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Sunday, February 1, 2015

विश्व कप में शीर्ष क्रम के तीन नायक


साहसी लेकिन फार्म से जूझ रहे शिखर धवन

   
भारतीय क्रिकेट टीम में जब दिल्ली के दो धुरंधर सलामी बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग और गौतम गंभीर का डंका बजता था तब दिल्ली का ही एक और ओपनर शिखर धवन घरेलू क्रिकेट और आईपीएल में अपना जलवा दिखा रहा था। लेकिन राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं होने के कारण एक समय लग रहा था कि उनका करियर भी घरेलू क्रिकेट में सिमट जाएगा। आखिर में नौ साल घरेलू क्रिकेट खेलने और प्रथम श्रेणी मैचों में 5000 से अधिक रन बनाने के बाद धवन को मार्च 2013 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ मोहाली में पहला टेस्ट मैच खेलने का मौका मिलता है और उन्होंने 187 रन ठोककर शानदार आगाज किया। इस बीच धवन ने 85 गेंदों पर शतक लगाकर पदार्पण टेस्ट में सबसे तेज सैकड़े का नया रिकार्ड बनाया।
        सहवाग और गंभीर फार्म से जूझ रहे थे और धवन ने इसका पूरा फायदा उठाया। उन्हें इंग्लैंड में चैंपियन्स ट्राफी में खेलने का मौका मिला जहां उन्होंने रोहित शर्मा के साथ कामयाब सलामी जोड़ी बना डाली। धवन ने दक्षिण अफ्रीका और वेस्टइंडीज के खिलाफ शतक भी जमाये। चैंपियन्स ट्राफी में उन्होंने 90.75 की औसत से 363 रन बनाये। वह भारतीय क्रिकेट टीम के अहम अंग बन गये। न्यूजीलैंड की सरजमीं पर टेस्ट मैचों में उन्होंने 115 और 98 रन की दो पारियां खेलकर दिखा दिया कि वह किसी भी तरह की परिस्थितियों में रन बना सकते हैं।
         लेकिन विश्व कप से पहले भारतीय टीम की सबसे बड़ी चिंता धवन बन गया है क्योंकि आस्ट्रेलियाई दौरे में उनका बल्ला कुंद पड़ा रहा। टेस्ट श्रृंखला में वह 81 रन की एक अच्छी पारी खेल पाये जबकि त्रिकोणीय श्रृंखला के चार मैचों में उनका स्कोर 2, 1, 8 और 38 रन रहा। उनकी इस फार्म को देखकर महान सुनील गावस्कर ने उनके बजाय रविचंद्रन अश्विन से पारी का आगाज कराने का सुझाव तक दे डाला। बहरहाल में वह अब भी धौनी की 'गुडबुक' में हैं और देखना होगा कि विश्व कप में मौका मिलने पर वह अपनी मूंछों पर फिर से ताव दे पाते हैं या नहीं। रिकार्ड के लिये बता दें कि धवन ने अब तक 53 वनडे मैचों में 42.75 की औसत से 2095 रन बनाये हैं जिसमें छह शतक और 11 अर्धशतक शामिल हैं। धवन का यह पहला विश्व कप होगा।

भारत का नया सलामी बल्लेबाज रोहित शर्मा 

   
कौशल से परिपूर्ण कलात्मक बल्लेबाज जिसकी तकनीक पर किसी को संदेह नहीं लेकिन यदि रोहित शर्मा के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के पहले छह साल पर गौर करें तो पता चल जाता है कि वह अवसरों का अच्छी तरह से फायदा उठाने में नाकाम रहे। यही वजह थी कि जिस रोहित को अगली पीढ़ी का बल्लेबाज माना जा रहा था वह टीम से अंदर बाहर होता रहा। इस बीच हालांकि घरेलू क्रिकेट में उन्होंने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया। चाहे 2008.09 के रणजी फाइनल की दोनों पारियों में शतक हों या फिर आईपीएल में डेक्कन चार्जर्स और बाद में मुंबई इंडियन्स की तरफ से कई शानदार पारियां। रोहित राष्ट्रीय टीम में वापसी का मार्ग प्रशस्त करते लेकिन फिर कुछ अवसरों पर सफल होते और कुछ पर नाकाम। निरंतर एक जैसा प्रदर्शन नहीं कर पाने के कारण उनका करियर उतार चढ़ाव वाला बन गया।
   इंग्लैंड में चैंपियन्स ट्राफी के दौरान सलामी बल्लेबाज के नये अवतार में उतरना रोहित के लिये वरदान साबित हुआ। उन्होंने पांच मैचों में केवल 177 रन बनाये लेकिन इस बीच शिखर धवन के साथ मिलकर टीम को अच्छी शुरूआत दिलायी। रोहित ने अक्तूबर . नवंबर 2013 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ जयपुर में नाबाद 141 रन बनाये और फिर बेंगलूर में 209 रन बनाकर वनडे में ​दोहरा शतक जड़ने वाले तीसरे बल्लेबाज बने। उनसे पहले सचिन तेंदुलकर और वीरेंद्र सहवाग ही यह कारनामा कर पाये थे। रोहित यहीं पर नहीं रूके। पिछले साल श्रीलंका के खिलाफ ईडन गार्डन्स पर वह 264 रन ठोककर वनडे में व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ पारी को उस मुकाम पर लेग गये जहां तक पहुंचना किसी भी बल्लेबाज के लिये आसान नहीं होगा।
     लेकिन रोहित की चोट भारतीय टीम के लिये बड़ा सरदर्द बनी हुई है। उन्होंने आस्ट्रेलिया में त्रिकोणीय श्रृंखला के पहले मैच में मेलबर्न में 138 रन की शानदार पारी खेली लेकिन इसके बाद चोट के कारण आगे के मैचों में नहीं खेल पाये। भारत को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा और वह इस सीरीज में एक भी मैच नहीं जीत पाया। अच्छी शुरूआत नहीं मिलने के कारण भारत की मजबूत बल्लेबाजी की पोल खुल गयी। इसलिए रोहित​ विश्व कप के भारतीय अभियान के लिये बेहद महत्वपूर्ण हैं। रोहित अब तक विश्व कप में नहीं खेले हैं लेकिन उन्हें कुल 127 वनडे मैच खेलने का अनुभव है जिसमें उनके नाम पर 3890 रन दर्ज हैं। रोहित ने छह शतक और 23 अर्धशतक भी लगाये हैं।

बल्लेबाजी में हर क्रम पर फिट अजिंक्य रहाणे 


लंबे समय तक साथी खिलाड़ियों के लिये मैदान पर पानी पहुंचाने का काम करने के बाद अजिंक्य रहाणे को मार्च 2013 में जब टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण का मौका मिला तो वह आस्ट्रेलियाई आक्रमण के सामने सात और एक रन ही बना पाये। चर्चा होने लगी कि क्या बेमिसाल और  नैसर्गिक प्रतिभा का धनी बल्लेबाज का करियर शुरू में खत्म हो जाएगा लेकिन रहाणे ने अपने काम पर ध्यान दिया। उन्होंने मुंबई की तरफ से रणजी ट्राफी और राजस्थान रायल्स की तरफ से आईपीएल में अपना अच्छा प्रदर्शन जारी रखा और जल्द ही न सिर्फ टेस्ट टीम में वापसी की बल्कि एकदिवसीय टीम के भी अहम अंग बन गये। वेलिंगटन में मुश्किल परिस्थितियों में लगाया गया शतक या फिर लाडर्स पर खेली गयी शतकीय पारी से रहाणे ने दिखाया कि उनके पास कई किताबी शाट हैं जो संकटपूर्ण स्थितियों में उन्हें सफल बनाते हैं। आस्ट्रेलिया के खिलाफ हाल में समाप्त हुई श्रृंखला में भी कोहली के अलावा किसी अन्य बल्लेबाजों ने गेंदबाजों का डटकर सामना किया तो वह रहाणे थे। मेलबर्न में उन्होंने 147 रन की दर्शनीय पारी खेली थी।
      रहाणे कई आयु वर्ग के टूर्नामेंटों में खेलते रहे हैं और यह कहा जा सकता है कि कोहली की तरह वह भी अब मंझे हुए बल्लेबाज बन गये हैं। विश्व कप में भारतीय बल्लेबाजी का काफी दारोमदार रहाणे के कंधों पर भी रहेगा। वह ऊपरी क्रम के बल्लेबाज हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्होंने मध्यक्रम में भी अच्छी बल्लेबाजी की है। यदि रोहित शर्मा फिट नहीं होते या शिखर धवन की खराब फार्म बरकरार रहती है तो फिर यह तय है कि रहाणे ही पारी का आगाज करेंगे। उन पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी पारी संवारने की रहेगी। रहाणे की विशेषता यह है कि वह पारी संवारने के साथ साथ रन गति भी अच्छी बनाये रखते हैं। जरूरत पड़ने पर लप्पेबाजी भी कर सकते हैं और अपनी रक्षात्मक तकनीक की तो अच्छी मिसाल पेश कर चुके हैं। अभी यह कहा जा सकता है कि भारतीय टीम में सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज यदि कोई है तो वह रहाणे हैं।
      रहाणे भी पहली बार विश्व कप में भाग लेंगे। यदि वनडे मैचों की बात करें तो इस 26 वर्षीय बल्लेबाज ने अब तक जो 46 मैच खेले हैं उनमें उन्होंने 1376 रन बनाये हैं। रहाणे का औसत 30.57 है जो कि उनकी क्षमता वाले बल्लेबाज के अनुकूल नहीं है। मुंबई का यह बल्लेबाज विश्व कप में निश्चित तौर पर इसमें सुधार करके भारतीय बल्लेबाजी का आधार स्तंभ बनना चाहेगा। रहाणे ने अब तक वनडे में दो शतक और आठ अर्धशतक भी लगाये हैं। 
                                                                                                                  धर्मेन्द्र मोहन पंत 


Monday, January 12, 2015

डाउन अंडर में विश्व कप के भारतीय बल्लेबाज

                                                                                       धर्मेन्द्र 
     विश्व कप के लिये भारत ने जो टीम चुनी है उसकी बल्लेबाजी मजबूत मानी जा रही है। गेंदबाजी कमजोर पक्ष है लेकिन हम यहां पर केवल बल्लेबाजों तथा आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में उनके प्रदर्शन पर गौर करेंगे। यह आंकड़ों की बिसात है जो समय, परिस्थितियों और फार्म के हिसाब से बदल भी सकती है लेकिन भारतीय बल्लेबाजों के लिये 'डाउन अंडर' यानि आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सरजमीं हमेशा चुनौती रही है और आंकड़ों पर गौर करने से भी साबित हो जाता है कि विशेषकर एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट यानि वनडे में कप्तान महेंद्र सिंह धौनी और विराट कोहली को छोड़कर विश्व कप टीम के बाकी बल्लेबाज 'डाउन अंडर' में रन बनाने के लिये जूझते रहे हैं। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की पिचें तेज होती हैं और उनमें पर्याप्त उछाल रहती है। भारत के सुरेश रैना और रोहित शर्मा जैसे बल्लेबाजों को इस तरह की पिचें रास नहीं आती हैं। यदि भारत को विश्व कप का खिताब बरकरार रखना है तो इन बल्लेबाजों को खुद को साबित करना होगा और अपने पिछले रिकार्ड में सुधार करना होगा।
रिकार्ड में सुधार करना होगा धवन, रोहित और रैना को 
     
       चलिये अब आंकड़ों की जुबानी कहानी आगे बढ़ाते हैं। बल्लेबाजी क्रम से ही आगे बढ़ते हैं। भारत के लिये अभी शिखर धवन और रोहित शर्मा वनडे में पारी का आगाज कर रहे हैं। इन दोनों ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ हाल में समाप्त हुई टेस्ट श्रृंखला में निराशाजनक प्रदर्शन किया था और 'डाउन अंडर में उनका ओवरआल रिकार्ड भी प्रभावशाली नहीं है।  आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला की छह पारियों में केवल 167 रन बनाने वाले धवन ने विश्व कप के मेजबान देशों यानि आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में अब तक केवल कीवियों की धरती पर चार वनडे खेले हैं जिनमें वह बुरी तरह नाकाम रहे। इन चार मैचों में उन्होंने 20.25 की औसत से 81 रन बनाये जिसमें उनका उच्चतम स्कोर 32 रन रहा। उनके साथी सलामी बल्लेबाज रोहित को जरूर 22 वनडे खेलने का मौका मिला है जिनमें उन्होंने 29.52 की औसत से 502 रन बनाये हैं। वनडे में दो दोहरे शतक लगाने वाले रोहित को 'डाउन अंडर' में अब भी पहले शतक का इंतजार है। भारत को लीग चरण में आस्ट्रेलिया में चार और न्यूजीलैंड में दो मैच खेले हैं। इसका जिक्र इसलिए किया जा रहा है क्योंकि रोहित ने आस्ट्रेलिया में जो 15 वनडे खेले हैं उनमें वह केवल 26.16 की औसत से ही रन बना पाये हैं।
        ब बात करते हैं विराट कोहली की जिन्होंने आस्ट्रेलिया के खिलाफ चार टेस्ट मैचों में 692 रन बनाकर साबित कर दिया कि उन पर परिस्थितियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह दुनिया के किसी भी तरह की पिच पर रन बनाने में सक्षम हैं। कोहली हर तरह के प्रारूप में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी उतने ही सफल रहे हैं जितने की भारत में। भारत की टेस्ट टीम के नये कप्तान ने 'डाउन अंडर' में तीनों प्रारूपों में मिलकर 1923 रन बनाये हैं और उनका औसत 58.27 है। वनडे में उन्होंने दोनों देशों में अब तक जो 13 मैच खेले हैं उनमें 55.33 की औसत से 664 रन बनाये हैं। कोहली ने इन दोनों देशों की सरजमीं पर अब तक वनडे में एक एक शतक लगाया है।
     
कोहली और धौनी : आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में भी खूब चला है बल्ला
       कोहली यदि नंबर तीन पर उतरेंगे तो संभवत: नंबर चार की जिम्मेदारी अजिंक्य रहाणे संभालेंगे जो अच्छी फार्म में चल रहे हैं। वह अच्छे तकनीक वाले बल्लेबाज हैं और आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला में 399 रन बनाकर उन्होंने इसे साबित भी कर दिया है। रहाणे का  'डाउन अंडर' में वनडे रिकार्ड हालांकि बहुत खराब है और वह इसमें जरूर सुधार करने की कोशिश करेंगे। रहाणे ने अब तक आस्ट्रेलिया में कोई वनडे नहीं खेला है। उन्होंने पांच मैच न्यूजीलैंड की सरजमीं पर खेले जिसकी पांच पारियों में वह केवल 51 रन बना पाये। इनमें से चार पारियों में वह दोहरे अंक में भी नहीं पहुंच पाये थे जबकि एक बार उन्होंने 36 रन की पारी खेली थी।    
          बल्लेबाजी क्रम में नंबर पांच सुरेश रैना के लिये सुरक्षित है जिन्हें हाल में सिडनी में पहली बार 'डाउन अंडर' में पहला टेस्ट मैच खेलने का मौका मिला और वह दोनों पारियों में कुल चार गेंद का सामना कर पाये और खाता खोलने में भी नाकाम रहे। रैना ने इन दोनों मेजबान देशों में अब तक कुल 16 वनडे मैच खेले हैं जिनमें 32.58 की औसत से 391 रन बनाये हैं। वह इन 16 मैचों की 15 पारियों में केवल एक बार 50 रन के पार पहुंच पाये। आस्ट्रेलिया की सरजमीं पर तो वह आठ पारियों में केवल 182 रन ही बना पाये हैं और उनका उच्चतम स्कोर नाबाद 40 रन है। मतलब यदि रैना आस्ट्रेलिया में त्रिकोणीय श्रृंखला या विश्व कप में अर्धशतक जड़ते हैं तो यह उनका आस्ट्रेलियाई धरती पर पहला पचासा होगा। मध्यक्रम के किसी बल्लेबाज या रहाणे के शीर्ष क्रम में खेलने की स्थिति में अंबाती रायुडु को मौका मिल सकता है। रायुडु ने अब तक आस्ट्रेलिया में अब तक कोई मैच नहीं खेला है। न्यूजीलैंड में उन्हें दो वनडे खेलने का मौका मिला जिसमें उन्होंने 57 रन बनाये हैं।
       विकेटकीपर बल्लेबाज और टीम के कप्तान धौनी आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सरजमीं पर टेस्ट मैचों में भले ही अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाये लेकिन वनडे में उन्होंने वहां भी अपना जलवा जमकर बिखेरा है। रिकार्ड के लिये बतादें कि टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके धौनी ने लंबी अवधि के प्रारूप में इन दोनों देशों में 13 टेस्ट मैच की 24 पारियों में 27.76 की औसत से 583 रन बनाये। जिसमें उनका उच्चतम स्कोर 68 रन है। वनडे की कहानी इसके ठीक उलट है हालांकि इस प्रारूप में भी धौनी को अभी 'डाउन अंडर' में पहले शतक का इंतजार है। असल में धौनी अब तक इन दोनों देशों में किसी भी प्रारूप में शतक नहीं जड़ पाये हैं। वनडे की बात करें तो धौनी ने अब तक विश्व कप के मेजबान देशों की धरती पर 27 मैच खेले हैं जिनमें उन्होंने 67.20 के प्रभावशाली औसत से 1008 रन बनाये हैं। इनमें नौ अर्धशतक शामिल हैं। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दोनों में उनका वनडे औसत 60 से ऊपर है।
         भारतीय टीम में चुने गये दो आलराउंडरों की चर्चा किये बिना भारतीय बल्लेबाजों के आंकड़ों की यह
बिन्नी और जडेजा को सही साबित करना होगा चयन 
कहानी अधूरी रहेगी। रविंद्र जडेजा ने इन दोनों देशों में 13 वनडे की 12 पारियों में 27.33 की औसत से 246 रन बनाये हैं। न्यूजीलैंड की सरजमीं पर उन्होंने ठीकठाक प्रदर्शन (पांच मैचों में 145 रन) किया है लेकिन आस्ट्रेलिया की धरती पर उनका बल्ला अभी तक नहीं चल पाया है। जडेजा ने आस्ट्रेलिया में जो आठ वनडे मैच खेले हैं उनमें वह केवल 101 रन बना पाये हैं और उनका औसत 16.83 है। यहां उनका उच्चतम स्कोर नाबाद 24 रन है। भारत के दूसरे आलराउंडर स्टुअर्ट बिन्नी ने अब तक अंतरराष्ट्रीय मैचों में आस्ट्रेलियाई पिचों का स्वाद नहीं चखा है। न्यूजीलैंड में उन्होंने एक वनडे खेला है जिसमें उन्हें बल्लेबाजी का मौका नहीं मिला। पिछले साल हैमिल्टन में खेले गये इस मैच में धौनी ने उनके बजाय आर अश्विन को पहले बल्लेबाजी के लिये भेज दिया था। इसके बाद बिन्नी से केवल एक ओवर की गेंदबाजी करवायी गयी जिसमें उन्होंने आठ रन दिये थे। इसके उलट रायुडु को तीन ओवर दिये गये थे। आप इसका कुछ भी मतलब निकाल सकते हैं। मैं तो आंकड़ों से खेलता हूं और मेरा इस पारी में प्रदर्शन कैसा रहा इसका फैसला आप पर छोड़ता हूं। इच्छा करे तो प्रतिक्रिया जरूर दें।
     (सभी आंकड़े 12 जनवरी 2015 तक के हैं)

Sunday, December 21, 2014

धवन की चोट, कोहली और नंबर चार


                                                                                            धर्मेन्द्र मोहन पंत 

        स्थान : ब्रिस्बेन वूललुंगाबा, जो गाबा के नाम से लोकप्रिय है। भारतीय टीम चौथे दिन अपनी दूसरी पारी आगे बढ़ाने की तैयारियों में हैं। खेल शुरू होने में केवल दस मिनट बचे हैं। पिछले दिन के अविजित बल्लेबाज चेतेश्वर पुजारा तैयार हैं लेकिन उनके साथ तीसरे दिन स्टंप के समय अविजित रहे शिखर धवन अभ्यास के दौरान कलाई में लगी चोट से परेशान हैं। ऐसे में चौथे नंबर पर बल्लेबाजी के लिये उतरने वाले विराट कोहली को कहा जाता है कि वह पुजारा के साथ क्रीज पर उतरे। मामला गरमा जाता है। आखिर खेल से दस मिनट पहले यह क्यों तय किया गया कि कौन बल्लेबाजी के लिये उतरेगा? धवन तो पहले ही चोटिल हो गये थे और अभ्यास पिच को छोड़कर जल्द ही ड्रेसिंग रूम में भी लौट आये थे। असल में धवन ने कप्तान को अपनी स्थिति बताने में देर की। वह कप्तान को पहले ही बता देते तो संभवत: यह स्थिति पैदा ही नहीं होती। वह खेल शुरू होने से दस मिनट पहले आकर बताते हैं कि वह बल्लेबाजी के लिये नहीं उतर पाएंगे।

        कोहली खेलने के लिये तैयार हो गये लेकिन ड्रेसिंग रूम की गरमागर्म बहस का असर ​पिच पर दिखता है। मिशेल जानसन की गेंद को कोहली विकेट पर खेलकर तुरंत ही ड्रेसिंग रूम में लौट आते हैं। भारतीय पारी ताश के पत्तों की तरह बिखर गयी और शिखर धवन को ठीक एक घंटे पांच मिनट के बाद क्रीज पर उतरना पड़ा। स्वाभाविक था कि इतनी जल्दी उनकी कलाई ठीक नहीं हुई थी इसलिए उनके साहसिक फैसले की सराहना करनी होगी। लेकिन यदि वह पहले ही यह जोखिम ले लेते तो फिर बखेड़ा खड़ा नहीं होता। धवन ने अपनी पारी वहीं से आगे बढ़ायी जहां पर उन्होंने पहले दिन छोड़ी थी। मतलब उन्होंने उसी अंदाज में बल्लेबाजी की। कुछ करारे ड्राइव लगाये और एक दो दर्शनीय पुल भी किये। साफ लग रहा था कि उनकी कलाई की चोट गंभीर नहीं है। बस इसके कारण मामला गंभीर बन गया था। 
        अब नंबर चार के बल्लेबाज कोहली बात करते हैं। अब कोई बल्लेबाज स्वयं कह रहा हो कि वह क्रीज पर उतरने की स्थिति में नहीं है तो कप्तान या कोच उस पर दबाव भी नहीं बना सकते। कप्तान के पास यही विकल्प बचता है कि वह बल्लेबाजी लाइन अप में अगले नंबर के बल्लेबाज को तैयार होने के लिये कहे और महेंद्र सिंह धोनी ने भी यही किया। यह तो सचिन तेंदुलकर के संन्यास लेने के बाद ही तय हो गया था कि वर्षों तक जिस नंबर चार पर उनका आधिपत्य रहा उसके अगले उत्तराधिकारी विराट कोहली होंगे। कोहली ने भी इस नंबर की ​गरिमा को कम नहीं होने दिया। वह अब तक चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करते हुए 21 पारियों में 858 रन बना चुके हैं जिसमें चार शतक भी शामिल हैं। तेंदुलकर ने भी नंबर चार पर खेलते हुए पहली 21 पारियों में पांच शतक लगाये थे और कोहली उनसे ज्यादा पीछे नहीं हैं। यह अलग बात है कि तेंदुलकर ने किसी भी परिस्थिति में इस नंबर पर उतरने से कभी मना नहीं किया। अपने करियर में 329 में से 275 पारियां आखिर उन्होंने इस नंबर पर यूं ही नहीं खेली। 
        बल्लेबाजी लाइनअप में वनडाउन यानि नंबर तीन सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। कभी कभी तो उसे पहले ओवर में ही नयी गेंद का सामना करने के लिये आना पड़ता है। चौथे नंबर की भी कमो​बेश यही स्थिति है। उसे पारी को संवारना होता है और इसलिए इस नंबर पर खेलने वाले बल्लेबाज का धैर्यवान और अनुशासित होना जरूरी है। तेंदुलकर ने चार नंबर को नयी और सम्मानित पहचान दी है। माहेला जयवर्धने, जाक कैलिस, ब्रायन लारा, जावेद मियादाद, मार्क वॉ जैसे बल्लेबाज इस नंबर पर यूं ही सफल नहीं हुए। भारत की तरफ से कभी अपनी कलात्मक बल्लेबाजी के लिये मशहूर गुंडप्पा विश्वनाथ ने इस नंबर की शोभा बढ़ायी थी। उन्होंने भारत की तरफ से तेंदुलकर के बाद इस नंबर पर सर्वाधिक 124 पारियां खेली हैं, 5000 से अधिक रन बनाये और 12 शतक जड़े। मतलब कोहली को बड़ी जिम्मेदारी निभानी है। 
       कोहली जिस तरह के बल्लेबाज हैं उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि तेंदुलकर ने नंबर चार को जो नयी पहचान दी है वह उसमें चार चांद लगाएंगे। वह हर तरह की चुनौती के लिये हमेशा तैयार दिखते हैं। फिर किसी भी तरह की बहस, भले ही वह क्षणिक हो, का नुकसान कोहली को ही होगा। उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वह भारत के भावी कप्तान हैं और अगले साल किसी भी समय उनके हाथों स्थायी तौर पर टीम की कमान दी जा सकती है। ऐसे में उन्हें भी कप्तान रहते हुई विषम परिस्थितियों में कुछ ऐसे फैसले करने पड़ सकते हैं जो किसी खिलाड़ी या टीम को नागवार गुजरे। प्रत्येक टीम गेम में ऐसा होता है। उम्मीद है कोहली इसे समझेंगे।