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Tuesday, April 7, 2015

आईपीएल : कुछ दिलचस्प आंकड़े

.... चेन्नई सुपरकिंग्स ने रविंद्र जडेजा को आलराउंडर के तौर पर करोड़ों रूपये देकर खरीदा था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जडेजा को अब भी आईपीएल में पहले अर्धशतक का इंतजार है। उन्होंने आईपीएल में 94 मैचों में 1251 रन बनाये हैं और उनका उच्चतम स्कोर 48 रन है। दिलचस्प बात यह है कि जडेजा ने टी20 में ओवरआल 134 मैच खेले हैं लेकिन आज तक वह इस प्रारूप में अर्धशतक नहीं लगा पाये हैं।
.... गौतम गंभीर, विराट कोहली, रोबिन उथप्पा, महेंद्र सिंह धोनी, शिखर धवन, दिनेश कार्तिक उन बल्लेबाजों में शामिल हैं जिन्होंने आईपीएल में 2000 से अधिक रन बनाये हैं लेकिन उन्हें टी20 के इस टूर्नामेंट में अब भी पहले शतक का इंतजार है। आईपीएल में सर्वाधिक चार शतक क्रिस गेल ने लगाये हैं।
 .... आईपीएल में सर्वाधिक रन (3325) सुरेश रैना ने बनाये हैं लेकिन सर्वाधिक छक्कों का रिकार्ड क्रिस गेल के नाम पर हैं। गेल ने अब तक 192 छक्के लगाये हैं और आईपीएल में छक्कों का दोहरा शतक पूरा करने के लिये उन्हें केवल आठ छक्के चाहिए। लगता नहीं कि अगले सत्र में भी कोई दूसरा बल्लेबाज इस मुकाम पर पहुंच पाएगा क्योंकि गेल के बाद सर्वाधिक छक्के लगाने वाले बल्लेबाजों की सूची में दूसरे नंबर पर रैना (134 छक्के) हैं। गौतम गंभीर ने आईपीएल में सर्वाधिक 327 चौके लगाये हैं। दिल्ली रणजी टीम के उनके साथी वीरेंद्र सहवाग (322 चौके) उनसे थोड़े ही पीछे हैं।
.... सचिन तेंदुलकर ने आईपीएल तीन यानि 2010 में सर्वाधिक रन बनाने के लिये औरेंज कैप हासिल की थी लेकिन तब उन्होंने केवल तीन छक्के लगाये थे जो कि पिछले सात सत्र में ओरेंज कैप विजेता द्वारा लगाये गये सबसे कम छक्के हैं। तेंदुलकर ने हालांकि 86 चौके लगाये थे जो कि एक सत्र में सर्वाधिक चौकों का रिकार्ड है। दूसरी तरफ क्रिस गेल ने जब 2012 में ओरेंज कैप हासिल की थी तो उन्होंने 59 छक्के लगाये थे जो रिकार्ड है। गेल ने तब केवल 46 चौके लगाये थे यानि किसी ओरेंज कैप विजेता द्वारा लगाये गये सबसे कम चौके।
.... रैना एकमात्र ऐसे खिलाड़ी हैं जो आईपीएल में अब तक अपनी टीम की तरफ से सभी मैचों में खेले हैं। रैना शुरू से चेन्नई सुपरकिंग्स से जुड़े रहे हैं और उन्होंने इस टीम के लिये हर मैच में हिस्सा लिया है। रैना ने आईपीएल में सर्वाधिक 115 मैच खेल लिये हैं। धौनी 112 मैच के साथ दूसरे स्थान पर हैं। धौनी ने अपने सभी मैच कप्तान के रूप में खेले हैं जो कि रिकार्ड है। वह जिन तीन मैचों में नहीं खेल पाए उनमें रैना ने कप्तानी की थी जानकारी के लिये बतादें कि टी20 में धौनी ने रिकार्ड 185 मैचों में कप्तानी कर चुके हैं। गंभीर 106 मैच के साथ दूसरे स्थान पर हैं।
.... महेंद्र सिंह धौनी, सुरेश रैना (चेन्नई सुपरकिंग्स), विराट कोहली (रायल चैलेंजर्स बेंगलूर), हरभजन सिंह (मुंबई इंडियन्स), शेन वाटसन (राजस्थान रायल्स) और शान मार्श (किंग्स इलेवन पंजाब) ऐसे खिलाड़ी हैं जो पहले आईपीएल यानि 2008 से लेकर आज तक एक ही टीम से खेल रहे हैं। आठवें आईपीएल में भी ये खिलाड़ी इन्हीं टीमों से खेलते हुए नजर आएंगे।
.... पिछली बार जब सातवां आईपीएल शुरू हुआ था तो क्रिस गेल को टी20 में 6000 रन पूरा करने वाला पहला बल्लेबाज बनने के लिये छह रन की दरकार थी। इस बार वह इस प्रारूप में 7000 रन पूरे करने वाला पहला बल्लेबाज बन जाएंगे। इसके लिये उन्हें केवल 25 रन की दरकार है। गेल को टी20 में 500 छक्के लगाने वाला पहला बल्लेबाज बनने के लिये भी केवल 14 छक्कों की दरकार है। वेस्टइंडीज के उनके साथी कीरोन पोलार्ड (335 छक्के) दूसरे नंबर पर हैं लेकिन गेल से काफी पीछे हैं।
.... आईपीएल में सर्वाधिक 119 विकेट लेसिथ मालिंगा ने लिये हैं। अमित मिश्रा 102 विकेट के साथ दूसरे स्थान पर हैं। पीयूष चावला, हरभजन सिंह और आर विनयकुमार को आईपीएल में विकेटों का शतक पूरा करने के लिये दस से भी कम विकेट चाहिए।
.... टी20 क्रिकेट में सर्वाधिक 148 कैच लेने का रिकार्ड पोलार्ड के नाम पर है। अब तक कोई भी भारतीय क्षेत्ररक्षक कैच का सैकड़ा पूरा नहीं कर पाया है। रैना तीन कैच लपकते ही यह मुकाम हासिल कर लेंगे। पोलार्ड के अलावा डेविड हसी और ड्वेन ब्रावो ही टी20 में 100 से अधिक कैच लपक पाये हैं। रैना अभी चौथे स्थान पर हैं।


Tuesday, February 3, 2015

तीनों जिम्मेदारियों में खरा उतरना होगा सेनापति धौनी को


 ज से ठीक दस साल पहले 23 दिसंबर 2003 को देश के दो नये नवेले राज्यों उत्तराखंड और झारखंड से ताल्लुकात रखने वाला एक युवा खिलाड़ी बांग्लादेश के चटगांव में पहली बार भारत की तरफ से खेलने के लिये उतरा और पहली गेंद पर ही आउट होकर पवेलियन लौट गया। बात आयी गयी हो गयी। नया खिलाड़ी है। कौन तवज्जो देता है।
     लेकिन यह खिलाड़ी यानि महेंद्र सिंह धौनी हार मानने वाला नहीं था। चार महीने के अंदर देश ही नहीं विदेशी क्रिकेट प्रेमियों की जुबान पर भी उनका नाम चढ़ गया। दिन था पांच अप्रैल 2005 और स्थान था विशाखापट्टनम। भारत और पाकिस्तान आमने सामने थे। धौनी क्रीज पर उतरते हैं और फिर पाकिस्तानी गेंदबाजों को धुन डालते हैं। इस बल्लेबाजी कौशल में ताकत का मिश्रण था। बल्ला बिजली की गति से घूमता और गेंद करारा प्रहार झेलकर बाउंड्री ढूंढने लग जाती। कुल 123 गेंदों पर 148 रन धौनी के बल्ले से निकले जिसमें 15 चौके और पांच छक्के शामिल थे।
    भारत को ऐसे ही विकेटकीपर बल्लेबाज की तलाश थी और धौनी ने भी इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। जयपुर में 31 अक्तूबर 2005 को श्रीलंका के खिलाफ उन्होंने जो 183 रन की पारी खेली थी वह आज भी किसी विकेटकीपर का वनडे में सर्वोच्च स्कोर है। उन्हें पहली बार 2007 में दक्षिण अफ्रीका में खेली गयी पहली विश्व टी20 चैंपियनशिप में टीम की कमान सौंपी गयी। भारत उस टूर्नामेंट में चैंपियन बना।
    इसके एक साल बाद धौनी तीनों प्रारूपों में भारत के कप्तान बन गये और यह कहा जा सकता है कि तब भारतीय क्रिकेट उनके इशारों पर नाचने लगा। इस बीच उन्होंने अच्छे परिणाम भी दिये। भारत को वनडे और टेस्ट क्रिकेट में दुनिया की नंबर एक टीम बनवाया और 2011 में उनकी अगुवाई में भारत 28 साल बाद फिर से विश्व कप जीतने में सफल रहा। इसके दो साल बाद धौनी दुनिया के पहले ऐसे कप्तान बन गये जिनकी अगुवाई में टीम ने टी20 विश्व चैंपियनशिप, वनडे विश्व कप और चैंपियन्स ट्राफी जीती। वह आज भारत के सबसे सफल कप्तान हैं।
    धौनी अब टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं। निश्चित रूप से उन्होंने यह फैसला सीमित ओवरों की क्रिकेट में अधिक ध्यान देने के लिये किया। उनकी असली परीक्षा हालांकि विश्व कप में होगी जहां उनके पास ऐसी टीम है जिसके खिलाड़ी प्रतिभाशाली तो हैं लेकिन उनमें अनुभव की कमी है। धौनी को फिर से अपनी तीन भूमिकाओं कप्तान, विकेटकीपर और बल्लेबाज के रूप में खरा उतरना होगा। उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फिनिशर में से एक माना जाता है और निचले क्रम में बल्लेबाजी का दारोमदार उन पर ही रहेगा।
    धौनी ने अब तक 254 वनडे मैचों में 52.29 की औसत से 8262 रन बनाये हैं, जिसमें नौ शतक और 56 अर्धशतक शामिल हैं। उनके नाम पर विकेटकीपर के रूप में 229 कैच और 85 स्टंप शामिल हैं। इससे पहले धौनी 2007 और 2011 विश्व कप में भाग ले चुके हैं जिनके 12 मैचों में उन्होंने 33.75 की औसत से 270 रन बनाये और उनका उच्चतम स्कोर नाबाद 91 रन है। यह विश्व कप में धौनी की 50 से अधिक रनों की एकमात्र पारी है।  
                                                          धर्मेन्द्र मोहन पंत

Saturday, January 31, 2015

विश्व कप में भारत की उम्मीद

                                                          धर्मेन्द्र मोहन पंत 
   
ईसीसी क्रिकेट विश्व कप यानि क्रिकेट का महाकुंभ अब केवल दो सप्ताह दूर है। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में 14 फरवरी से दुनिया की 14 टीमों के बीच प्रतिष्ठित विश्व कप ट्राफी के लिये जंग देखने को मिलेगी जो 29 मार्च तक चलेगी। भारत मौजूदा चैंपियन है और उससे काफी उम्मीद की जा रही है। अब तक केवल वेस्टइंडीज और आस्ट्रेलिया ही अपना खिताब बचाने में कामयाब रहे हैं। भारत इस श्रेणी में तीसरी टीम बनता है या नहीं यह महेंद्र सिंह धौनी और उसके 14 अन्य साथियों के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। भारत को पूल बी दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, वेस्टइंडीज, जिम्बाब्वे, आयरलैंड और संयुक्त अरब अमीरात के साथ रखा गया है। पूल ए में मेजबान आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और स्काटलैंड हैं। लीग चरण में प्रत्येक पूल से चार . चार टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंचेंगी। मतलब साफ है कि चोटी की आठ टीमों के लिये अंतिम आठ में जगह बनाना मुश्किल नहीं होगा। असली जंग तो क्वार्टर फाइनल के बाद शुरू होगी। जो टीम आखिरी तीन मैचों में अच्छा प्रदर्शन करेगी वहीं विश्व चैंपियन बनेगी। बड़ी टीमों के लिहाज से यह प्रारूप बेहद आसान बना दिया गया है।   
       भारतीय टीम के हाल के प्रदर्शन को देखकर और कुछ नये खिलाड़ियों के सहारे आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सरजमीं पर उतरने के कारण कई क्रिकेट विश्लेषक मान रहे हैं टीम को 1992 की तरह मुंह की खानी पड़ सकती है। तब भी आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सह मेजबानी में विश्व कप का आयोजन हुआ था और मोहम्मद अजहरूद्दीन की अगुवाई वाली भारतीय टीम का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था। भारतीय टीम की कमान फिर से महेंद्र सिंह धौनी के हाथों में है जिनकी अगुवाई में भारत ने टी20 विश्व चैंपियनशिप 2007, वनडे विश्व कप 2011 और चैंपियन्स ट्राफी 2013 में खिताब जीते थे। धौनी को तिहरी भूमिका निभानी पड़ेगी। उन्हें छठे नंबर के बल्लेबाज के तौर पर डेथ ओवरों में अहम रन जोड़ने होंगे और फिनिशर की अपनी भूमिका ​को निखारना होगा। इसके अलावा वह विकेटकीपर भी हैं।
      शीर्ष क्रम में शिखर धवन, रोहित शर्मा और अंजिक्य रहाणे हैं। धवन पिछले कुछ समय से रन बनाने के लिये जूझ रहे हैं। रोहित अच्छी फार्म में हैं लेकिन उनकी चोट टीम के लिये चिंता का विषय है। ऐसे में रहाणे बचते हैं जो फिलहाल रन भी बना रहे हैं और टीम के भरोसेमंद बल्लेबाजों में से एक हैं। विराट कोहली की शीर्ष मध्यक्रम में भूमिका अहम होगी। बेहतर यही है कि धौनी उनके साथ प्रयोग नहीं करें और उन्हें वनडे में उनके पसंदीदा स्थान तीसरे नंबर पर ही उतारें। त्रिकोणीय श्रृंखला में कोहली को नंबर चार पर उतारने का दांव नहीं चल पाया था। यदि धवन चल जाते हैं और रोहित फिट होते हैं तो फिर रहाणे नंबर चार पर पारी संवारने का काम कर सकते हैं। सुरेश रैना नंबर पांच पर फिट ​बैठते हैं। बायें हाथ का यह बल्लेबाज दूसरे पावरप्ले का अच्छा उपयोग कर सकता है। अंबाती रायुडु को जरूरत पड़ने पर नंबर चार पर उतारा जा सकता है। वह विकेटकीपिंग का जिम्मा भी संभाल सकते हैं। धौनी इसके बाद नंबर छह पर बल्लेबाजी के लिये आएंगे।
           भारत के पास आलराउंडर के नाम पर स्टुअर्ट बिन्नी और रविंद्र जडेजा हैं। जडेजा ने हाल में फिटनेस हासिल की है लेकिन उन्हें विश्व कप से पहले खुद को मैचों के लिये भी तैयार करना होगा। बिन्नी को यह साबित करना होगा कि उनका चयन 'सिफारिशी' नहीं था। उनकी सीम और स्विंग गेंदबाजी आस्ट्रेलियाई परिस्थितियों में कारगर साबित हो सकती है। जडेजा बायें हाथ के स्पिनर हैं और निचले क्रम में विशेषकर सातवें नंबर पर अच्छी बल्लेबाजी कर सकते हैं। बिन्नी और जडेजा के बीच इस स्थान के लिये स्वस्थ प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी।

     भारत की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी गेंदबाजी मानी जा रही है क्योंकि आस्ट्रेलियाई दौरे में गेंदबाजों ने जब तब निराश किया। वनडे के बदले हुए नियमों में भारतीय गेंदबाजों को विश्व कप के दौरान कड़ी परीक्षा से गुजरना होगा। तेज गेंदबाजों में इशांत शर्मा सबसे अधिक अनुभवी हैं और उन्हें आस्ट्रेलिया की पिचों का अच्छी तरह से उपयोग करना भी आता है। भारत के विश्व कप अभियान के लिये इशांत का फिट रहना भी जरूरी है। भुवनेश्वर कुमार और मोहम्मद शमी समय समय पर विकेट निकालने में माहिर हैं लेकिन उमेश यादव अपनी गेंदों पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं। शमी भी कई बार लाइन और लेंथ भूल जाते हैं और यदि ये दोनों विश्व कप में ऐसी गलती करते हैं तो वह भारत को भारी पड़ सकती हैं। स्पिन विभाग का जिम्मा रविचंद्रन अश्विन पर रहेगा। यह आफ स्पिनर चतुराई भरी गेंदबाजी करता है और बल्लेबाज का मन पढ़कर गेंदबाजी करता है लेकिन पिचों से उन्हें मदद मिलेगी इसमें संदेह है। उनके साथ बायें हाथ के स्पिनर अक्षर पटेल हैं जिन्होंने अब तक अवसरों का अच्छा फायदा उठाया है। उम्मीद है कि गुजरात का यह 21 वर्षीय स्पिनर विश्व कप में अच्छा प्रदर्शन करके ​भारत की वनडे टीम में अपनी जगह पक्की करने की कोशिश करेगा। अश्विन और अक्षर दोनों निचले क्रम में कुछ उपयोगी रन भी बनाने में सक्षम हैं।

                     विश्व कप में भारत के मैचों का कार्यक्रम (भारतीय समयानुसार)
        रविवार, 15 फरवरी .. भारत बनाम पाकिस्तान, एडिलेड, सुबह नौ बजे से। 
        रविवार, 22 फरवरी .. भारत बनाम दक्षिण अफ्रीका, मेलबर्न, सुबह नौ बजे से। 
        शनिवार, 28 फरवरी .. भारत बनाम संयुक्त अरब अमीरात, पर्थ, दोपहर 12 बजे से। 
        शुक्रवार, 06 मार्च .. भारत बनाम वेस्टइंडीज, पर्थ, दोपहर 12 बजे से। 
        मंगलवार, 10 मार्च .. भारत बनाम आयरलैंड, हैमिल्टन, सुबह छह बजकर 30 मिनट से। 
        शनिवार, 14 मार्च .. भारत बनाम जिम्बाब्वे, आकलैंड, सुबह छह बजकर 30 मिनट से। 





Monday, January 12, 2015

डाउन अंडर में विश्व कप के भारतीय बल्लेबाज

                                                                                       धर्मेन्द्र 
     विश्व कप के लिये भारत ने जो टीम चुनी है उसकी बल्लेबाजी मजबूत मानी जा रही है। गेंदबाजी कमजोर पक्ष है लेकिन हम यहां पर केवल बल्लेबाजों तथा आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में उनके प्रदर्शन पर गौर करेंगे। यह आंकड़ों की बिसात है जो समय, परिस्थितियों और फार्म के हिसाब से बदल भी सकती है लेकिन भारतीय बल्लेबाजों के लिये 'डाउन अंडर' यानि आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सरजमीं हमेशा चुनौती रही है और आंकड़ों पर गौर करने से भी साबित हो जाता है कि विशेषकर एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट यानि वनडे में कप्तान महेंद्र सिंह धौनी और विराट कोहली को छोड़कर विश्व कप टीम के बाकी बल्लेबाज 'डाउन अंडर' में रन बनाने के लिये जूझते रहे हैं। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की पिचें तेज होती हैं और उनमें पर्याप्त उछाल रहती है। भारत के सुरेश रैना और रोहित शर्मा जैसे बल्लेबाजों को इस तरह की पिचें रास नहीं आती हैं। यदि भारत को विश्व कप का खिताब बरकरार रखना है तो इन बल्लेबाजों को खुद को साबित करना होगा और अपने पिछले रिकार्ड में सुधार करना होगा।
रिकार्ड में सुधार करना होगा धवन, रोहित और रैना को 
     
       चलिये अब आंकड़ों की जुबानी कहानी आगे बढ़ाते हैं। बल्लेबाजी क्रम से ही आगे बढ़ते हैं। भारत के लिये अभी शिखर धवन और रोहित शर्मा वनडे में पारी का आगाज कर रहे हैं। इन दोनों ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ हाल में समाप्त हुई टेस्ट श्रृंखला में निराशाजनक प्रदर्शन किया था और 'डाउन अंडर में उनका ओवरआल रिकार्ड भी प्रभावशाली नहीं है।  आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला की छह पारियों में केवल 167 रन बनाने वाले धवन ने विश्व कप के मेजबान देशों यानि आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में अब तक केवल कीवियों की धरती पर चार वनडे खेले हैं जिनमें वह बुरी तरह नाकाम रहे। इन चार मैचों में उन्होंने 20.25 की औसत से 81 रन बनाये जिसमें उनका उच्चतम स्कोर 32 रन रहा। उनके साथी सलामी बल्लेबाज रोहित को जरूर 22 वनडे खेलने का मौका मिला है जिनमें उन्होंने 29.52 की औसत से 502 रन बनाये हैं। वनडे में दो दोहरे शतक लगाने वाले रोहित को 'डाउन अंडर' में अब भी पहले शतक का इंतजार है। भारत को लीग चरण में आस्ट्रेलिया में चार और न्यूजीलैंड में दो मैच खेले हैं। इसका जिक्र इसलिए किया जा रहा है क्योंकि रोहित ने आस्ट्रेलिया में जो 15 वनडे खेले हैं उनमें वह केवल 26.16 की औसत से ही रन बना पाये हैं।
        ब बात करते हैं विराट कोहली की जिन्होंने आस्ट्रेलिया के खिलाफ चार टेस्ट मैचों में 692 रन बनाकर साबित कर दिया कि उन पर परिस्थितियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह दुनिया के किसी भी तरह की पिच पर रन बनाने में सक्षम हैं। कोहली हर तरह के प्रारूप में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी उतने ही सफल रहे हैं जितने की भारत में। भारत की टेस्ट टीम के नये कप्तान ने 'डाउन अंडर' में तीनों प्रारूपों में मिलकर 1923 रन बनाये हैं और उनका औसत 58.27 है। वनडे में उन्होंने दोनों देशों में अब तक जो 13 मैच खेले हैं उनमें 55.33 की औसत से 664 रन बनाये हैं। कोहली ने इन दोनों देशों की सरजमीं पर अब तक वनडे में एक एक शतक लगाया है।
     
कोहली और धौनी : आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में भी खूब चला है बल्ला
       कोहली यदि नंबर तीन पर उतरेंगे तो संभवत: नंबर चार की जिम्मेदारी अजिंक्य रहाणे संभालेंगे जो अच्छी फार्म में चल रहे हैं। वह अच्छे तकनीक वाले बल्लेबाज हैं और आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला में 399 रन बनाकर उन्होंने इसे साबित भी कर दिया है। रहाणे का  'डाउन अंडर' में वनडे रिकार्ड हालांकि बहुत खराब है और वह इसमें जरूर सुधार करने की कोशिश करेंगे। रहाणे ने अब तक आस्ट्रेलिया में कोई वनडे नहीं खेला है। उन्होंने पांच मैच न्यूजीलैंड की सरजमीं पर खेले जिसकी पांच पारियों में वह केवल 51 रन बना पाये। इनमें से चार पारियों में वह दोहरे अंक में भी नहीं पहुंच पाये थे जबकि एक बार उन्होंने 36 रन की पारी खेली थी।    
          बल्लेबाजी क्रम में नंबर पांच सुरेश रैना के लिये सुरक्षित है जिन्हें हाल में सिडनी में पहली बार 'डाउन अंडर' में पहला टेस्ट मैच खेलने का मौका मिला और वह दोनों पारियों में कुल चार गेंद का सामना कर पाये और खाता खोलने में भी नाकाम रहे। रैना ने इन दोनों मेजबान देशों में अब तक कुल 16 वनडे मैच खेले हैं जिनमें 32.58 की औसत से 391 रन बनाये हैं। वह इन 16 मैचों की 15 पारियों में केवल एक बार 50 रन के पार पहुंच पाये। आस्ट्रेलिया की सरजमीं पर तो वह आठ पारियों में केवल 182 रन ही बना पाये हैं और उनका उच्चतम स्कोर नाबाद 40 रन है। मतलब यदि रैना आस्ट्रेलिया में त्रिकोणीय श्रृंखला या विश्व कप में अर्धशतक जड़ते हैं तो यह उनका आस्ट्रेलियाई धरती पर पहला पचासा होगा। मध्यक्रम के किसी बल्लेबाज या रहाणे के शीर्ष क्रम में खेलने की स्थिति में अंबाती रायुडु को मौका मिल सकता है। रायुडु ने अब तक आस्ट्रेलिया में अब तक कोई मैच नहीं खेला है। न्यूजीलैंड में उन्हें दो वनडे खेलने का मौका मिला जिसमें उन्होंने 57 रन बनाये हैं।
       विकेटकीपर बल्लेबाज और टीम के कप्तान धौनी आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सरजमीं पर टेस्ट मैचों में भले ही अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाये लेकिन वनडे में उन्होंने वहां भी अपना जलवा जमकर बिखेरा है। रिकार्ड के लिये बतादें कि टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके धौनी ने लंबी अवधि के प्रारूप में इन दोनों देशों में 13 टेस्ट मैच की 24 पारियों में 27.76 की औसत से 583 रन बनाये। जिसमें उनका उच्चतम स्कोर 68 रन है। वनडे की कहानी इसके ठीक उलट है हालांकि इस प्रारूप में भी धौनी को अभी 'डाउन अंडर' में पहले शतक का इंतजार है। असल में धौनी अब तक इन दोनों देशों में किसी भी प्रारूप में शतक नहीं जड़ पाये हैं। वनडे की बात करें तो धौनी ने अब तक विश्व कप के मेजबान देशों की धरती पर 27 मैच खेले हैं जिनमें उन्होंने 67.20 के प्रभावशाली औसत से 1008 रन बनाये हैं। इनमें नौ अर्धशतक शामिल हैं। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दोनों में उनका वनडे औसत 60 से ऊपर है।
         भारतीय टीम में चुने गये दो आलराउंडरों की चर्चा किये बिना भारतीय बल्लेबाजों के आंकड़ों की यह
बिन्नी और जडेजा को सही साबित करना होगा चयन 
कहानी अधूरी रहेगी। रविंद्र जडेजा ने इन दोनों देशों में 13 वनडे की 12 पारियों में 27.33 की औसत से 246 रन बनाये हैं। न्यूजीलैंड की सरजमीं पर उन्होंने ठीकठाक प्रदर्शन (पांच मैचों में 145 रन) किया है लेकिन आस्ट्रेलिया की धरती पर उनका बल्ला अभी तक नहीं चल पाया है। जडेजा ने आस्ट्रेलिया में जो आठ वनडे मैच खेले हैं उनमें वह केवल 101 रन बना पाये हैं और उनका औसत 16.83 है। यहां उनका उच्चतम स्कोर नाबाद 24 रन है। भारत के दूसरे आलराउंडर स्टुअर्ट बिन्नी ने अब तक अंतरराष्ट्रीय मैचों में आस्ट्रेलियाई पिचों का स्वाद नहीं चखा है। न्यूजीलैंड में उन्होंने एक वनडे खेला है जिसमें उन्हें बल्लेबाजी का मौका नहीं मिला। पिछले साल हैमिल्टन में खेले गये इस मैच में धौनी ने उनके बजाय आर अश्विन को पहले बल्लेबाजी के लिये भेज दिया था। इसके बाद बिन्नी से केवल एक ओवर की गेंदबाजी करवायी गयी जिसमें उन्होंने आठ रन दिये थे। इसके उलट रायुडु को तीन ओवर दिये गये थे। आप इसका कुछ भी मतलब निकाल सकते हैं। मैं तो आंकड़ों से खेलता हूं और मेरा इस पारी में प्रदर्शन कैसा रहा इसका फैसला आप पर छोड़ता हूं। इच्छा करे तो प्रतिक्रिया जरूर दें।
     (सभी आंकड़े 12 जनवरी 2015 तक के हैं)

Wednesday, December 31, 2014

शाबाश धौनी

                                              धर्मेन्द्र मोहन पंत 
        वह 28 मार्च 2006 का दिन था। फिरोजशाह कोटला में भारत की पहले वनडे में जीत के बाद मैन आफ द मैच हरभजन सिंह को इनाम में मिली बाइक पर लंबे बालों वाला शख्स सवार होता है और मैदान का चक्कर लगाने लग जाता है। मीडिया बाक्स में बैठा हर व्यक्ति क्रेजी हो जाता है। मैं भी। यह महेंद्र सिंह धौनी से एक तरह से पहली मुलाकात थी। वह तब तक हालांकि पाकिस्तान के खिलाफ 148 और श्रीलंका के खिलाफ नाबाद 183 रन बनाकर मशहूर हो चुके थे। दिल्ली से चंद किलोमीटर की दूरी पर स्थित फरीदाबाद  के नाहरसिंह स्टेडियम में धौनी के साथ बाइक पर पीछे बैठने की बारी सुरेश रैना की थी। धौनी के बाइक प्रेम को लेकर चर्चा होने लगी थी लेकिन यह उनके स्वच्छंद  व्यवहार का एक पहलू भी था जो उनकी बल्लेबाजी में हमेशा दिखा। इसके बाद पत्रकार वार्ताओं में कई बार धौनी से रू ब रू होने का मौका मिला। सवालों के अनुरूप उनके चेहरे के भाव कुछ बदलते रहते थे लेकिन मुस्कान हमेशा बनी रहती थी। यह मुस्कान उस सीमा रेखा लिये थी जिसके बारे में वह हमेशा जानते थे कि इसे कब लांघना है और कब नहीं। मैंने उन्हें कभी इस रेखा को लांघते हुए नहीं देखा। वह जानते थे कि मीडिया का काम खबरें देना और खबरों के अंदर से कुछ नया निकालना है और उनका काम खेलना। इसलिए उन्होंने मीडिया से हमेशा स्पष्ट दूरी बनाये रखी। बस काम की बातें और कुछ नहीं। 
          और मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर भारत और आस्ट्रेलिया के बीच तीसरे टेस्ट मैच की समाप्ति के बाद भी ऐसा ही कुछ हुआ। धौनी पत्रकारों के सवालों के जवाब देने के लिये आये। मैच को लेकर बातें हुई लेकिन वह बड़ी खबर बाद के लिये छोड़ गये। शायद उन्हें अपने पूर्ववर्ती अनिल कुंबले की 2008 में दिल्ली में हुई प्रेस कान्फ्रेंस की याद रही होगी। तब भी आस्ट्रेलिया से मैच ड्रा छूटा था लेकिन दिन के खेल के बीच में प्रेस बाक्स में सूचना आ गयी थी कि कुंबले ने संन्यास ले लिया है। इसके बाद कप्तान के रूप में उनके आखिरी संवाददाता सम्मेलन का मैच से कोई लेना देना नहीं रहा। भारतीय बहुत भावुक होते हैं और वहां भी भावनाओं का ज्वार हावी हो गया था। धौनी इस तरह की किसी भावुकता से बचना चाहते थे। उनकी भावनाएं उनकी अपनी हैं और वे उन्हें
सार्वजनिक नहीं करना चाहते हैं। जिंदगी का यह फलसफा शुरू से धौनी से जुड़ा रहा और देश की कप्तानी करते हुए भी उन्होंने यही रणनीति अपनायी। अगर वह सेनापति हैं तो फिर टीम की कमान कैसे संभालनी है इसका फैसला भी वह खुद करेंगे। ऐसा नहीं है कि धौनी आगे संवाददाताओं से रू ब रू नहीं होंगे लेकिन वह भी जानते हैं कि भावनाओं का ज्वार तब तक ठंडा पड़ चुका होगा। हम भारतीयों की भावनाएं होती भी क्षणिक हैं। 
         धौनी की टेस्ट कप्तानी पर पिछले कुछ समय से उंगली उठती जा रही थी। कहा जा रहा था कि वह टेस्ट मैचों में उतनी दिलचस्पी नहीं लेते जितनी की सीमित ओवरों के मैचों में। यह थोड़ा हास्यास्पद लगता है। ठीक है कि धौनी का कप्तानी रिकार्ड विदेशों में अच्छा नहीं रहा, वह कुछ अवसरों पर रक्षात्मक रवैया अपनाते रहे लेकिन टेस्ट क्रिकेट में दिलचस्पी नहीं लेना.....। जो लोग ऐसा कहते हैं उन्हें धौनी के पिछले दिनों के एक इंटरव्यू की याद दिलाना चाहूंगा। उसमें उन्होंने कहा था, ''मैंने अपनी पत्नी से कहा कि उनके लिये उसका नंबर तीसरे स्थान पर है, पहले देश, फिर माता पिता और उसके बाद। '' यह महज बयान नहीं हो सकता। अगर धौनी की यह सोच नहीं होती तो फिर वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फिनिशर भी नहीं होते। सुनील गावस्कर ने सही कहा है कि "भारतीय क्रिकेट में धौनी के योगदान को आप शब्दों में बयां नहीं कर सकते हो।" प्रत्येक व्यक्ति की कुछ कमजोरियां होती हैं और धौनी भी अपवाद नहीं है।
         
धौनी सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति हैं और जिंदगी अपनी तरह से जीना चाहते हैं। जब वह सभी प्रारूपों से संन्यास ले लेंगे और क्रिकेट से उनका खास वास्ता नहीं रहेगा तो हो सकता है कि उनका ठिकाना ढूंढने के लिये उनके करीबी को भी मशक्कत करनी पड़े। इसलिए उनका टेस्ट क्रिकेट से संन्यास का फैसला हैरानीपूर्ण नहीं था। धौनी ने कहा भी था कि जब उन्हें लगेगा कि अब संन्यास का वक्त आ गया है तो वह इसमें देर नहीं करेंगे और उन्होंने वही किया। वह चाहते तो भारी भरकम विदाई समारोह के साथ टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहते लेकिन वह हमेशा इस तरह के आयोजनों से बचने की कोशिश करते रहे हैं। वह टीम पर बोझ भी नहीं बनना चाहते थे। टेस्ट मैचों में न सिर्फ कप्तान बल्कि बल्लेबाज के रूप में भी वह अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहे थे। इस साल 17 पारियों में वह केवल 534 रन बना पाये थे। पिछली पांच पारियों में उनका स्कोर था 0, 33, 0, 11 और नाबाद 24 रन। भारत उनकी कप्तानी में विदेशों में जीत के लिये तरस गया था। इसलिए उनका फैसला खेल और देश के हित के रूप में देखा जाना चाहिए।
      यदि वह दो साल पहले कप्तानी छोड़ देते तो फिर कौन कमान संभालता। क्या कोई इस जिम्मेदारी को निभाने के लिये तैयार था। आप वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर आदि का नाम ले सकते हो लेकिन उनकी तो खुद की टीम में जगह सुनिश्चित नहीं थी। वे खुद रन बनाने के लिये जूझ रहे थे। विराट कोहली तब वास्तव में अपरिपक्व थे। अब एडिलेड में पहली परीक्षा में पास होने के बाद धौनी को भी लग गया था कि कोई ऐसा शख्स टीम में मौजूद है जो अगुवाई कर सकता है। इसलिए यह सही समय है जबकि टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहा जा सकता है। सच में यह सही समय पर लिया गया बुद्धिमत्तापूर्ण फैसला है। एक साहसिक फैसला। इसलिए मैं तो यहीं कहूंगा शाबाश धौनी।

                                                     धौनी से जुड़ी एक खास खबर

      

Tuesday, December 23, 2014

माही की परिकथा

                                            धर्मेन्द्र मोहन पंत
        आज से ठीक दस साल पहले 23 दिसंबर 2003 को देश के दो नये नवेले राज्यों उत्तराखंड और झारखंड से ताल्लुकात रखने वाला एक युवा खिलाड़ी बांग्लादेश के चटगांव में पहली बार भारत की तरफ से खेलने के लिये उतरा और पहली गेंद पर ही आउट होकर पवेलियन लौट गया। बात आयी गयी हो गयी। नया खिलाड़ी है। कौन तवज्जो देता है।
        लेकिन यह खिलाड़ी यानि महेंद्र सिंह धौनी हार मानने वाला नहीं था। चार महीने के अंदर देश ही नहीं विदेशी क्रिकेट प्रेमियों की जुबान पर भी उनका नाम चढ़ गया। दिन था पांच अप्रैल 2005 और स्थान था विशाखापट्टनम। भारत और पाकिस्तान आमने सामने थे। धौनी क्रीज पर उतरते हैं और फिर पाकिस्तानी गेंदबाजों को धुन डालते हैं। इस बल्लेबाजी कौशल में ताकत का मिश्रण था। बल्ला बिजली की गति से घूमता और गेंद करारा प्रहार झेलकर बाउंड्री ढूंढने लग जाती। कुल 123 गेंदों पर 148 रन धौनी के बल्ले से निकले जिसमें 15 चौके और पांच छक्के शामिल थे।

        भारत को ऐसे ही विकेटकीपर बल्लेबाज की तलाश थी और धौनी ने भी इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। जयपुर में 31 अक्तूबर 2005 को श्रीलंका के खिलाफ उन्होंने जो 183 रन की पारी खेली थी वह आज भी किसी विकेटकीपर का वनडे में सर्वोच्च स्कोर है। चयनकर्ताओं को अब कोई शक नहीं रह गया था। कोई भी टीम ऐसा विकेटकीपर चाहेगी जो छठे या सातवें नंबर पर कुशल बल्लेबाज की तरह खेल सके। धौनी इस पर खरे उतर रहे थे और उन्हें दिसंबर 2005 में टेस्ट टीम में भी पदार्पण का मौका मिल गया। श्रीलंका के खिलाफ चेन्नई में दो दिसंबर को।
       भारतीय क्रिकेट में एक नयी परीकथा शुरू हो चुकी थी। माही की परिकथा। विकेट के आगे और विकेट के पीछे ही नहीं मैदान के बाहर भी सफलताएं उनके कदम चूमने लगी। वह युवा दिलों की धड़कन बनने लगे और प्रायोजक उन पर न्यौछावर होने लगे। कभी धौनी ने चाहत रखी थी कि यदि उनके पास 60 लाख रूपये हों तो वह इससे अपनी जिंदगी अच्छी तरह से गुजार देंगे लेकिन अब वह करोड़ों में खेलने लगे और फिर वह जिंदगी के उस मुकाम पर पहुंचे जब उन्होंने कमाई करने के मामले में सचिन तेंदुलकर को भी पीछे छोड़ दिया। आज भी दुनिया में सर्वाधिक कमाई करने वाले तमाम खेलों के खिलाड़ियों में धौनी शीर्ष 30 में शामिल हैं।
       बहरहाल यह तो उस परीकथा का एक हिस्सा था। मैं तो धौनी के पिछले दस वर्षों की आपको फिर से याद दिला रहा हूं। धौनी ने अपने पांचवें वनडे में अपना पहला शतक बनाया था। उन्होंने अपना पहला टेस्ट शतक भी पांचवें मैच में ही बनाया और संयोग देखिये कि इस बार भी टीम पाकिस्तान की थी और धौनी ने रन भी 148 बनाये थे। इकबाल स्टेडियम फैसलाबाद में जनवरी 2006 में खेले गये इस मैच में धौनी के बल्ले से 19 चौके और चार छक्के निकले थे। उन्हें 2006 में पहला ट्वेंटी .20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने का मौका मिला। इस बार वह दूसरी गेंद पर बिना खाता खोलने पवेलियन लौट गये। लेकिन अब धौनी पर किसी को भी संदेह नहीं था। वर्ष 2007 में जब सचिन तेंदुलकरराहुल द्रविड़सौरव गांगुली जैसे सीनियर खिलाड़ियों ने क्रिकेट के छोटे प्रारूप में खेलने से इन्कार कर दिया तो धौनी को टीम की कमान सौंपी गयी। भारत को दक्षिण अफ्रीका में खेली गयी पहली आईसीसी विश्व टी20 चैंपियनशिप में कोई खिताब का हकदार नहीं मान रहा था लेकिन धौनी के धुरंधर चैंपियन बन गये। लोग कहने लगे इसे कहते हैं किस्मत।

      इसके एक साल बाद धौनी तीनों प्रारूपों में भारत के कप्तान बने हुए हैं और यह कहा जा सकता है कि भारतीय क्रिकेट तब से उनकी उंगलियों के इशारों पर नाच रहा है। इस बीच उन्होंने अच्छे परिणाम भी दिये। भारत को वनडे और टेस्ट क्रिकेट में दुनिया की नंबर एक टीम बनवाया और 2011 में उनकी अगुवाई में भारत 28 साल बाद फिर से विश्व चैंपियन बना। इसके दो साल बाद धौनी दुनिया के पहले ऐसे कप्तान बन गये जिनकी अगुवाई में टीम ने टी20 विश्व चैंपियनशिपवनडे विश्व कप और चैंपियन्स ट्राफी जीती। वह आज भारत के सबसे सफल कप्तान हैं। यह अलग बात है कि विशेषकर टेस्ट मैचों में वह विदेशी धरती पर कभी खुद को सफल कप्तान साबित नहीं कर पाये। आंकड़े के भी इसके गवाह हैं। आस्ट्रेलिया के खिलाफ ब्रिस्बेन टेस्ट मैच तक भारत ने धौनी की अगुवाई में विदेशों में जो 29 टेस्ट मैच खेले उनमें से उसे केवल छह में जीत मिली। भारत ने इनमें से 15 मैच गंवाये जबकि बाकी आठ मैच ड्रा रहे। इस बीच धौनी ने टीम को घर का शेर जरूर बनाये रखा। आखिर उनकी कप्तानी में भारत ने अपनी सरजमीं पर 30 मैचों में से 21 में जीत दर्ज की और केवल तीन में उसे हार मिली। बाकी छह मैच अनिर्णीत समाप्त हुए।

      यही वजह रही कि टेस्ट मैचों में धौनी की कप्तानी पर समय समय पर सवाल उठते रहे। उन्हें टेस्ट टीम से भी हटाने की वकालत की गयी लेकिन धौनी भारतीय क्रिकेट के उन कुछेक खिलाड़ियों में शामिल हैं जिन्होंने अपने समय पर खुद तय किया कि वह खेलेंगे या नहीं। अब समय  गया है जबकि धौनी को अब टेस्ट मैचों में खुद की भूमिका पर विचार करना चाहिए क्योंकि सभी क्रिकेट प्रेमी यह अच्छी तरह से समझते हैं कि भारतीय टीम को 'घर का शेरतो पिछले कप्तानों ने भी बना दिया था। सौरव गांगुली (28 टेस्ट11 जीते10 हारेने हमें विदेशों में जीतना सिखाया लेकिन टेस्ट मैचों के मामलों में धौनी उनकी विरासत को आगे नहीं बढ़ा पाये। सीमित ओवरों की क्रिकेट में वह अब भी भारत के सर्वश्रेष्ठ कप्तान और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फिनिशर हैं। देखते हैं कि 23 दिसंबर 2003 से भारतीय क्रिकेट में शुरू हुई 'माही की परिकथाअभी कहां तक पहुंचती है।
धौनी का रिकार्ड (23 दिसंबर  2014 तक)
                   मैच  पारी  नाबाद  रन    उच्चतम  औसत  100 50  चौके  छक्के  कैच स्टं
टेस्ट   8914215484122438.11
6335397824837
वनडे250219648192183*52.85
95663717722785
टी20अं50452084948*33.96
0057242511