की विश्व कप विजेता टीम के सदस्य थे। कोहली ने विश्व कप 2011 में सभी नौ मैच खेले थे जिसमें उन्होंने 35.25 की औसत से 282 रन बनाये थे। इसमें एक शतक और एक अर्धशतक शामिल है।

सुरेश रैना : आस्ट्रेलिया में सुधारना होगा रिकार्ड 
      
पिछले लगभग दस साल से भारतीय एकदिवसीय टीम के अहम अंग रहे हैं सुरेश रैना। भारतीय टीम के पूर्व कोच ग्रेग चैपल उन्हें बेहद प्रतिभाशाली मानते थे लेकिन बायें हाथ का यह बल्लेबाज शुरूआती वर्षों में अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया। यह कह सकते हैं कि 2005 में पदार्पण के बाद अगले तीन चार वर्ष तक बड़ी पारी खेलने के लिये तरसते रहे।
       रैना के बारे में शुरू से कहा जाता रहा कि वह शार्ट पिच गेंदों को सही तरह से नहीं खेल पाते लेकिन इसके बावजूद अपने जज्बे, धाराप्रवाह बल्लेबाजी करने की कला और चपल क्षेत्ररक्षण के कारण उन्होंने भारतीय टीम में अपनी जगह बनाये रखी। सुविधाओं के लिये तरसते उत्तर प्रदेश के स्पोर्ट्स हास्टल से निकले बायें हाथ का यह बल्लेबाज हालांकि खाली स्थानों से गेंद निकालकर रन बनाने में माहिर है। पाकिस्तान में 2008 में खेले गये एशिया कप में रैना ने दो शतक जड़कर बड़ी पारियां खेलने की शुरूआत की थी। उन्हें 2010 में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण का मौका मिला और पहले मैच में ही शतक बनाने में सफल रहे लेकिन यहां भी वह अपनी फार्म को बनाये रखने में नाकाम रहे और पिछले साढ़े चार साल में उनके नाम पर केवल 18 टेस्ट मैच दर्ज हैं।
            रैना के साथ भी अभी फार्म की दिक्कत जुड़ गयी है। आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला में उन्हें केवल एक टेस्ट मैच खेलने का मौका मिला जिसकी दोनों पारियों में वह खाता नहीं खोल पाये। इसके बाद त्रिकोणीय श्रृंखला के शुरू में उन्होंने मेलबर्न में 51 रन की पारी खेली लेकिन अगली दो पारियों में वह एक . एक रन ही बना पाये। मध्यक्रम में कोहली के बाद रैना को सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज माना जा रहा है लेकिन यदि पिछले कुछ मैचों की तरह इनाम में अपने विकेट देते रहे तो भारत की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। रैना को संयम बरतकर खेलने की जरूरत है, क्योंकि यह सभी जानते हैं कि जब वह क्रीज पर टिक जाते हैं और उनका बल्ला चलने लगता है तो फिर गेंद लगातार सीमा रेखा के दर्शन करती है।
      उत्तर प्रदेश के यह बल्लेबाज विश्व कप 2011 की चैंपियन टीम ​का हिस्सा था। हालांकि तब उन्हें केवल चार मैच खेलने का मौका मिला था जिसमें उन्होंने 74 रन बनाये थे। रैना ने विश्व कप से पहले तक कुल 207 वनडे मैच खेले हैं जिसमें उन्होंने 35.44 की औसत से 5104 रन बनाये हैं। उनके नाम पर चार शतक और 33 अर्धशतक दर्ज हैं। इस 28 वर्षीय बल्लेबाज का हालांकि आस्ट्रेलिया में रिकार्ड आकर्षक नहीं है जहां उन्होंने 12 मैचों में 23.50 की औसत से 235 रन बनाये हैं।

अंबाती रायुडु : चयन सही साबित करने की चुनौती 
  
वीवीएस लक्ष्मण और हरभजन सिंह की नजर में अंबाती रायुडु विशेष प्रतिभा का धनी है लेकिन वह अभी तक अपनी प्रतिभा के साथ पूरी तरह न्याय नहीं कर पाये हैं। उन्होंने शुरू से बहुत जल्दी परिणाम हासिल करने के प्रयास में अपना करियर भी दांव पर लगा दिया था। अपने करियर के शुरू में कभी कोच तो कभी अंपायरों के साथ मतभेदों के कारण वह परेशानी में पड़े और ऐसे में जिस बल्लेबाज को प्रतिभाशाली माना जाता था उसका करियर दांव पर लग गया। इंडियन क्रिकेट लीग ने रही सही कसर पूरी कर दी। रायुडु इससे जुड़ गये और इससे उनका राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने का सपना भी टूटता हुआ दिखने लगा। आखिर में बीसीसीआई ने आईसीएल से जुड़े खिलाड़ियों को राहत दी और उन्हें वापसी का मौका दिया। रायुडु ने हैदराबाद के बजाय बड़ौदा से खेलना शुरू कर दिया।

    अपनी प्रवाहमय बल्लेबाजी और स्ट्रोक लगाने में कुशलता के कारण रायुडु को आखिर 2013 में जिम्बाब्वे दौरे में भारत की तरफ से खेलने का मौका मिल गया। उन्होंने अपने पहले मैच में ही अर्धशतक जड़कर शानदार आगाज किया लेकिन इसके बाद अंदर बाहर होते रहे। पिछले साल श्रीलंका के खिलाफ अहमदाबाद में नाबाद 121 रन बनाकर उन्होंने विश्व कप टीम में अपनी जगह सुनिश्चित की। आस्ट्रेलिया में त्रिकोणीय श्रृंखला में वह अवसरों का सही तरह से फायदा उठाने में नाकाम रहे। तीनों मैचों में क्रीज पर समय बिताने के बाद वह 23, 23 और 12 रन बनाकर पवेलियन लौटे। विश्व कप में मध्यक्रम में उन्हें नाजुक मौकों पर बल्लेबाजी करनी पड़ सकती है और 29 वर्षीय रायुडु को इसके लिये तैयार रहना चाहिए। रायुडु विकेटकीपिंग भी कर लेते हैं और यदि किसी मैच में धौनी नहीं खेल पाते हैं कि तो उन्हें विकेट के आगे ही नहीं विकेट के पीछे भी अपना कौशल दिखाना होगा। जिम्मेदारियां काफी हैं देखना है कि रायुडु उस पर खरा उतर पाते हैं या नहीं। वह पहली बार विश्व कप में खेलेंगे। उन्हें अब तक केवल 27 वनडे मैच खेलने का मौका मिला जिसमें उन्होंने 41.27 की औसत से 743 रन बनाये हैं। रायुडु के नाम पर एक शतक और पांच अर्धशतक भी दर्ज हैं। 
                                                                                  धर्मेन्द्र मोहन पंत